मार्च गांव गोदाइपट्टी
जिला दरभंगा
बिहार
मेरे प्यारे दोस्त
यहाँ मौसम बदल रहा है। ठंड ने अपने जाने की तैयारी शुरू कर दी है। मेरी खिड़की से दिखने वाले पलास ने सारे पत्ते गिरा दिये हैं। अब सिर्फ लाल-लाल फूल बच गये हैं। नागार्जुन के 'पत्रहीन नग्न गाछ' की तरह। गेहूँ की बालियां पक गई हैं। किसान फसल काटने की तैयारी में लग गये हैं। आम पर मँजरी बौरा गया है। अबकी आम से डालियां लदने वाली है। हमारे यहां हर गांव में आम के बाग मिल जाएंगे। तरह-तरह के आम- कपूरिया, किसनभोग, कलकत्तिया, सिपिया। लेकिन मालदह आम की तो बात ही कुछ और है। यहां के आम के मिठास का राज यहां की मिट्टी है। चूना वाली मिट्टी होने के कारण यहां के आम इतने मीठे होते हैं। वैसे हमारी पहचान सिर्फ आम की मिठास से ही नहीं है। हमारी पहचान हमारी मीठी बोली से भी है। यहां मैथिली और हिन्दी बोली जाती है। भाषा के आधार पर मैथिली भाषा-भाषी क्षेत्र को 'मिथिला' के नाम से पहचान मिली है। दरभंगा उस मिथिला का प्रतिनिधि है। दरभंगा को बंगाल के द्वार के नाम से जाना जाता है। यहां की संस्कृति में बांग्ला और हिन्दी पट्टी का फ्यूजन देखने को मिल जाएगा। दरभंगा अपनी समृद्ध और विशिष्ट परंपराओं के लिए भी जानी जाता है।
मिथिला के बारे में एक कहावत प्रचलित है
आम पान मछली मखान ।
ये सब हैं मिथिला के पहचान।।
दरभंगा मखाना उत्पादन में अपना
महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह हमारे पूर्वजों की प्रकृति से तालमेल बिठा कर जीने
का एक बेजोड़ नमूना है। दरभंगा गंडक और बागमती दो नदियों के पाटों के बीच का भू-भाग
है। बरसात के समय नेपाल से आनेवाली वाली बाढ़ के पानी को तालाब बना कर संरक्षित कर
लिया जाता रहा है। इस संरक्षित पानी का उपयोग वर्ष भर होता है। तालाब में मछलियां
पलती हैं तो उसके सतह पर मखाना की डालियां उतराती हैं। इसी तालाब के चारो ओर पान के
पत्ते मनोरम प्राकृतिक दृश्य पैदा करते है। प्रकृति की गोद में बैठकर विद्यापति ने
प्रकृति को समर्पित गीत लिखे जो साल बाद भी यहां के अमराइयों में गूंजते हैं।
विद्यापति की परम्परा को यहां के विद्वानों ने आगे बढ़ाया है। गोनू झा के लघु
हास्य कथा तो लोक कथाओं का हिस्सा बने हुए हैं।
मिथिला पेटिंग के बारे में तो आप जानते ही होंगे। हमारे यहां हर घर में मिथिला पेंटिग के नमूने देखने को मिल जाएंगे। इसके अलावे बिंदिया आर्ट के भी नमूने मिलेंगे। इसमें बिन्दी से विभिन्न एतिहासिक पात्रों का चित्रण किया जाता है।
मिथिला में कुछ ऐसे त्योहार
भी मनाये जाते हैं जो सिर्फ यहां के हैं। इनमें एक पर्व है 'सामा चकेवा'। सामा चकेवा
नवयुवतियों के द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है जो जनवरी के महीने में मनाया जाता
है। एक खास दिन होता है जिसमें दिन की शुरूआत सत्तू पीने से होती है। इसे सतुआनी नाम भी
दिया गया है।
दरभंगा ज्ञान-विज्ञान
का केन्द्र रहा है। यहां बिहार का एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय है। ललित नारायण
मिथिला विवि शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। इसके विस्तृत अहाते में
मनोकामना मंदिर और श्यामा मंदिर है। मनोकामना मंदिर के बारे में किंवदंती है कि
यहां जो भी इच्छा मांगी जाती है वह पूरी हो जाती है। मंदिर के दीवारों पर हजारों
मन्नतें लिखी मिलेंगी।
दरभंगा वर्षों से मेडिकल टुरिज्म का केन्द्र रहा है। यहाँ अब भी
पड़ोसी देश नेपाल से इलाज के लिए लोग आते हैं। दरभंगा मेडिकल कॉलेज चिकित्सा का
पुराना केन्द्र रहा है। शुरुआती दौर में ही आकाशवाणी और दूरदर्शन के केन्द्र यहां
स्थापित किये गये थे। इस छोटे से शहर में दो संग्रहालय हैं।
जो यहां की समृध्द इतिहास के
सबूत हैं। महराजा लक्ष्मीश्वर सिंह म्युजियम में दरभंगा महराज से जुड़े बहुमूल्य
कला सामग्री को सहेज कर रखा गया है। दरभंगा महराज अपनी कला प्रेम और समृध्दि के लिए
जाने जाते हैं। उनके कलाकारीयुक्त भवनों के अवशेष देखे जा सकते हैं। संरक्षण के अभाव
में इन महलों का क्षरण हो रहा है। दूसरे संग्रहालय चंद्रधारी म्युजियम में
मिनियेचर पेंटिग, आधुनिक पेटिंग, शीशे के कटिंग, आदि हैं।
दरभंगा से 20 किलोमीटर दूर अहिल्या स्थान है। कुशेश्वर नाथ स्थान, गौतम
स्थान आदि यहां के दर्शनीय स्थल है। रामायण में इन जगहो का जिक्र मिलता है। इन
जगहों के बारे में अनेक किंवदंतियां
प्रचलित हैं। यहीं उचैठ स्थान है जहां
कालिदास को देवी काली ने वरदान दिया था। कुशेश्वर ब्लाक के सिंगिया चौर के
7000 एकड़ फैले क्षेत्र में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश साइबेरिया सहित कई देशों
के 9 प्रजाति के प्रवासी पक्षी हर साल आते हैं।
और भी बहुत कुछ है हमारे यहाँ कभी आइये।आप भी हमारे मेहमाननवाजी के कायल हो जाएंगे।
तुम्हारा
गौरव




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