Monday, 13 October 2014

स्लम के 28 दिन

चार सप्ताह के कम्युनिटी इमरजन के बाद 
फिनिक्स लौट आया है।
जब सात युवा मिलते हैं तब फिनिक्स अपने अस्तित्व में आता है। इन्द्रधनुष के सात 
रंगों की तरह सबके अलग रंग हैं, लेकिन उदेश्य एक है
सीखना है, बदलना है

सितम्बर की नौ तारीख का दिन जब फिनिक्स के सात रंग बिखर गये। फिनिक्स एक बा फिर गायब हो गया। अब सातों के अपने रंग में थे। एक अमित था, एक मधुरा थी, एक बना खालिद, एक गौरव बना, शीतल अपने रंग में थी, राम को अपना रंग मिला, चेतना ने भी अलग होकर अपना रंग पाया। यही वह वक्त था जब हमें खुद को साबित करना था। 
हमें खुद को परखना था। खुद को बदलना था। 
सीखना था और बदलना था। 

लेकिन यह आसान नहीं था। परदेशी बाबू का गांव आना और उनके स्वागत में बच्चे-बड़ों का उमड़ जाना यह फिल्मों में होता है। यहां हमारे हालात बिल्कुल अलग थे। हम घर ढूंढ रहे थे। वहां; जहां एक कमरे में पूरा परिवार रात को सिमट जाता है। हमें वहां अपनी जगह बनानी थी। हमें घर ही नहीं चाहिए था, हमें उनके दिलों में भी जगह चाहिए थी। हमारे कुछ साथियों को एक नया परिवार मिल गया था। कुछ अब भी घर ढुंढनें में लगे थे। जाति की जकड़न, धर्म की दीवार, भाषा की बंदिश, प्रदेश की दूरी इन सबसे हमें पार पाना था। हम कोशिश कर रहे थे।
हम गलतियों से सीख रहे थे, हमें बदलना था।
15 सितम्बर, अमानुष का बर्थ डे। एक्सपेरियंस शेयर के दरम्यान मेरे दोस्तों ने
मेरे जन्मदिन को यादगार बनाया। रिकिता को अलग से थैंक्स।

सप्ताह के तीन दिन मंगल, गुरू और शनि वह दिन होता, जब थोड़ी देर के लिए फिनिक्स का उदय होता। सात फैलो के सात अनुभव जो हमें फिर से उठ कर खड़े होने की प्रेरणा देते। सातों के पास कहने को कुछ न कुछ होता जो हमें सपोर्ट करता। किसी के पास अपने नये परिवार का प्यार होता था, तो किसी के पास कम्युनिटी का सपोर्ट, कोई अपने सहयोगी हेडमास्टर की मदद को साझा करता, किसी के पास नये इनोवेटिव आइडिया। हम मिलते और रिचार्ज होकर वापस अपने कम्युनिटी में लौट जाते।
हम लौट जाते सोचते हुए कि कुछ तो बदलेगा।
अमित और उसका परिवार। सूरत का एक परिवार जिसने साबित किया
जगह घर में नहीं दिलों में होनी चाहिए।
मुकेश अंकल जिनका घर सबके लिए खुला था।

जब फिनिक्स के सात रंग अलग हुए तो कुछ तो आश्वस्त थे लेकिन बाकियों ने अनिश्चितता के साथ घर छोड़ा था। अमित अम्बातलाबारी के आंगनबाड़ी केन्द्र में ठहरा। यहां के लोगों से जो प्यार मिला वह कम्युनिटी इमरजन के सभी निगेटीविटी पर भारी पड़ता है। अम्बातलाबाड़ी के लोगों का प्यार सिर्फ अमित को ही नहीं मिला यह सबको मिला जिसने उधर रुख किया। अमित पहले दिन से ही काम शुरू कर चुका था। सबसे पहले उसने डेंगु-मलेरिया सर्वे करवाया और बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना शुरु किया। हेल्थ अवेरनेस, शिक्षा के महत्व जैसे कई इवेंट उसने करवाये।
चेतना। कल्चरल शॉक्स चेेंज इनटू कल्चरल रेसपेक्ट


चेतना एक मध्यवर्गीय काठियावाड़ी परिवार की सदस्य पहले दिन से ही बन चुकी थी। लेकिन यहां कुछ अलग मामला था। शुरू में कुछ दिन तक यह फैमली इमरजन ही बना रहा, लेकिन समय बितने के साथ फैमली ने समझा, फिर कम्युनिटी ने भी। गरबा के धूम के बीच चेतना लड़कियों की शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण संदेश देने में कामयाब रही।

मधुरा। फैमली मिली कम्युनिटी की तलाश जारी रही।
मधुरा को भी 22 लोगों का एक बड़ा सा परिवार मिल गया था। उस बड़े से परिवार के सदस्यों के बीच मधुरा ने खाना बनाने से लेकर घर के कामों को सीख लिया है। 19 अक्टुबर से सभी छुट्टियों में घर जा रहे हैं। मधुरा की मां जरूर खुश होंगी। उनकी बेटी अब भोर होने से पहले उठने लगी है। आखिरी दिनों में मधुरा इवेंट के लिए चेतना के साथ रही। 

खालिद। बैकग्राउंड में मुकेश, समीर, विलाश। सामंजस्य का नमूना।
खालिद का सफर आसान नहीं रहा। वह स्कूल में रुका। बाद में चार फेलो के साथ एक मुस्लिम कम्युनिटी में। बीमार भी हुआ। कम्युनिटी से अस्पताल फिर ऑफिस में तीन दिन का ठहराव। जज्बे में कमीं नहीं आने दिया। फिर से निकल पड़ा। बच्चों को पढ़ाते हुए, यूथ को समझाते हुए, उन्हें तकनीक और तरकीब बताते हुए। खालीद ने अच्छा तालमेल बिठाया।
शीतल। रंग और कूची से बनायी जगह। 

शीतल स्कूल के चपरासी के घर रही। घर संभाला, झाडु लगाया, खाना भी पकाया और कम्युनिटी के बीच टीचर दीदी भी बन गयी। एक ऐसी लड़की जो टीचर भी थी और दीदी भी। उसने दोनों जिम्मेवारी को बखूबी निभाया। महिलाओं के लिए वह दीदी थी। बच्चों के लिए टीचर। उसने बच्चों के साथ बड़ों को भी रंग और कूची हाथों में पकड़वा दिया और सरलता के साथ 
पढ़ाई के महत्व के संदेश देने में कामयाब रही।

आखिर में फिनिक्स के दो रंग और थे। जो साथ रहे। मैं और मेरे कठिन दिनों का साथी राम। मैंने फैलोशिप देर से ज्वाइंन किया था, इमरजन से ठीक पहले। राम तमिलनाडु से है। उसके लिए भाषा की समस्या थी। शायद हमदोनों को इसी कमजोरी की वजह से साथ रखा गया। हम हप्ते भर तक भटकते रहे। फेसबुक पर उस समय राम ने जो फेसबुक स्टेट्स लिखा था उससे हमारे हालात बखूबी बयान होते हैं।

Community immersion

Thursday stayed at Hindu temple …
Friday stayed at Christian Church …
Saturday stayed at muslim Home…
Today don’t know the place…
Still searching for home to stay…
Living like nomadic
Nice experience
यह सच में नाइस अनुभव था। हम दोनों बीमार भी हुए। अम्बातलाबाड़ी की मौसी ने हमें ठहरने को कहा। राम वहीं रुक गया। मैंने तलाश जारी रखने का फैसला किया। 
राम ने अमित के साथ मिलकर कम्युनिटी का दिल जीत लिया।

मैं दस दिनों तक भागता रहा। मैंने अनुभव किया कि भागने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। अब मैंने ठहर कर जूझने का फैसला किया। मैं बीमार था। मेरे रहने का ठिकाना नहीं था। मैं रोज स्कूल जाता रह़ा। स्कूल नंबर 171। बच्चों को पढ़ाने के साथ योगा, पी.टी, गेम्स, कहानी और बालगीत। हमारे स्कूल के 34 बच्चे अनाथ आश्रम से आते थे। मैं यहां रहकर काम करने का फैसला किया। काफी भागदौड़ के बाद मुझे यहां रहने की जगह मिल गई। मुझे 94 बच्चों की कम्युनिटी मिल गयी थी। मैंने बच्चों के साथ कविता रची, कहानी लिखा, क्रिकेट और कैरम खेला, चित्र बनाये। भगत सिंह और गांधी के जन्मदिन पर नैतिक शिक्षा और देशभक्ति की सीख देने की कोशिश की। कैंपस की सफाई की। ये बेहतरीन दिन थे।
गौरव। कई काम अधूरे छो़ड़ कर लौटना पड़ा।
मुझे कोई अफसोस नहीं था कि मुझे कोई कम्युनिटी नहीं मिली। मुझे इवेंट भी करना था। मैंने इसके लिए जे.के.पी नगर को चुना, क्योंकि यहीं से सबसे ज्यादा बच्चे आते थे। यहां सबसे जरुरी था शिक्षा को लेकर कोई इवेंट कराना।  लेकिन यह  सबसे मुश्किल भी था। मैं रोज कम्युनिटी जाता रहा। बिना परवाह किये कि लोग मेरे बुलाने पर आते हैं कि नहीं। आखिर मैंने इमरजन के आखिरी दिनों में शिक्षा के सोपान: समस्या और समाधान विषय पर परिचर्चा करा पाने में सफल रहा। बच्चे-बड़े सभी मुहल्ले में शैक्षणिक माहौल बनाने के लिए जुटे और तय समय से दुगुने तक सुनते 
रहे।
परिचर्चा में रिकिता, गांधी फेलो रुची, डा. मुर्तुजा, समीर व श्याम भाई ने कम्युनिटी का मार्गदर्शन किया।
अाश्रम के बच्चों ने पैनल को अपने पेंटिग भेजकर अामंत्रित किया।
यह मेरे लिए इनोवेटिव था।
यह मुझे दोबारा सीआई के लिए प्रेरित करेगा।
एक समय ऐसा भी आया जब हमारे स्लम इमरजन के 28 दिन पूरे हो चुके थे। हम लौटने वाले थे। हर कोई कहीं न कहीं से जुड़ चुका था। जड़ें मिट्टी तलाश ही लेती हैं।  अम्बातलाबरी में सभी मायूस थे। अनाथालय के बच्चों के हाथ विदा नहीं कर रहे थे, वापस बुला रहे थे। सात रंगों के जुड़ने का वक्त आ गया था।
 फिनिक्स फिर से लौट आया है।

बहुत कुछ सीखकर; थोड़ा बहुत बदलकर

No comments:

Post a Comment