‘एम एफ हुसेन की कहानी अपनी जुबानी’ को सुंदर लेखनी से किताब की शक्ल देने वाली राशदा सद्दिकी ने एम एफ हुसैन के इस आत्मकथा लिखने कि प्रक्रिया के बारे में लिखती हैं
हुसेन ने अपनी कहानी अपनी जुबानी लिखनी शुरु की तो वह जहाँ कहीं भी बैठे हों बस लिखते रहते। हुसेन की आत्मकथा लिखी गई थी, पेपर नैपकीन पर , चिट्ठी के पीछे की खाली सतह पर टेबल मैट पर लिफाफा खोल कर बनाये गये पर्चे पर और जो अच्छे कागजों पर लिखे जाते वह पुलिंदा बनकर जेब से निकलती ।
इन्ही टुकड़ो को जोड़कर एक किताब का रूप राशदा ने दिया है।
वे आगे लिखती हैं “लिखाई तो है ही उनकी खुबसुरत, फिर जुबान शायराना, बयान का अंदाज निराला।
राशदा के कहे मुताबिक हुसेन के जुबानी की कुछ अंश से आप कुछ अंदाजा लगा सकते हैं।
एक उड़ने वाले घोड़े पर, पैर रकाब में डाले बना कलाकार और दुनिया के लंबाई चौड़ाई में चक्कड़ मार रहा है।
मकबूल के स्लेट पर हूबहू वही चिड़ीया ब्लैकबोर्ड से उड़कर आ बैठी। दस में दस नंबर
लोहियाजी ने लड़के की पीठ थपकी और विषय बदलते हुए पुछा “यह जो तुम बिरला जी और टाटा के ड्राइंगरुम में लटकने वाली तस्वीरो में घिरे हो, जरा बाहर निकलो। रामायण को पेंट करो इस देश की सदियों पुरानी दिलचस्प कहानी है।
लोहिया कि यह बात लड़के को तीर की तरह चुभी और चुभन वर्षों रही । आखिर लोहियाजी के मौत के फौरन बाद उनकी याद में रंग भरे और कलम लेकर बदरीविशाल के मोती महल को तकरीबन डेढ़ सौ पेंटिग से भर दिया। दस साल लगे कोई दाम नही मांगा सिर्फ लोहियाजी की जबान से निकले शब्दो का मान रखा।
निर्मल वर्मा लिखते हैं ‘’हुसैन की आत्मकथा की यह अनोखी और अद्भुत विशेषता है, कि वह अनुवाद की वह बैसाखी से नहीं, सीधे चित्रकला की शर्तों पर, बिंबो के माध्यम से अपनी भाषा को रुपांतरित करती है। ’’
रंग और शब्द जहां एक हो जाते हैं। चित्र जहां शब्द बन जाते हैं। हर पंक्ति एक बिंब का प्रस्तुतिकरण करती है। वाणी प्रकाशन की यह किताब आइआइएमसी की पुस्तकलय में मिल जाएगी। कई भ्रांतियां जो हमारे इस देशी परदेशी मकबूल के लिए पैदा कर दी गई हैं, शायद इस किताब को पढ़ कर हम एम एफ हुसैन के मकबूल को जान पाएँ।
Mast likha hai.....
ReplyDeleteLikhega India aur Badhega India.
Keep it up comrade..m....