अरविंद केजरीवाल को एक ऑटोवाले ने कल
थप्पड़ मार दिया। पहले माला पहनाई फिर अपने गुस्से का इजहार किया। क्योंकि 49 दिन कि ‘लंगड़ी सरकार ’ उसके लिए कुछ नहीं
किया। विरोधी-समर्थक दोनों इस घटना के बाद सलाह देने लगे हैं। कुछ लोग गुस्से में
हैं कोई खुशी जाहिर कर रहें हैं। एक समर्थक को लगता है कि यह सब विरोधियों के
इशारे पर हो रहा है।
अरविंद केजरीवाल को एक ऑटोवाले ने कल
थप्पड़ मार दिया। पहले माला पहनाई फिर अपने गुस्से का इजहार किया। क्योंकि 49 दिन कि ‘लंगड़ी सरकार ’ उसके लिए कुछ नहीं
किया। विरोधी-समर्थक दोनों इस घटना के बाद सलाह देने लगे हैं। कुछ लोग गुस्से में
हैं कोई खुशी जाहिर कर रहें हैं। एक समर्थक को लगता है कि यह सब विरोधियों के
इशारे पर हो रहा है।
फेसबुक पर आइआइएमसी के प्रोफेसर
आनंद प्रधान के एक पोस्ट के कामेंट में प्रमोद
राय लिखते हैं “अफसोस कि अरविंद के ऊपर हो रहे हमलों को ‘जनता का गुस्सा ’ बताने और प्रचारित
करने का तंत्र भी इन दिनों बेहद आक्रामक और कुंठित रुख अख्तियार किए हुए है। आश्चर्य कि जनता ने महज 49 दिन की सरकार से
इतनी अपेक्षाएं लगा रखी थीं और वो जो 49 साल से भी ज्यादा समय तक शासन करते
रहे उन्हें थप्पड़ मारना तो दूर उनकी अभेद्य सुरक्षा को भी उनके व्यक्तित्व-वैभव
से जोड़कर देखा जा रहा है। महज 49
दिन के कार्यकाल के खिलाफ अगर जनता
में वाकई इतना आक्रोश होता तो देश अब तक 49 क्रांतियां देख चुका होता। वैसे 49 साल वालों को अगर
जनता इतना ही प्यार करती है तो कम से कम एक बार उन्हें अपनी एसपीजी, जेड प्लस, प्राइवेट गनर और
गुंडों के घेरे से बाहर निकलकर जनता के बीच में जरूर जाना चाहिए, क्या पता जनता
उन्हें फूलों से लाद दे।“ दिल्ली में एक सभा के दौरान
मुक्के मारना, वाराणसी और गुजरात में अंडे और स्याही का फेका जाना, जगह-जगह काले
झंडे दिखाना, और फिर एक ऑटोवाले का थप्पड़ जड़ देना। क्या वाकई यह जनता का गुस्सा हो
सकता है? क्या 49 दिनों में ही केजरीवाल इतने अलोकप्रिय हो गए कि उनका विरोध इस
तरह किया जाए? जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार, मंहगाई, और अनगिनत समस्याओं के लिए तो
राहुल, मनमोहन को थप्पड़ नहीं मारती। डीएलएफ के साथ विवादित जमीन के घोटाले के आरोपी राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका वाड्रा आज
भी कांग्रेस की स्टार प्रचारक बनी हुई हैं। बीजेपी के 22 उम्मीदवारो पर रेप जैसे संगीन आरोप लगे हैं। अगर
इनका विरोध हो तो जनता का गुस्सा समझ आता है। यहां जनता की मजबूरी है कि इनके
अभेद्य दुर्ग को पार कर पाना इन साधारण लोगों के लिए आसान नहीं है। बच जातें हैं
तो आम आदमी की छवि बनाने वाले अरविंद केजरीवाल। बिना किसी लाव-लश्कर के साथ चलने
वाले अरविंद के पास पहुंचना सबसे आसान है। यही अरविंद के लिए परेशानी का सबब बन
चुका है। अरविंद ने ऐसा कर एक नई शुरूआत तो नहीं की थी लेकिन इसका असर दूसरी पार्टीयों के नेताओं पर जरूर पड़ा था। चाहे भाजपा शासित राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हों या उत्तरप्रदेश के सपाई मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई राजनेताओं ने अपने सुरक्षा खर्चों और ताम-झाम में कटौती
की थी। उनके समर्थक उनपर हो रहे लगातार
हमले से सशंकित हैं । फेसबुक पर आम आदमी पार्टी के समर्थक अब्दुल एच हैदर लिखते हैं “इन भाड़े के टटुओ से और आशा भी क्या कर
सकते हैं! केजरीवाल को सिक्युरिटी ले लेनी चाहिए, उन कायरो ने
जब महात्मा की हत्या की तो आम आदमी की क्या बिसात!”
एक साधारण आदमी के चाल-ढाल को अपनाकर अरविंद केजरीवाल ने एक अच्छी शुरूआत की थी। लेकिन इन घटनाओ के बाद सवाल उठता है कि क्या हमारा समाज इस लायक है कि एक नेता परंपराओं को तोड़ कर आम आदमी की तरह रह सके।
एक साधारण आदमी के चाल-ढाल को अपनाकर अरविंद केजरीवाल ने एक अच्छी शुरूआत की थी। लेकिन इन घटनाओ के बाद सवाल उठता है कि क्या हमारा समाज इस लायक है कि एक नेता परंपराओं को तोड़ कर आम आदमी की तरह रह सके।
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| थप्पड़ मारने वाले ऑटो चालक से मिलते अरविंद केजरीवाल साथ में मनीष सिसोदिया। सभी फोटो फेसबुक से। |
पटनाविवि की काउंसलर नैन्सी कहती हैं “हम और कितने दिन लोकतंत्र में भी राजशाही के प्रतीक को आज के राजनेताओं में जिंदा देखेंगे। आज अरविंद केजरीवाल को इस देश की जरूरत है। उस ऑटोवाले के थप्पड़ की वजह से सिक्योरिटी ले लेने से उनके कुछ समर्थक भले ही राहत महसूस करें लेकिन इससे मेरे जैसे आम आदमी पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।“
फिलहाल अरविंद केजरीवाल उस ऑटोवाले मिलकर अपनी
बड़प्पन दिखा चुके हैं। यह और बात है कि केजरीवाल पर थप्पड़ लगने के बाद आप समर्थकों ने प्रतिक्रिया में उस ऑटोवाले की
पिटाई कर दी थी।


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