Saturday, 18 October 2014

धर्म की दीवार लांघती एक लड़की

जब बडोदरा में दंगे का माहौल था। सूरत में एक लड़की दोबारा अपने पुराने घर में लौटने की तैयारी कर रही थी। मुंबई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से ग्रेजुएट उस हिन्दू लड़की को एक मुस्लिम परिवार में दोबारा लौटना था।
सूरत का नानपुरा मार्केट; जहां ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। जिनके पास घर के नाम पर एक तंग कमरा है। दिहाड़ी की नौकरी है। बदहाल जिंदगी और बेबसी भरे दिन हैं। वह उनके बदहाली को दूर करना चाहती थी। बेखबर कि बडोदरा में दंगे का माहौल बना हुआ है।

वह डेढ़ साल तक एक मल्टीनेशनल एडवरटाईजिंग कंपनी में काम कर चुकी थी। डोमिनोज का पिज्जा और बिसलरी का बोतलबंद पानी पीनेवाली लड़की दस बाई दस के छोटे से कमरे में दोबारा लौट रही थी।

यह सिर्फ हिम्मत ही नहीं था; उससे बढ़कर था। हिम्मत तो उसने तब भी दिखायी थी; जब उसने अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गांधी फैलो को ज्वाइंन किया था। जहां पहले ही बता दिया गया था, स्लम में रहकर काम करना होगा।

मैंनें रुची को पहली बार ऑटो में देखा था। हड़बड़ी में, लेकिन उसने अपना व्हाट्सअप नंबर देना नहीं भूली। शायद यह पब्लिक रिलेशन में पढ़ाई करने का असर था।

महीनों तक बातें नहीं हुई।  पता चला रुची बीमार है। डॉक्टर ने साफ जगह पर रहने की सलाह दी है। उसी रात व्हाटस अप पर मैसेज मिला। कल 11 बजे हेल्थ चेकअप कैंप है। स्कूल नं. 141, नानपुरा आ जाना
 जिसे खुद इलाज की जरूरत है; वह दूसरों का इलाज करवा रही है। 11 बजे मैं स्कूल नंबर 141 में था।

हेल्थ चेकअप कैंप में बच्चों और उनके पैरेंट्स को मनोवैज्ञानिक सलाह देते डॉ. मुर्तुजा
वह कमजोर दिमाग वाले बच्चों की पहचान डॉक्टर से करवा रही है। वह डॉक्टर के पास जमें भीड़ को व्यवस्थित कर रही है। वह एचएम से बात कर रही है। एचएम खुश हैं। उनके स्कूल में कुछ नया हो रहा है। मोहल्लेवालों को पहली बार डॉक्टर साहब से बिना मशक्कत सलाह मिल रही है, वह भी मुफ्त में।

रुची के चेहरे पर संतुष्टी के भाव थे। कैमरे की फ्लैश के बीच जरूर मैनें कई हेल्थ चेकअप कैंप देखे थे। लेकिन ऐसा पहली बार था जब बिना शोरशराबे के डॉक्टर बच्चों के स्वास्थ जांचने में व्यस्त थे।  लेकिन उस बदरंग मोहल्ले में डॉक्टरों को मुफ्त सलाह देने के लिए लाना आसान भी नहीं था।  बेशक डॉक्टरों की टीम को धन्यवाद देना चाहिए। लेकिन जो दिख रहा था वह रुची के प्रयासों का ही नतीजा था।



वह लोगों के बदहाली को दूर करना चाहती थी। उसने लगातार काम किया। उसने अपने काम से घर में ही नहीं, दिलों में भी जगह बनायी। बेखबर कि बडोदरा में दंगे का माहौल है। 
चेकअप कैंप में दांतों की जांच भी हुई। 
रुची के साथ सेल्फी।
हमदोनों  गांधी फैलोशिप से जुड़े हैं।
सूरत में 47 फैलो स्कूली शिक्षा के हालात
बेहतर बनाने में लगे हैं। 

Wednesday, 15 October 2014

यहां सिर्फ किताबों से बात होती है।

शाला नंबर 203
 यहां मेरा पहला विजिट था। हेडमास्टर से बातचीत की शुरूआत स्कूल की समस्या से शुरू हुई। यहां टीचर की कमी थी। जो हर गैर गुजराती स्कूलों की कॉमन समस्या है। हर क्लास में सौ से उपर बच्चे थे। समाधान की हर बात टीचर की कमी पर अटक जाती थी। शिक्षकों की कमी से कोई न कोई क्लास खाली पड़ा रहता। इसके लिए हमने एचएम को लाइब्रेरी सेशन रखने का सुझाव दिया। हेडमास्टर साहब को यह बात अटपटी लगी। बच्चे शांत होकर कैसे पढ़ सकते हैं?  मैनें उस दिन दो घंटे की कक्षा ली। यह हिन्दी स्कूल था। हमने पांचवी के बच्चों को बालगीत करवाये, गणित का एसेसमेंट लिया, समाज विज्ञान पढ़ाया।
पुस्तकें सबसे अच्छी दोस्त होतीं है, और पुस्तकालय में हम सबसे अच्छे दोस्त से मिलने जाते हैं। चलो इस कक्षा को घंटेभर के लिए इसे पुस्तकालय बना देते हैं। यहां सिर्फ किताबों से बात होती है।

मुझे उन्हे बिना बात किये कक्षा में पढ़ना सीखाना था। मैंने उन्हे लाइब्रेरी में पढ़ने की ट्रेनिंग देने की कोशिश करने लगा। पाठ को जल्द से जल्द खत्म करना। कुछ आसान सवाल पूछना। फिर अगले चैप्टर की ओर बढ़ जाना। बच्चे बात करने लगते। मैं उन्हे याद दिलाता कि यहां बोला नहीं जाता। थोड़ी देर के लिए क्लास शांत रहा। मैं वहां से बाहर निकल गया। शोरगुल फिर शुरु। मैंने दोबारा समझाया। अगली बार बाहर निकलने पर सच में शोर नहीं था। बच्चे पढ़ रहे थे और होड़ में थे कि कौन सबसे पहले चैप्टर पूरी करता है। क्लास खत्म होने पर वे पूछ रहे थे। आप सब दिन आओगे. कल भी आओगे। एक बच्चे ने कहा इतने स्नेह से कोई नहीं पढ़ाता आप रोज आना। मैं खुश था। इसे बचा के रखना था। यह स्लम इमरजन के पांचवा दिन की बात है।

Monday, 13 October 2014

स्लम के 28 दिन

चार सप्ताह के कम्युनिटी इमरजन के बाद 
फिनिक्स लौट आया है।
जब सात युवा मिलते हैं तब फिनिक्स अपने अस्तित्व में आता है। इन्द्रधनुष के सात 
रंगों की तरह सबके अलग रंग हैं, लेकिन उदेश्य एक है
सीखना है, बदलना है

सितम्बर की नौ तारीख का दिन जब फिनिक्स के सात रंग बिखर गये। फिनिक्स एक बा फिर गायब हो गया। अब सातों के अपने रंग में थे। एक अमित था, एक मधुरा थी, एक बना खालिद, एक गौरव बना, शीतल अपने रंग में थी, राम को अपना रंग मिला, चेतना ने भी अलग होकर अपना रंग पाया। यही वह वक्त था जब हमें खुद को साबित करना था। 
हमें खुद को परखना था। खुद को बदलना था। 
सीखना था और बदलना था। 

लेकिन यह आसान नहीं था। परदेशी बाबू का गांव आना और उनके स्वागत में बच्चे-बड़ों का उमड़ जाना यह फिल्मों में होता है। यहां हमारे हालात बिल्कुल अलग थे। हम घर ढूंढ रहे थे। वहां; जहां एक कमरे में पूरा परिवार रात को सिमट जाता है। हमें वहां अपनी जगह बनानी थी। हमें घर ही नहीं चाहिए था, हमें उनके दिलों में भी जगह चाहिए थी। हमारे कुछ साथियों को एक नया परिवार मिल गया था। कुछ अब भी घर ढुंढनें में लगे थे। जाति की जकड़न, धर्म की दीवार, भाषा की बंदिश, प्रदेश की दूरी इन सबसे हमें पार पाना था। हम कोशिश कर रहे थे।
हम गलतियों से सीख रहे थे, हमें बदलना था।
15 सितम्बर, अमानुष का बर्थ डे। एक्सपेरियंस शेयर के दरम्यान मेरे दोस्तों ने
मेरे जन्मदिन को यादगार बनाया। रिकिता को अलग से थैंक्स।

सप्ताह के तीन दिन मंगल, गुरू और शनि वह दिन होता, जब थोड़ी देर के लिए फिनिक्स का उदय होता। सात फैलो के सात अनुभव जो हमें फिर से उठ कर खड़े होने की प्रेरणा देते। सातों के पास कहने को कुछ न कुछ होता जो हमें सपोर्ट करता। किसी के पास अपने नये परिवार का प्यार होता था, तो किसी के पास कम्युनिटी का सपोर्ट, कोई अपने सहयोगी हेडमास्टर की मदद को साझा करता, किसी के पास नये इनोवेटिव आइडिया। हम मिलते और रिचार्ज होकर वापस अपने कम्युनिटी में लौट जाते।
हम लौट जाते सोचते हुए कि कुछ तो बदलेगा।
अमित और उसका परिवार। सूरत का एक परिवार जिसने साबित किया
जगह घर में नहीं दिलों में होनी चाहिए।
मुकेश अंकल जिनका घर सबके लिए खुला था।

जब फिनिक्स के सात रंग अलग हुए तो कुछ तो आश्वस्त थे लेकिन बाकियों ने अनिश्चितता के साथ घर छोड़ा था। अमित अम्बातलाबारी के आंगनबाड़ी केन्द्र में ठहरा। यहां के लोगों से जो प्यार मिला वह कम्युनिटी इमरजन के सभी निगेटीविटी पर भारी पड़ता है। अम्बातलाबाड़ी के लोगों का प्यार सिर्फ अमित को ही नहीं मिला यह सबको मिला जिसने उधर रुख किया। अमित पहले दिन से ही काम शुरू कर चुका था। सबसे पहले उसने डेंगु-मलेरिया सर्वे करवाया और बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना शुरु किया। हेल्थ अवेरनेस, शिक्षा के महत्व जैसे कई इवेंट उसने करवाये।
चेतना। कल्चरल शॉक्स चेेंज इनटू कल्चरल रेसपेक्ट


चेतना एक मध्यवर्गीय काठियावाड़ी परिवार की सदस्य पहले दिन से ही बन चुकी थी। लेकिन यहां कुछ अलग मामला था। शुरू में कुछ दिन तक यह फैमली इमरजन ही बना रहा, लेकिन समय बितने के साथ फैमली ने समझा, फिर कम्युनिटी ने भी। गरबा के धूम के बीच चेतना लड़कियों की शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण संदेश देने में कामयाब रही।

मधुरा। फैमली मिली कम्युनिटी की तलाश जारी रही।
मधुरा को भी 22 लोगों का एक बड़ा सा परिवार मिल गया था। उस बड़े से परिवार के सदस्यों के बीच मधुरा ने खाना बनाने से लेकर घर के कामों को सीख लिया है। 19 अक्टुबर से सभी छुट्टियों में घर जा रहे हैं। मधुरा की मां जरूर खुश होंगी। उनकी बेटी अब भोर होने से पहले उठने लगी है। आखिरी दिनों में मधुरा इवेंट के लिए चेतना के साथ रही। 

खालिद। बैकग्राउंड में मुकेश, समीर, विलाश। सामंजस्य का नमूना।
खालिद का सफर आसान नहीं रहा। वह स्कूल में रुका। बाद में चार फेलो के साथ एक मुस्लिम कम्युनिटी में। बीमार भी हुआ। कम्युनिटी से अस्पताल फिर ऑफिस में तीन दिन का ठहराव। जज्बे में कमीं नहीं आने दिया। फिर से निकल पड़ा। बच्चों को पढ़ाते हुए, यूथ को समझाते हुए, उन्हें तकनीक और तरकीब बताते हुए। खालीद ने अच्छा तालमेल बिठाया।
शीतल। रंग और कूची से बनायी जगह। 

शीतल स्कूल के चपरासी के घर रही। घर संभाला, झाडु लगाया, खाना भी पकाया और कम्युनिटी के बीच टीचर दीदी भी बन गयी। एक ऐसी लड़की जो टीचर भी थी और दीदी भी। उसने दोनों जिम्मेवारी को बखूबी निभाया। महिलाओं के लिए वह दीदी थी। बच्चों के लिए टीचर। उसने बच्चों के साथ बड़ों को भी रंग और कूची हाथों में पकड़वा दिया और सरलता के साथ 
पढ़ाई के महत्व के संदेश देने में कामयाब रही।

आखिर में फिनिक्स के दो रंग और थे। जो साथ रहे। मैं और मेरे कठिन दिनों का साथी राम। मैंने फैलोशिप देर से ज्वाइंन किया था, इमरजन से ठीक पहले। राम तमिलनाडु से है। उसके लिए भाषा की समस्या थी। शायद हमदोनों को इसी कमजोरी की वजह से साथ रखा गया। हम हप्ते भर तक भटकते रहे। फेसबुक पर उस समय राम ने जो फेसबुक स्टेट्स लिखा था उससे हमारे हालात बखूबी बयान होते हैं।

Community immersion

Thursday stayed at Hindu temple …
Friday stayed at Christian Church …
Saturday stayed at muslim Home…
Today don’t know the place…
Still searching for home to stay…
Living like nomadic
Nice experience
यह सच में नाइस अनुभव था। हम दोनों बीमार भी हुए। अम्बातलाबाड़ी की मौसी ने हमें ठहरने को कहा। राम वहीं रुक गया। मैंने तलाश जारी रखने का फैसला किया। 
राम ने अमित के साथ मिलकर कम्युनिटी का दिल जीत लिया।

मैं दस दिनों तक भागता रहा। मैंने अनुभव किया कि भागने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। अब मैंने ठहर कर जूझने का फैसला किया। मैं बीमार था। मेरे रहने का ठिकाना नहीं था। मैं रोज स्कूल जाता रह़ा। स्कूल नंबर 171। बच्चों को पढ़ाने के साथ योगा, पी.टी, गेम्स, कहानी और बालगीत। हमारे स्कूल के 34 बच्चे अनाथ आश्रम से आते थे। मैं यहां रहकर काम करने का फैसला किया। काफी भागदौड़ के बाद मुझे यहां रहने की जगह मिल गई। मुझे 94 बच्चों की कम्युनिटी मिल गयी थी। मैंने बच्चों के साथ कविता रची, कहानी लिखा, क्रिकेट और कैरम खेला, चित्र बनाये। भगत सिंह और गांधी के जन्मदिन पर नैतिक शिक्षा और देशभक्ति की सीख देने की कोशिश की। कैंपस की सफाई की। ये बेहतरीन दिन थे।
गौरव। कई काम अधूरे छो़ड़ कर लौटना पड़ा।
मुझे कोई अफसोस नहीं था कि मुझे कोई कम्युनिटी नहीं मिली। मुझे इवेंट भी करना था। मैंने इसके लिए जे.के.पी नगर को चुना, क्योंकि यहीं से सबसे ज्यादा बच्चे आते थे। यहां सबसे जरुरी था शिक्षा को लेकर कोई इवेंट कराना।  लेकिन यह  सबसे मुश्किल भी था। मैं रोज कम्युनिटी जाता रहा। बिना परवाह किये कि लोग मेरे बुलाने पर आते हैं कि नहीं। आखिर मैंने इमरजन के आखिरी दिनों में शिक्षा के सोपान: समस्या और समाधान विषय पर परिचर्चा करा पाने में सफल रहा। बच्चे-बड़े सभी मुहल्ले में शैक्षणिक माहौल बनाने के लिए जुटे और तय समय से दुगुने तक सुनते 
रहे।
परिचर्चा में रिकिता, गांधी फेलो रुची, डा. मुर्तुजा, समीर व श्याम भाई ने कम्युनिटी का मार्गदर्शन किया।
अाश्रम के बच्चों ने पैनल को अपने पेंटिग भेजकर अामंत्रित किया।
यह मेरे लिए इनोवेटिव था।
यह मुझे दोबारा सीआई के लिए प्रेरित करेगा।
एक समय ऐसा भी आया जब हमारे स्लम इमरजन के 28 दिन पूरे हो चुके थे। हम लौटने वाले थे। हर कोई कहीं न कहीं से जुड़ चुका था। जड़ें मिट्टी तलाश ही लेती हैं।  अम्बातलाबरी में सभी मायूस थे। अनाथालय के बच्चों के हाथ विदा नहीं कर रहे थे, वापस बुला रहे थे। सात रंगों के जुड़ने का वक्त आ गया था।
 फिनिक्स फिर से लौट आया है।

बहुत कुछ सीखकर; थोड़ा बहुत बदलकर

Saturday, 17 May 2014

Report on Bihar loksabha poll result


मोदी  लहर  में कइयों  की नैया पार लग गयी  जिनमें
 भाजपा के अलोकप्रिय  नेता से लेकर  सहयोगी दल भी थे 

  16 वीं लोकसभा  चुनाव में मोदी लहर से बिहार भी  अछूता नहीं रहा।  बिहार की कुल 40 लोकसभा  सीटों में एनडीए ने  31 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही। जिनमें अकेले  भाजपा ने  22 सीटों पर परचम लहराया। वहीं  मोदी लहर पर सवार होकर एनडीए के दो सहयोगी; लोक जनशक्ति पार्टी  और नवनिर्मित राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी ने अच्छा  प्रदर्शन किया है। चुनाव परिणाम के बाद बिहार की सत्तारुढ  जनता  दल यूनाइटेड   को बड़ा झटका लगा है। हालांकि  लालू की राष्ट्रीय जनता दल  अपनी ठीक-ठाक वापसी की है। वहीं आप का प्रदर्शन बहुत खराब रहा और उसे कई लोकसभा  सीटों पर चौथे-पांचवे स्थान से संतोष करना पड़ा। यहाँ तक आआप, बसपा और वाम दल का प्रदेश में खाता भी  नहीं खुल पाया।


       
कभी भाजपा के साथ रहने वाले नितीश कुमार का नरेंद्र मोदी से
उनके हिन्दू राष्ट्रवादी चेहरे की वजह से अलग होना महंगा पड़ा 
                        पिछले साल सितंबर में भाजपा  के द्वारा अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के बाद एनडीए से अलग हुए जेडीयू को जबरदस्त धक्का लगा है। चुनाव परिणाम आने के बाद वह केवल दो सीटों पर सिमट कर रह गयी है। पिछले  लोकसभा  चुनाव में 20 सीटें लेकर  जेडीयू राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी ।

                     चुनाव पूर्व वामदलों के नेतृत्व में 11 दलों को मिलाकर बनाई गई 'तीसरा मोर्चा' फिर एक बार फ्लाप रही। जेडीयू और सीपीआई के बीच हुए गठबंधन में जदयू कुल 38 सीटों पर अपना उम्मीदवार ख़ड़े किये थे। वहीं सीपीआई को दो सीटे मिली थी। सीपीआई दोनो सीटों पर तीसरे जगह पर रही।

                        राज्य में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल  ; एनडीए से  संघर्ष करती नजर आई है। कांग्रेस के साझीदारी में लड़े गये चुनाव में  24 सीटों में चार पर जीत हासिल किया है। जबकि कांग्रेस ने साझीदारी  के तहत मिले  कुल सात सीटों में  दो सीट जीतने में कामयाब रही।  चुनावी समर में लालू की पत्नी और प्रदेश की पूर्व मुख्यमंघत्री राबड़ी देवी सारण की 'घरेलू सीट' पर हार गयीं। सारण सीट पर उन्हें भाजपा के राजीव प्रताप रुढ़ी ने शिकस्त  दी।  वहीं पाटलीपुत्र पर राजद के पूर्व नेता रामकृपाल की नाराजगी  भारी पड़ी । यहां से लालू की पुत्री मीसा भारती चुनाव लड़ रही थीं।
       
लालू   को  अपनी  खोई  जमींन  मिल सकती  है,
बिहार के पांच  विधानसभा  क्षेत्र में हुए  चुनाव में राजद ने तीन सीट  पर जीत दर्ज की है 
            वहीं पासवान की लोजपा ने  पिता-पुत्र-भाई के  तीनों  पारिवारिक सीट पर जीत हासिल की। हाजीपुर से रामविलास पासवान, जमूई से पुत्र चिराग और समस्तीपुर से पासवान के भाई रामचंद्र पासवान नें  जीत दर्ज कर ली है। पिछले  लोकसभा चुनाव में लोजपा का राज्य में सुपड़ा साफ हो गया था।  एनडीए के साथ समझौते के तहत लोजपा को छह सीट मिली थी। जिनमें  सभी   सीटों पर जीत हासिल कर लोजपा  ने  शानदार वापसी की है।
                 वहीं बिहार में तीन सीटों पर चुनाव  लड़ रही भाजपा की एक और सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के  संस्थापक उपेन्द्र कुशवाहा  अपनी कराकट  सहित  तीनों पर जीत हासिल की है। जदयू से अलग होकर पिछले साल तीन मार्च को कुशवाहा ने अपनी नई पार्टी बनाई थी।

           जदयू के कई बड़े नेताओं को इस चुनाव में  पराजय का मुंह   देखना पड़ा। कभी  एनडीए के संयोजक रह चुके जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तीसरे मोर्चे के प्रमुख रणनीतिकार शरद यादव खुद अपनी मधेपुरा  सीट बचा पाने में कामयाब नहीं रह सके ।  शरद यादव को राजद के राजेश रंजन उर्फ पप्पु यादव ने 56209  वोटों  से पराजित किया।  वहीं मशहूर फिल्म निर्माता प्रकाश झा को दूबारा हार का सामना करना पड़ा ।  इसबार जदयू की टिकट पर पश्चिम चंपारण से चुनाव लड़ रहे प्रकाश झा को भाजपा के संजय जयसवाल से पराजित हुए । वे इससे पहले लोजपा के टिकट पर इसी लोकसभा क्षेत्र से  चुनाव में हार  चुके हैं।

     
चुनाव परिणाम आने के बाद  नीतीश कुमार की मुश्किलें  बढ़ गयी है,
 वे इस्तीफा भी दे सकते हैं 
 जदयू का  मुस्लिम वोटरो को  लुभाने  के लिए भाजपा से अलग होने का दांव सही पड़ता नहीं दिखा। जदयू ने इस लोकसभा  चुनाव में तीन मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किये थे। जदयू  के टिकट पर  शिवहर से शाबिर अली, सारण के शलील परवेज और मधुबनी से चुनाव लड़ रहे गुलाम गौस  में किसी को भी  जीत नहीं मिल पाई। वहीं भागलपुर से चुनाव लड़ रहे भाजपा के एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन  राजद के शैलेश कुमार मंडल से मात्र 9485 वोटों से  पराजित हो गये हैं। हुसैन, वाजपेयी के शासनकाल में केन्द्रीय मंत्री भी  रह चुके हैं। उन्होने पिछली बार इसी सीट से जीत हासिल की थी।
     विवादित बयान देकर फंसे भाजपा के  गिरिराज सिंह नवादा से चुनाव जीत चुके हैं। साथ हीं   सीवान के निर्दलिय वर्तमान सांसद ओमप्रकाश यादव ने भाजपा की टिकट पर दुबारा जीत पाने में सफल रहे।
            वहीं राज्य में मिले वोट फीसदी की बात करें तो यहां भी  भाजपा सर्वाधिक 29 वोट फीसदी वोट हासिल किया।  वहीं राजद ने 20.1 फीसदी वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रही  । जदयू ने 15.8 फीसदी वोट के साथ तीसरी स्थान बना पाने में कामयाब रही।  वहीं नोटा पर 581011 वोटरों ने बटन दबा कर अपना विरोध दर्ज किया।

         
रामविलास पासवान को पाला बदलने से फायदा मिला ,
बिहार की राजनीति  में हासिये  पर जाने क बाद एक बार फिर रामविलास की  उम्मीद जगी है 
आनेवाले दिनों में जदयू की परेशानियां बढ़ सकती है। जीत से उत्साहित रामविलास पासवान ने जदयू के भविष्य पर टिप्पणी करते हुए कहते हैें जल्द ही नीतीश की सरकार गिरने वाली है क्योंकि हार को देखकर दर्जनों  विधायक पार्टी छोड़कर जानेवाले हैं।
           यूपीए की केंद्र  सरकार पर एनडीए  नीत  राज्य सरकार  बिहार के प्रति  लगातार  भेदभाव  का आरोप लगाती रही है।  यह अब भी  जारी रहेगी जब भाजपा केन्द्र  में होगी । देखना यह होगा कि विशेष राज्य का दर्जा मांगने में जदयू का सुर मिलाने वाली भाजपा राज्य को यह दर्जा देती है या उठापटक और आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी रहने वाला है।

हरिभूमि में प्रकाशित

Friday, 11 April 2014

बिना गाजे बाजे की फिल्म है ' देख तमाशा देख'


अंत भला तो सब भला। हलांकि यह जुमला तब कहा जाता है जब काम की खराब शुरूआत के बावजूद अंत सुखद हो। लेकिन आईआईएमसी के वर्तमान सत्र  की शुरूआत भी सुखद थी और अंत भी यादगार। इस पड़ाव को यादगार बनाया सिनेमंच की सत्र की आखिरी पेशकश फिरोज अब्बास खान निर्देशित फिल्म देख तमाशा देखने।

ये वही फिरोज अब्बास खान हैं जिनकी साल 2007 में आई विवादास्पद फिल्म 'गांधी माई फादर' ने खूब प्रशंसा बटोरी थी। इससे पहले भी इन्होने थियेटर में खूब नाम कमाया है। 'गांधी माई फादर' के लिए इन्हे बेस्ट स्क्रिन प्ले के लिए 2008 में नेशनल आवार्ड मिल चुका है। इसी कैटगरी में 2007 का एशिया पैसिफिक स्क्रिन अवार्ड इनके नाम रहा।

                   नौ सालों के बाद फिरोज फिर एक बार सच्ची घटनाओं पर आधारित वैचारिक और व्यंग्यात्मक फिल्म देख तमाशा देखके साथ आये हैं। फिल्म महाराष्ट्र के एक गांव की पृष्टभूमि पर बनी है। यह समसामयिक राजनैतिक-सामाजिक विसंगतियो पर बनी फिल्म है। फिल्म में कई गंभीर विषयों को व्यंग्य के माध्यम से निर्देशक ने उठाया है। फिल्म ने साबित किया है कि हास्य फिल्में बिना फुहड़पन के भी बनाई जा सकती है।

                          इस फिल्म में कई कहानियां समानांतर रूप से चलती है। फिल्म की कहानी एक टांगेवाले का एक राजनेता के पोस्टर तले दब कर मरने से शुरु होती है। टांगेवाले के मरने के बाद हिन्दू और मुसलमान उसके शव पर अधिकार के लिए झगड़ने लगते हैं। यह झगड़ा दंगा का रूप ले लेता है। पूरी कहानी इसी के आसपास घूमती है। हालांकि केन्द्रीय कहानी के साथ कई कहानियां साथ-साथ चलती हैं। जिनमे दंगो के बीच शब्बो और प्रशांत का निर्दोष प्यार और उसका दुखांत अंत भी है।

                           इस फिल्म में कई नए प्रयोग देखने को मिल जाएंगे। फिल्म कई टुकड़ो में है। हलांकि निर्देशक इसे मुख्य कहानी से जोड़ने में सफल रहे हैं। कई विसंगति को दो घंटे की फिल्म में दिखाने की कोशिश में कभी-कभी मुख्य कहानी पीछे छूटती लगती है। हलांकि दमदार और चुभते व्यंग्य दर्शक को बांधे रखने में सफल रहते हैं। फिल्म के सटीक संवाद और मजबूत कहानी की वजह से पूरी फिल्म में बैकग्राउंड संगीत का न होने का पता पूरी फिल्म में नहीं चलता है। निर्देशक फिरोज अब्बास खान अपने इन प्रयोगो के बारे में कहते हैं अगर मैं प्रयोग न करूँ तो कुछ नया नहीं कर पाउंगा, फिल्म की कहानी इतनी मजबूत है कि इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक की जरूरत ही नहीं है।
फिल्म को रियल बनाने में कलाकारों ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया है। ज्यादातर कलाकार मराठी रंगमंच से जुड़े रहे हैं। इन कलाकारों ने कहानी की मराठी पृष्टभूमि को जीवंत कर दिया है। फिल्म में एकमात्र सतीश कौशिक जाने-पहचाने चेहरे मिलते हैं। इन्होने फिल्म में मोटु सेठ के चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है। कहानी का प्रधान चरित्र टांगेवाला पूरी फिल्म में सिर्फ पोस्टर में ही दिखता है। फिल्म में कई चरित्र नायक जैसे लगते हैं।


फिल्म में प्रतीकों का प्रयोग किया गया है, जो गंभीर दर्शक की मांग करती है। आम बोल-चाल के शब्दो का प्रयोग और आम लोगो की कहानी की वजह से इसे छोटे शहरों में भी दर्शकोें के द्वारा पसंद की जाएगी; इसकी पूरी संभावना है। फिल्म जिस तरह मीडिया के बदलते स्वरूप, धार्मिक कट्टरता, गरीबी  जैसे सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे को उठाया है। इस काम के लिए फिरोज तारीफ के काबिल हैं।
         कहानी के अंत में पुलिस इंस्पेक्टर अपनी काबिलियत के बदौलत दंगो पर काबू पा लेता है और सबकुछ शांत हो जाता है। यहां फिल्म संदेश देती है कि प्रशासन की मुस्तैदी से हालात काबू किये जा सकते हैं।

                        फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान  निर्देशक फिरोज अब्बास खान, संस्थान के मीडिया गुरू आनंद प्रधान और कई फिल्म के जानकार मौजूद थे। फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के विभिन्न पक्षों पर चर्चा हूई। इस दौरान उन ज्वलंत सवालों पर भी बहस हुई जो फिल्म में उठाए गए थे; जैसा कि हर बार सिने मंच में होता है। देर शाम तक पूरा कुनबा जमा रहा। लेकिन आपको इस फिल्म को देखने के लिए अगले शुक्रवार तक का इंतजार करना पड़ेगा।

Thursday, 10 April 2014

नेताजी पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

अबतक नेताजी के नववर्ष, 26 जनवरी, वसंत पंचमी, गणतंत्र दिवस से लेकर होली के मुबारकबाद वाले पोस्टर सड़क के किनारे किसी खाली जगह पर टंगी मिलती थी। ढ़ेर सारे नाम और उनके फोटो वाले पोस्टर। यह कम-से-कम पैसे में अपना विज्ञापन  करने का राजनेताओं का पारंपरिक जुगाड़ तकनीक रहा है।
                       लेकिन राजनीतिक पार्टियों के ऐसे पोस्टर अब बहुत कम दिखते हैं। इनकी जगह प्रोफेशनल तरीके से बनाई गई बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर और अन्य साधनों ने ले लिया है। अब राजनेता अपना प्रचार किसी कॉरपोरेट के प्रोडक्ट की तरह करने लगे हैं। कार्टुनिस्ट गोपाल कहते हैं इन पोस्टरों में कांट्रास्ट है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
                                     अपने प्रचार-प्रसार में आधुनिक तकनीक और मौकों का फायदा उठाने में         सभी प्रमुख पार्टियां होड़ में लगी दिखती हैं। जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं उस समय उनके उपलब्धियों वाले पोस्टर हर बस-स्टाप पर दिख जाते थे। इन पोस्टरों पर प्रगति रिपोर्ट के साथ शीला दीक्षित के फोटो लगे रहते थे।
                         अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही शीला दीक्षित के फोटो वाले विज्ञापन की जगह अरविंद के अगर कोई घूस मांगता है तो उसे ना मत कहिये .... के दो लाइन के पोस्टरों ने ले ली। इनमें केजरीवाल के तस्वीर लगे थे।
                            लेकिन  प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने प्रचार के मामले में चुनाव के नजदीक आते-आते सबको पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन सड़क से लेकर घर तक पीछा नहीं छोड़ती। सड़क किनारे, बस-स्टाप, मेट्रो में हर जगह 'मोदी सरकार'  बनाने के अपील वाले विज्ञापन दिख जाते हैं। अखबार, इंटरनेट, रेडियो, टीवी के जरीये मोदी सरकार के विज्ञापन हमारे घरों में दाखिल हो रहे हैं। बचे जगह कांग्रेस के विज्ञापनों ने ले रखा है।
                         हालांकि सोशल मीडिया में आम आदमी पार्टी सक्रिय दिखती है। लेकिन यह सक्रियता प्रायोजित नहीं दिखती। लेकिन भाजपा ने सोशल मीडिया में अपनी पैठ  बेवसाइट को भारी रकम चुकाकर बनाई है। यू-ट्युब खोलते ही भाजपा या कांग्रेस के अनचाहे विज्ञापन दिख जाते हैं। इस सुविधा को पाने के लिए बेशक करोड़ो रूपय गूगल को इन दोनों प्रमुख पार्टी ने चुकाये होंगे।
पिछले कई दिनों से नरेन्द्र मोदी के फुल पेज वाले विज्ञापन सभी राष्ट्रीय अखबारों में आ रहे हैं। इसे देखते हूए  मोदी के विज्ञापन पर दस हजार करोड़ खर्च करने के कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा का आरोप निराधार नहीं लगता है। सवाल लाजिमी है कि विज्ञापन में किया जा रहा खर्च कितना सही है और खर्च का पैसा कहां से आ रहा है?
लेकिन इस हवा-हवाई प्रचार से नेता का अपनी जनता से दूरी और बढ़ गयी है। हलांकि कई पार्टियां अपना जनसंपर्क जनता से मिलकर कर रहीं हैं। उनकी समस्यओं को सुन रहीं हैं। एआइएसएफ के महासचिव विश्वजीत कहते हैं वामपंथी पार्टियां जनता से सीधे मिलकर अपने एजेंडा को बताती रही हैं। हम एक वोट एक नोट के नारे के साथ मिलते रहे हैं।
                                                       हालांकि राजनीतिज्ञों का कारपोरेट कल्चर सिर्फ दिल्ली जैसे बड़े महानगर में ही नही दिख रहा है। यह छोटे शहरों और गांवो में भी फैल रहा है। जनसंपर्क  की जगह हवा-हवाई प्रचार लेते जा रहे हैं। बिहार के दरभंगा जिले के सोनू इस बार दुखी हैं कि इस बार कोई बड़ा नेता अबतक उनके गांव नहीं आया। वे कहते हैं कि  नेताजी कम-से-कम पांच साल में एक बार वोट मांगने तो आ ही जाते थे। इस बार तो सब फोटो में ही दिखते रहे हैं। तो क्या जनसम्पर्क के बदलते ट्रेंड की वजह से नेताजी अब पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

                                   

Wednesday, 9 April 2014

क्या कोई राजनेता आम आदमी बन कर नहीं रह सकता।

अरविंद केजरीवाल को एक ऑटोवाले ने कल थप्पड़ मार दिया। पहले माला पहनाई फिर अपने गुस्से  का इजहार किया। क्योंकि 49 दिन कि लंगड़ी सरकारउसके लिए कुछ नहीं किया। विरोधी-समर्थक दोनों इस घटना के बाद सलाह देने लगे हैं। कुछ लोग गुस्से में हैं कोई खुशी जाहिर कर रहें हैं। एक समर्थक को लगता है कि यह सब विरोधियों के इशारे पर हो रहा है।  

                          फेसबुक पर आइआइएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान के एक पोस्ट के कामेंट में   प्रमोद राय लिखते हैं  “अफसोस कि अरविंद के ऊपर हो रहे हमलों को जनता का गुस्सा बताने और प्रचारित करने का तंत्र भी इन दिनों बेहद आक्रामक और कुंठित रुख अख्तियार किए हुए है। आश्चर्य कि जनता ने महज 49 दिन की सरकार से इतनी अपेक्षाएं लगा रखी थीं और वो जो 49 साल से भी ज्यादा समय तक शासन करते रहे उन्हें थप्पड़ मारना तो दूर उनकी अभेद्य सुरक्षा को भी उनके व्यक्तित्व-वैभव से जोड़कर देखा जा रहा है। महज 49 दिन के कार्यकाल के खिलाफ अगर जनता में वाकई इतना आक्रोश होता तो देश अब तक 49 क्रांतियां देख चुका होता। वैसे 49 साल वालों को अगर जनता इतना ही प्यार करती है तो कम से कम एक बार उन्हें अपनी एसपीजी, जेड प्लस, प्राइवेट गनर और गुंडों के घेरे से बाहर निकलकर जनता के बीच में जरूर जाना चाहिए, क्या पता जनता उन्हें फूलों से लाद दे।                                                           दिल्ली में एक सभा के दौरान मुक्के मारना, वाराणसी और गुजरात में अंडे और स्याही का फेका जाना, जगह-जगह काले झंडे दिखाना, और फिर एक ऑटोवाले का थप्पड़ जड़ देना। क्या वाकई यह जनता का गुस्सा हो सकता है? क्या 49 दिनों में ही केजरीवाल इतने अलोकप्रिय हो गए कि उनका विरोध इस तरह किया जाए? जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार, मंहगाई, और अनगिनत समस्याओं के लिए तो राहुल, मनमोहन को थप्पड़ नहीं मारती। डीएलएफ के साथ विवादित जमीन के घोटाले के आरोपी राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका वाड्रा आज भी कांग्रेस की स्टार प्रचारक बनी हुई हैं। बीजेपी के 22 उम्मीदवारो पर रेप जैसे संगीन आरोप लगे हैं। अगर इनका विरोध हो तो जनता का गुस्सा समझ आता है। यहां जनता की मजबूरी है कि इनके अभेद्य दुर्ग को पार कर पाना इन साधारण लोगों के लिए आसान नहीं है। बच जातें हैं तो आम आदमी की छवि बनाने वाले अरविंद केजरीवाल। बिना किसी लाव-लश्कर के साथ चलने वाले अरविंद के पास पहुंचना सबसे आसान है। यही अरविंद के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। अरविंद ने ऐसा कर एक नई शुरूआत तो नहीं की थी लेकिन इसका असर दूसरी पार्टीयों के नेताओं पर जरूर पड़ा था। चाहे भाजपा शासित राजस्थान की मुख्यमंत्री  वसुंधरा राजे हों या उत्तरप्रदेश के सपाई मुख्यमंत्री अखिलेश यादव  कई राजनेताओं ने अपने सुरक्षा खर्चों और ताम-झाम में कटौती की थी।                                                                                     उनके समर्थक उनपर हो रहे लगातार हमले से सशंकित हैं । फेसबुक पर आम आदमी पार्टी के  समर्थक अब्दुल एच हैदर लिखते हैं इन भाड़े के टटुओ से और आशा भी क्या कर सकते हैं! केजरीवाल को सिक्युरिटी ले लेनी चाहिएउन कायरो ने जब महात्मा की हत्या की तो आम आदमी की क्या बिसात!” 
                         एक साधारण आदमी के  चाल-ढाल को अपनाकर  अरविंद केजरीवाल ने एक अच्छी शुरूआत की थी। लेकिन इन घटनाओ के बाद सवाल उठता है कि क्या हमारा समाज इस लायक है कि एक नेता परंपराओं को तोड़ कर आम आदमी की तरह रह सके।

                
थप्पड़ मारने वाले ऑटो चालक से मिलते  अरविंद केजरीवाल साथ
में मनीष सिसोदिया।  सभी फोटो फेसबुक से।

                 पटनाविवि की काउंसलर नैन्सी कहती हैं हम और कितने दिन लोकतंत्र में भी राजशाही के प्रतीक को आज के राजनेताओं में जिंदा देखेंगे। आज अरविंद केजरीवाल को इस देश की जरूरत है। उस ऑटोवाले के थप्पड़ की वजह से सिक्योरिटी ले लेने से उनके कुछ समर्थक भले ही राहत महसूस करें लेकिन इससे मेरे जैसे आम आदमी पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।




फिलहाल अरविंद केजरीवाल उस ऑटोवाले मिलकर अपनी बड़प्पन दिखा चुके हैं। यह और बात है कि केजरीवाल पर थप्पड़ लगने के बाद आप समर्थकों ने प्रतिक्रिया में उस ऑटोवाले की पिटाई कर दी थी।
               
    

Monday, 7 April 2014

राजो दा क्यों विवादित हो गए?

पहली बार उस बुर्जुग को  युवाओं की टोली में  कदमताल मिलाते नंगे पैर चलते  देखा था। पुलिस के डंडे की चोट उनके सर पर भी पड़ी थी। सर से खून रिस-रिस कर जम चुका था। कुर्ता का चिथड़ा उनके बदन से झूल रहा था।उनके पैर का जूता पुलिस के साथ हुए भाग दौ़ड़ में कहीं छूट चुका था। पूरे दिन पुलिस कस्टडी में रखने के बाद सभी आंदोलनकारियों को पुलिस ने छोड़ दिया था। हम सब रेनबो स्टेडियम से पैदल  नारा लगाते चिड़ियांटाड, स्टेशन होते जनशक्ति पहुँचे थे। यहीं उस बुर्जुग से मेरा पहला परिचय हुआ था। ये सीपीआई के नये राज्य सचिव कामरेड राजेन्द्र सिंह थे। अपनी इसी सरल स्वभाव की वजह से वह बने सबके 'राजो दा' । 
         उनके राज्य सचिव बनने के बाद  राज्य में  कई छोटे-बड़े कार्यक्रमो में तेजी आई। हर जगह राजो दा एक कामरेड की तरह ही दिखे। पिछले साल 25 अक्टूबर को हुए सीपीआई के जनाक्रोश रैली में पटना के गांधी मैदान में उमड़े जनसैलाब का अंदाजा तो खुद पार्टी को भी नहीं थी। इसका क्रेडिट कामरेडों के साथ-साथ राजो दा को भी जाएगा ही।
इन सबके बावजूद लोकसभा चुनाव आते-आते सभी दलों की तरह सीपीआई में भी आपसी कलह खुल कर सामने आ गई। कारण बने राजो दा। वह भी तब; जब सीपीआई बिहार में चालिस में से मात्र दो सीटों पर लड़ रही है। बेगुसराय और बांका।
           बेगुसराय  को कम्युनिस्टों का गढ़ कहा जाता रहा है। हालांकि पिछले चार बार से सीपीआई हारती रही है।  इसी को आधार बना कर पार्टी ने चार बार से चुनाव हार रहे शत्रुघ्न सिंह को टिकट न देकर वहां से राज्य सचिव राजेन्द्र सिंह पर दांव लगाया है। लेकिन यह बदलाव शत्रुघ्न सिंह और स्थानीय कॉमरेडों को नहीं पच पाई। पार्टी के पुराने कॉमरेड जयराम कहते हैं सीपीआई अगर बेगुसराय से नहीं जीतती है, तो यह कहीं से नहीं जीतेगी। पार्टी ने शत्रुघ्न बाबू को टिकट न देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।”हालांकि  शत्रुघ्न बाबू संसद में बेगुसराय का और राज्यसभा में एक-एक बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। टिकट नहीं मिलने के बाद शत्रुघ्न बाबू पहले हीं एक लाइन में पार्टी छोड़ने की वजह लिखकर पार्टी से इस्तीफा दे चूके हैं। शत्रुघ्न बाबू के समर्थको ने भी पार्टी से इस्तीफा देकर दबाव बनाने का प्रयास किया । लेकिन पार्टी केे
 केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी एक नहीं सुनी। राजेन्द्र सिंह पर उनके पद का दुरूपयोग का भी आरोप  लग रहा है। पार्टी के एक युवा कामरेड कन्हैया कहते हैं कि राजेन्द्र सिंह ने उपर- उपर सेटिंग कर लिया। जबकी बेगुसराय के कामरेडो ने शत्रुघ्न बाबू को चुना था।फेसबुक पर आदित्या मेरे एक पोस्ट के कामेंट में लिखते हैंशत्रुघ्न बाबू लगातार हार रहे थे ऎसे में पार्टी ने जो किया है, सही किया है। एक बार टिकट नहीं मिलने पर वे बागी हो गये। मतलब वे सच्चे कामरेड नहीं हैं। 
                 लेकिन इस कलह में सबसे बड़ा धक्का उन्हे लगा है जो पार्टी के बची-खुची साख को बचाने के लिए बेगुसराय सीट को एक पार्टी के लिए एक बड़ा दांव मानते हैं। पटना के छात्र शाखा सदस्य रंजीत कहते हैं.. "अभी आपसी मतभेद को भुलाकर पार्टी हित में सबको मिल कर काम करना चाहिए इसी में सबका भला है। टिकट बंटवारे को लेकर उपजा विवाद से भले ही राजेन्द्र सिंह पर अंगुली उठ रही हो लेकिन उनके किये काम को नरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वे आज भी युवाओ की टोली के साथ कदमताल करने के लिए तत्पर दिखते हैं।