Wednesday, 15 October 2014

यहां सिर्फ किताबों से बात होती है।

शाला नंबर 203
 यहां मेरा पहला विजिट था। हेडमास्टर से बातचीत की शुरूआत स्कूल की समस्या से शुरू हुई। यहां टीचर की कमी थी। जो हर गैर गुजराती स्कूलों की कॉमन समस्या है। हर क्लास में सौ से उपर बच्चे थे। समाधान की हर बात टीचर की कमी पर अटक जाती थी। शिक्षकों की कमी से कोई न कोई क्लास खाली पड़ा रहता। इसके लिए हमने एचएम को लाइब्रेरी सेशन रखने का सुझाव दिया। हेडमास्टर साहब को यह बात अटपटी लगी। बच्चे शांत होकर कैसे पढ़ सकते हैं?  मैनें उस दिन दो घंटे की कक्षा ली। यह हिन्दी स्कूल था। हमने पांचवी के बच्चों को बालगीत करवाये, गणित का एसेसमेंट लिया, समाज विज्ञान पढ़ाया।
पुस्तकें सबसे अच्छी दोस्त होतीं है, और पुस्तकालय में हम सबसे अच्छे दोस्त से मिलने जाते हैं। चलो इस कक्षा को घंटेभर के लिए इसे पुस्तकालय बना देते हैं। यहां सिर्फ किताबों से बात होती है।

मुझे उन्हे बिना बात किये कक्षा में पढ़ना सीखाना था। मैंने उन्हे लाइब्रेरी में पढ़ने की ट्रेनिंग देने की कोशिश करने लगा। पाठ को जल्द से जल्द खत्म करना। कुछ आसान सवाल पूछना। फिर अगले चैप्टर की ओर बढ़ जाना। बच्चे बात करने लगते। मैं उन्हे याद दिलाता कि यहां बोला नहीं जाता। थोड़ी देर के लिए क्लास शांत रहा। मैं वहां से बाहर निकल गया। शोरगुल फिर शुरु। मैंने दोबारा समझाया। अगली बार बाहर निकलने पर सच में शोर नहीं था। बच्चे पढ़ रहे थे और होड़ में थे कि कौन सबसे पहले चैप्टर पूरी करता है। क्लास खत्म होने पर वे पूछ रहे थे। आप सब दिन आओगे. कल भी आओगे। एक बच्चे ने कहा इतने स्नेह से कोई नहीं पढ़ाता आप रोज आना। मैं खुश था। इसे बचा के रखना था। यह स्लम इमरजन के पांचवा दिन की बात है।

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