अंत भला तो सब भला।
हलांकि यह जुमला तब कहा जाता है जब काम की खराब शुरूआत के बावजूद अंत सुखद हो।
लेकिन आईआईएमसी के वर्तमान सत्र की शुरूआत
भी सुखद थी और अंत भी यादगार। इस पड़ाव को यादगार बनाया सिनेमंच की सत्र की आखिरी
पेशकश फिरोज अब्बास खान निर्देशित फिल्म ‘देख तमाशा देख’ ने।
ये वही फिरोज अब्बास
खान हैं जिनकी साल 2007 में आई विवादास्पद फिल्म 'गांधी माई फादर' ने खूब प्रशंसा
बटोरी थी। इससे पहले भी इन्होने थियेटर में खूब नाम कमाया है। 'गांधी माई फादर' के
लिए इन्हे बेस्ट स्क्रिन प्ले के लिए 2008 में नेशनल आवार्ड मिल चुका है। इसी कैटगरी
में 2007 का ‘एशिया पैसिफिक स्क्रिन अवार्ड’ इनके नाम रहा।
नौ सालों के बाद फिरोज फिर एक बार सच्ची घटनाओं पर आधारित वैचारिक और व्यंग्यात्मक फिल्म ‘देख तमाशा देख’ के साथ
आये हैं। फिल्म महाराष्ट्र के एक गांव की पृष्टभूमि पर बनी है। यह समसामयिक
राजनैतिक-सामाजिक विसंगतियो पर बनी फिल्म है। फिल्म में कई गंभीर विषयों को
व्यंग्य के माध्यम से निर्देशक ने उठाया है। फिल्म ने साबित किया है कि हास्य फिल्में
बिना फुहड़पन के भी बनाई जा सकती है।
इस फिल्म में कई
कहानियां समानांतर रूप से चलती है। फिल्म की कहानी एक टांगेवाले का एक राजनेता के
पोस्टर तले दब कर मरने से शुरु होती है। टांगेवाले के मरने के बाद हिन्दू और
मुसलमान उसके शव पर अधिकार के लिए झगड़ने लगते हैं। यह झगड़ा दंगा का रूप ले लेता
है। पूरी कहानी इसी के आसपास घूमती है। हालांकि केन्द्रीय कहानी के साथ कई कहानियां
साथ-साथ चलती हैं। जिनमे दंगो के बीच शब्बो और प्रशांत का निर्दोष प्यार और उसका दुखांत अंत भी
है।
इस फिल्म में कई नए प्रयोग
देखने को मिल जाएंगे। फिल्म कई टुकड़ो में है। हलांकि निर्देशक इसे मुख्य कहानी से
जोड़ने में सफल रहे हैं। कई विसंगति को दो घंटे की फिल्म में दिखाने की कोशिश में
कभी-कभी मुख्य कहानी पीछे छूटती लगती है। हलांकि दमदार और चुभते व्यंग्य दर्शक को
बांधे रखने में सफल रहते हैं। फिल्म के सटीक संवाद और मजबूत कहानी की वजह से पूरी
फिल्म में बैकग्राउंड संगीत का न होने का पता पूरी फिल्म में नहीं चलता है।
निर्देशक फिरोज अब्बास खान अपने इन प्रयोगो के बारे में कहते हैं “अगर मैं प्रयोग न करूँ तो कुछ नया नहीं कर
पाउंगा, फिल्म की कहानी इतनी मजबूत है कि इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक की जरूरत ही
नहीं है।”
फिल्म को रियल बनाने
में कलाकारों ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया है। ज्यादातर कलाकार मराठी रंगमंच
से जुड़े रहे हैं। इन कलाकारों ने कहानी की मराठी पृष्टभूमि को जीवंत कर दिया है।
फिल्म में एकमात्र सतीश कौशिक जाने-पहचाने चेहरे मिलते हैं। इन्होने फिल्म में
मोटु सेठ के चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है। कहानी का प्रधान चरित्र टांगेवाला पूरी फिल्म में सिर्फ पोस्टर में ही दिखता है। फिल्म में कई चरित्र नायक जैसे
लगते हैं।
फिल्म में प्रतीकों
का प्रयोग किया गया है, जो गंभीर दर्शक की मांग करती है। आम बोल-चाल के शब्दो का
प्रयोग और आम लोगो की कहानी की वजह से इसे छोटे शहरों में भी दर्शकोें के द्वारा पसंद की जाएगी; इसकी
पूरी संभावना है। फिल्म जिस तरह मीडिया के बदलते स्वरूप, धार्मिक कट्टरता, गरीबी जैसे सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे को उठाया है। इस
काम के लिए फिरोज तारीफ के काबिल हैं।
कहानी के अंत में पुलिस इंस्पेक्टर अपनी काबिलियत के बदौलत दंगो पर काबू पा लेता है और सबकुछ शांत हो जाता है। यहां
फिल्म संदेश देती है कि प्रशासन की मुस्तैदी से हालात काबू किये जा सकते हैं।
फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान निर्देशक फिरोज अब्बास खान, संस्थान के मीडिया गुरू
आनंद प्रधान और कई फिल्म के जानकार मौजूद थे। फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के
विभिन्न पक्षों पर चर्चा हूई। इस दौरान उन ज्वलंत सवालों पर भी बहस हुई जो फिल्म
में उठाए गए थे; जैसा कि हर बार सिने मंच में होता है। देर शाम तक पूरा कुनबा जमा
रहा। लेकिन आपको इस फिल्म को देखने के लिए अगले शुक्रवार तक का इंतजार करना
पड़ेगा।








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