एचओडी यानी
विभागाध्यक्ष इतने जटिल प्राणी होते हैं, कि इनके महानता को बताना मेरे जैसे
फिसड्डी पत्रकार के बस की बात नहीं है। सबको अदना समझने वाला। खुद लेट-लतिफी
के शौकिन। बावजुद दुसरों से सेकेंड के सुई के हिसाब से चलने की अपेक्षा। अडियल,
बदमाश और कुछ-कुछ बदनाम सा आदमी। चले तो नजर सीधी मानो गले को प्लास्टर आफ पेरिस
से मढ़ दिया गया हो। अरदली रखने का शौकिन। हाथ काल बेल और नजर दरवाजे पर। मजाल की चपरासी से देरी हो
जाए। जनाब आफिस में बैठ कर क्यों ना नैन
मटक्का कर रहें हों, दिखाना ऐसे कि शिक्षा में आमूलचूल बदलाव की सारी जिम्मेवारी
भारत सरकार ने इन्हे ही दे रखी हो। उनके योग्यता को देख कर। इस महान काम में कोई किस्मत का मारा छात्र बाधक बन जाए तो इनके कोप से रक्षा स्वंय सरस्वती भी नहीं कर
सकती हैं।वैसे सरस्वती की कृपा से इन्हे ज्ञान की कमी नहीं होती। ज्ञान तो बांटना भी चाहते हैं। लेकिन बांट नहीं
पाते। बड़ी-बड़ी जिम्मेवारियां पीछा ही नही छोड़ती। फिर भी ज्ञान देने की जो
आदत पड़ चुकी है सो छुटती नहीं। वक्त निकाल ही लेते हैं। आते हैं तो मानों एहसान
कर रहें हो। कक्षा में उनके आगमन पर सीट छोड़ना शिष्टाचार की अनिवार्य शर्त है।
गुड मार्निंग का समवेग स्वर इनका प्रिय मंत्र है जिससे ये प्रसन्न होते हैं।
महादेव के बम बम बुरुक की तरह। साइलेंस इन्हे बहुत पसंद होता है। वक्त का पुरा
उपयोग करने में विश्वास रखते हैं। क्लास मे रहते हुए भी पूरी दुनिया से संपर्क बनाए रहते हैं। ये थोड़े नॉस्टेलजिक टाइप भी होते हैं। इनकी पुरानी स्मृति इनका पीछा
नहीं छोड़ती। पाठ्यक्रम में उपलब्धियों का बखान ऐसा चैप्टर होता है, जिसका
पुनरावृति पूरे कोर्स में किया जाता है। छात्रों में सफलता के लिए प्रेरणा उत्पन्न
करने हेतु सफल व्यक्ति से मिलवाते रहते हैं। इनमें ज्यादातर उनके पुराने छात्र ही होते हैं जो अपने भाषण के अंत में सफलता का पुरा क्रेडिट अपने महान गुरु को देते
हैं। इस समय छात्रों से अपेक्षा की जाती है कि देर तक छात्र ताली पीटे। जितनी देर
तक ताली बजती रहती है। इन्हे उसके समानुपात में खुशी प्राप्त होती है। ये अपनी
प्रशंसा सुनने के आदत से त्रस्त होते हैं। सो राजा महराजा की तरह ये भाट अपने कुछ
छात्रों को ही बना लेते हैं। आधुनिक समाज में इन्हे ही चमचा कहा जाता है जिसकी
चर्चा आगे करेंगे।
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