Thursday, 10 April 2014

नेताजी पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

अबतक नेताजी के नववर्ष, 26 जनवरी, वसंत पंचमी, गणतंत्र दिवस से लेकर होली के मुबारकबाद वाले पोस्टर सड़क के किनारे किसी खाली जगह पर टंगी मिलती थी। ढ़ेर सारे नाम और उनके फोटो वाले पोस्टर। यह कम-से-कम पैसे में अपना विज्ञापन  करने का राजनेताओं का पारंपरिक जुगाड़ तकनीक रहा है।
                       लेकिन राजनीतिक पार्टियों के ऐसे पोस्टर अब बहुत कम दिखते हैं। इनकी जगह प्रोफेशनल तरीके से बनाई गई बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर और अन्य साधनों ने ले लिया है। अब राजनेता अपना प्रचार किसी कॉरपोरेट के प्रोडक्ट की तरह करने लगे हैं। कार्टुनिस्ट गोपाल कहते हैं इन पोस्टरों में कांट्रास्ट है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
                                     अपने प्रचार-प्रसार में आधुनिक तकनीक और मौकों का फायदा उठाने में         सभी प्रमुख पार्टियां होड़ में लगी दिखती हैं। जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं उस समय उनके उपलब्धियों वाले पोस्टर हर बस-स्टाप पर दिख जाते थे। इन पोस्टरों पर प्रगति रिपोर्ट के साथ शीला दीक्षित के फोटो लगे रहते थे।
                         अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही शीला दीक्षित के फोटो वाले विज्ञापन की जगह अरविंद के अगर कोई घूस मांगता है तो उसे ना मत कहिये .... के दो लाइन के पोस्टरों ने ले ली। इनमें केजरीवाल के तस्वीर लगे थे।
                            लेकिन  प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने प्रचार के मामले में चुनाव के नजदीक आते-आते सबको पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन सड़क से लेकर घर तक पीछा नहीं छोड़ती। सड़क किनारे, बस-स्टाप, मेट्रो में हर जगह 'मोदी सरकार'  बनाने के अपील वाले विज्ञापन दिख जाते हैं। अखबार, इंटरनेट, रेडियो, टीवी के जरीये मोदी सरकार के विज्ञापन हमारे घरों में दाखिल हो रहे हैं। बचे जगह कांग्रेस के विज्ञापनों ने ले रखा है।
                         हालांकि सोशल मीडिया में आम आदमी पार्टी सक्रिय दिखती है। लेकिन यह सक्रियता प्रायोजित नहीं दिखती। लेकिन भाजपा ने सोशल मीडिया में अपनी पैठ  बेवसाइट को भारी रकम चुकाकर बनाई है। यू-ट्युब खोलते ही भाजपा या कांग्रेस के अनचाहे विज्ञापन दिख जाते हैं। इस सुविधा को पाने के लिए बेशक करोड़ो रूपय गूगल को इन दोनों प्रमुख पार्टी ने चुकाये होंगे।
पिछले कई दिनों से नरेन्द्र मोदी के फुल पेज वाले विज्ञापन सभी राष्ट्रीय अखबारों में आ रहे हैं। इसे देखते हूए  मोदी के विज्ञापन पर दस हजार करोड़ खर्च करने के कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा का आरोप निराधार नहीं लगता है। सवाल लाजिमी है कि विज्ञापन में किया जा रहा खर्च कितना सही है और खर्च का पैसा कहां से आ रहा है?
लेकिन इस हवा-हवाई प्रचार से नेता का अपनी जनता से दूरी और बढ़ गयी है। हलांकि कई पार्टियां अपना जनसंपर्क जनता से मिलकर कर रहीं हैं। उनकी समस्यओं को सुन रहीं हैं। एआइएसएफ के महासचिव विश्वजीत कहते हैं वामपंथी पार्टियां जनता से सीधे मिलकर अपने एजेंडा को बताती रही हैं। हम एक वोट एक नोट के नारे के साथ मिलते रहे हैं।
                                                       हालांकि राजनीतिज्ञों का कारपोरेट कल्चर सिर्फ दिल्ली जैसे बड़े महानगर में ही नही दिख रहा है। यह छोटे शहरों और गांवो में भी फैल रहा है। जनसंपर्क  की जगह हवा-हवाई प्रचार लेते जा रहे हैं। बिहार के दरभंगा जिले के सोनू इस बार दुखी हैं कि इस बार कोई बड़ा नेता अबतक उनके गांव नहीं आया। वे कहते हैं कि  नेताजी कम-से-कम पांच साल में एक बार वोट मांगने तो आ ही जाते थे। इस बार तो सब फोटो में ही दिखते रहे हैं। तो क्या जनसम्पर्क के बदलते ट्रेंड की वजह से नेताजी अब पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

                                   

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