पहली
बार उस बुर्जुग को युवाओं की टोली में कदमताल मिलाते नंगे पैर चलते देखा था। पुलिस के डंडे की चोट उनके सर पर भी
पड़ी थी। सर से खून रिस-रिस कर जम चुका था। कुर्ता का चिथड़ा उनके बदन से झूल रहा
था।उनके पैर का जूता पुलिस के साथ हुए भाग दौ़ड़ में कहीं छूट चुका था। पूरे दिन पुलिस कस्टडी में रखने के बाद सभी आंदोलनकारियों
को पुलिस ने छोड़ दिया था। हम सब रेनबो स्टेडियम से पैदल नारा लगाते चिड़ियांटाड, स्टेशन होते जनशक्ति पहुँचे थे। यहीं
उस बुर्जुग से मेरा पहला परिचय हुआ था। ये सीपीआई के नये राज्य सचिव कामरेड राजेन्द्र
सिंह थे। अपनी इसी सरल स्वभाव की वजह से वह बने सबके 'राजो दा' ।
उनके राज्य सचिव बनने के बाद राज्य में कई छोटे-बड़े कार्यक्रमो में तेजी आई। हर जगह राजो दा एक कामरेड की तरह ही दिखे। पिछले साल 25 अक्टूबर को हुए सीपीआई के जनाक्रोश रैली में पटना के गांधी मैदान में उमड़े जनसैलाब का अंदाजा तो खुद पार्टी को भी नहीं थी। इसका क्रेडिट कामरेडों के साथ-साथ राजो दा को भी जाएगा ही।
इन सबके बावजूद लोकसभा चुनाव आते-आते सभी दलों की तरह सीपीआई में भी
आपसी कलह खुल कर सामने आ गई। कारण बने राजो दा। वह भी तब; जब सीपीआई बिहार में चालिस में से मात्र दो सीटों पर लड़ रही है। बेगुसराय और बांका।
बेगुसराय को कम्युनिस्टों का गढ़ कहा जाता रहा है। हालांकि पिछले चार बार से सीपीआई हारती रही है। इसी को आधार बना कर पार्टी ने चार बार से चुनाव हार रहे शत्रुघ्न सिंह को टिकट न देकर वहां से राज्य सचिव राजेन्द्र सिंह पर दांव लगाया है। लेकिन यह बदलाव शत्रुघ्न सिंह और स्थानीय कॉमरेडों को नहीं पच पाई। पार्टी के पुराने कॉमरेड जयराम कहते हैं “सीपीआई अगर बेगुसराय से नहीं जीतती है, तो यह कहीं से नहीं जीतेगी। पार्टी ने शत्रुघ्न बाबू को टिकट न देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।”हालांकि शत्रुघ्न बाबू संसद में बेगुसराय का और राज्यसभा में एक-एक बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। टिकट नहीं मिलने के बाद शत्रुघ्न बाबू पहले हीं एक लाइन में पार्टी छोड़ने की वजह लिखकर पार्टी से इस्तीफा दे चूके हैं। शत्रुघ्न बाबू के समर्थको ने भी पार्टी से इस्तीफा देकर दबाव बनाने का प्रयास किया । लेकिन पार्टी केे
केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी एक नहीं सुनी। राजेन्द्र सिंह पर उनके पद का दुरूपयोग का भी आरोप लग रहा है। पार्टी के एक युवा कामरेड कन्हैया कहते हैं कि “राजेन्द्र सिंह ने उपर- उपर सेटिंग कर लिया। जबकी बेगुसराय के कामरेडो ने शत्रुघ्न बाबू को चुना था। ”फेसबुक पर आदित्या मेरे एक पोस्ट के कामेंट में लिखते हैं ”शत्रुघ्न बाबू लगातार हार रहे थे ऎसे में पार्टी ने जो किया है, सही किया है। एक बार टिकट नहीं मिलने पर वे बागी हो गये। मतलब वे सच्चे कामरेड नहीं हैं।”
लेकिन इस कलह में सबसे बड़ा धक्का उन्हे लगा है जो पार्टी के बची-खुची साख को बचाने के लिए बेगुसराय सीट को एक पार्टी के लिए एक बड़ा दांव मानते हैं। पटना के छात्र शाखा सदस्य रंजीत कहते हैं.. "अभी आपसी मतभेद को भुलाकर पार्टी हित में सबको मिल कर काम करना चाहिए इसी में सबका भला है।“ टिकट बंटवारे को लेकर उपजा विवाद से भले ही राजेन्द्र सिंह पर अंगुली उठ रही हो लेकिन उनके किये काम को नरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वे आज भी युवाओ की टोली के साथ कदमताल करने के लिए तत्पर दिखते हैं।
उनके राज्य सचिव बनने के बाद राज्य में कई छोटे-बड़े कार्यक्रमो में तेजी आई। हर जगह राजो दा एक कामरेड की तरह ही दिखे। पिछले साल 25 अक्टूबर को हुए सीपीआई के जनाक्रोश रैली में पटना के गांधी मैदान में उमड़े जनसैलाब का अंदाजा तो खुद पार्टी को भी नहीं थी। इसका क्रेडिट कामरेडों के साथ-साथ राजो दा को भी जाएगा ही।
बेगुसराय को कम्युनिस्टों का गढ़ कहा जाता रहा है। हालांकि पिछले चार बार से सीपीआई हारती रही है। इसी को आधार बना कर पार्टी ने चार बार से चुनाव हार रहे शत्रुघ्न सिंह को टिकट न देकर वहां से राज्य सचिव राजेन्द्र सिंह पर दांव लगाया है। लेकिन यह बदलाव शत्रुघ्न सिंह और स्थानीय कॉमरेडों को नहीं पच पाई। पार्टी के पुराने कॉमरेड जयराम कहते हैं “सीपीआई अगर बेगुसराय से नहीं जीतती है, तो यह कहीं से नहीं जीतेगी। पार्टी ने शत्रुघ्न बाबू को टिकट न देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।”हालांकि शत्रुघ्न बाबू संसद में बेगुसराय का और राज्यसभा में एक-एक बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। टिकट नहीं मिलने के बाद शत्रुघ्न बाबू पहले हीं एक लाइन में पार्टी छोड़ने की वजह लिखकर पार्टी से इस्तीफा दे चूके हैं। शत्रुघ्न बाबू के समर्थको ने भी पार्टी से इस्तीफा देकर दबाव बनाने का प्रयास किया । लेकिन पार्टी केे
केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी एक नहीं सुनी। राजेन्द्र सिंह पर उनके पद का दुरूपयोग का भी आरोप लग रहा है। पार्टी के एक युवा कामरेड कन्हैया कहते हैं कि “राजेन्द्र सिंह ने उपर- उपर सेटिंग कर लिया। जबकी बेगुसराय के कामरेडो ने शत्रुघ्न बाबू को चुना था। ”फेसबुक पर आदित्या मेरे एक पोस्ट के कामेंट में लिखते हैं ”शत्रुघ्न बाबू लगातार हार रहे थे ऎसे में पार्टी ने जो किया है, सही किया है। एक बार टिकट नहीं मिलने पर वे बागी हो गये। मतलब वे सच्चे कामरेड नहीं हैं।”
लेकिन इस कलह में सबसे बड़ा धक्का उन्हे लगा है जो पार्टी के बची-खुची साख को बचाने के लिए बेगुसराय सीट को एक पार्टी के लिए एक बड़ा दांव मानते हैं। पटना के छात्र शाखा सदस्य रंजीत कहते हैं.. "अभी आपसी मतभेद को भुलाकर पार्टी हित में सबको मिल कर काम करना चाहिए इसी में सबका भला है।“ टिकट बंटवारे को लेकर उपजा विवाद से भले ही राजेन्द्र सिंह पर अंगुली उठ रही हो लेकिन उनके किये काम को नरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वे आज भी युवाओ की टोली के साथ कदमताल करने के लिए तत्पर दिखते हैं।

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