Friday, 9 January 2015

नाना जी आप याद आते हैं।

आम और लीची में
आते हैं जब मंजर
नानाजी आप बहुत याद आते हैं।
डब्बे वाले घी में नहीं रहती वो मिठास
आप बहुत याद आते हैं।
नानी के झुर्रिदार चेहरे को देखकर
आप बहुत याद आते हैं।
जब लिखने पर मिलती है शाबाशी
आप बहुत याद आते हैं।
जब जाता हूं स्कूलों में
बच्चों को सुनाता हूं कहानी
आप बहुत याद आते हैं।
जब होता हूं कमजोर
आप बहुत याद आते हैं।
जब मां बाबूजी की करनी होती है शिकायत
आप बहुत याद आते हैं।
जब विदा होने की तैयारी कर रहे थे आप
सुना रहा था मैं अखबार
खबर सुनाते हुए बहुत याद आते हैं आप
आप सपनों में आते हैं,
जैसे किसी के बिमार पड़ जाने पर
आप संभाल लेते थे मोर्चा
आप रहेंगे हमारे साथ
जोड़ में, घटाव में
मेरे लिखे शब्दों में
आप हर साल आयेंगे
आम के मंजर में

लीची की खुशबु में।

मैं एक गांधी फैलो हूं।

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी फैलोशिप ज्वाइंन करने का निर्णय यू-टर्न था। लेकिन मैं इस निर्णय से संतुष्ठ था। मैनें फैलोशिप को अपने अधूरे कामों को पूरा करने के मौके की तरह देखा। हलांकि मैं पत्रकार बनकर हशिये पर पड़े लोगों की आवाज बनना चाहता था। फैलोशिप ज्वाइंन करने के निर्णय से मेरे परिजन हैरान थे। मैं भी थोड़ा कन्यफ्युज्ड था। मेरे गुरू प्रोफेसर आनंद प्रधान ने कहा था, पत्रकारिता शुरू करने की कोई उम्र नहीं होती, फैलोशिप दोबारा नहीं मिलेगी।कालेज में दाखिला लेने के बाद से ही मैं छात्र राजनीति में सक्रिय हो गया था। फैलोशिप ज्वाइंन करने के बाद जगह और काम के तरीके बदल गये। लेकिन मैनें अपने अधूरे कामों को पूरा करना शुरु कर दिया है।
मेरे अनुभव
लेकिन फैलोशिप मेरे अधूरे पड़े कामों को पूरे करने का अवसर ही नहीं दिया। यहां मुझे स्कूलों में काम करने का मौका मिला। इसने मेरे बचपन को फिर एक बार लौटा दिया है। अब कालेज छूट गये हैं, हालांकि यहां अपने हमउम्र साथियों के साथ काम करते इसकी कमी नहीं खलती। यहां सहकर्मी और दोस्त का फर्क मिट गया है। कई दोस्त मिले हैं, जिनसे हर रोज कुछ न कुछ सीखता हूं। यहां जहूर नफीस उर्दू लहजे में कश्मीर के बारे में बताता है। राम के साथ स्कूटी पर स्कूल जाते हूए रोज बेधरक अंग्रेजी बोलता हूं, जिसे कभी अपने टीचर के सामने नहीं बोल पाया। हवा हमारे बातों को सुनती है। अंग्रेजी नॉवेल के हिन्दी अनुवाद को पढ़कर जो अंग्रेजी नहीं सीखी। राम के साथ रहकर लगता है अंग्रेजी सीख लूंगा। हर किसी के बारे में लिखने का मन हो रहा है... शब्द सीमा का ध्यान भी रखना है।

गुजरात के विकास के बारे में बहुत सुना था। सूरत में काम करते हुए उसे देख रहा हूं। स्कूलों में उसे हर रोज महसूस करता हूं। यह शहर कई संस्कृतियों का शहर है। इसे जीना पूरे भारत को जीने जैसा लगता है। अमितजी कुछ दिन गुजरात में बिताने के लिए टीवी पर बुलाते रहते हैं। सो उनका बात भी पूरा हो गया। एक महीने के कम्युनिटी इमरजन में कई स्लम को देखने का मौका मिला। विकसित गुजरात में स्लम! खैर छोड़िये...यह जगह यह सब लिखने कहने का नहीं है।
आप भी जुड़िये
विकास पत्रकारिता के किताबी ज्ञान को यहां प्रैक्टिकली आजमाने का मौका मिल रहा है। अखबार में काम करते हुए शायद ही यह मौका मिल पाता। सबसे बड़ी बात यहां मुझे सुना जाता है। उससे भी बड़ी बात उस पर अमल किया जाता है। फैलोशिप ज्वाइंन करने से पहले मैं कन्फुजन में था। यहां आने के बाद मैनें अपनी रुची, क्षमता और पेशे को जोड़ कर सपने देखने शुरू कर दिया हूं। यहां बहुत कुछ है। फैलोशिप से जुड़िये, आपको जिसकी तलाश है, वह आप ढूंढ ही लेंगे।


Thursday, 8 January 2015

प्राचार्य के साथ एक नई शुरूआत

विभिन्न स्कूलों से आये आचार्य महोदय और हमारे साथियों ।।।
आप सबका हार्दिक अभिनंदन करता हूं। 
आपके आने से कैवल्या एजु. फाउंडेशन के गौरवशाली इतिहास में आज एक और पन्ना जुड़ गया है।
यह दूसरा मौका है, जब हम इस तरह इकट्ठे मिल रहे हैं। पांच महीने से काम करते हुए आप हमारे बारे में बहुत कुछ जान चुके हैं। आज हमारी जानपहचान पुरानी पड़ गयी है, लेकिन कई सवाल नये हैं। आज उन्ही सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करेंगे।

गांधी फैलोशिप की 2008 में राजस्थान के झुंझनु से छोटी-सी शुरूआत हुई थी। आज यह गुजरात सहित महाराष्ट्र और राजस्थान के 1235 से अधिक सरकारी स्कूलों में काम कर रही है। गुजरात देश के सबसे विकसित राज्यों में एक है। लेकिन बिडंबना यह है कि सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक स्तर बेहतर नहीं है। हालिया मानव संसाधन विकास रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा में गुजरात की स्थिति 16वीं है;  यह चिंताजनक है। हम NPSS से MOU के तहत सूरत में 47 गांधी फैलो लीडरशिप के विकास के द्वारा 218 सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक सुधार का काम कर रहे हैं।

देश के सबसे गरीब आबादी का 80 फीसदी बच्चों के भविष्य का निर्माण इन्हीं सरकारी स्कूलों में होता है। अब भी 13 करोड़ बच्चे स्कूल जाने से महरूम हैं। इनके लिए भी यही सरकारी स्कूल विकल्प बन सकते हैं। सरकारी स्कूलों में कई चुनौतियां हैं। कहीं शिक्षक नहीं है, कहीं कमरों का आभाव है, कहीं लाइब्रेरी में किताबें नहीं हैं, किताबें हैं तो रखने की जगह नहीं है। कहीं कम्प्युटर है तो इंटरनेट नहीं है, कहीं इंटरनेट है तो शिक्षक की ट्रेनिंग नहीं हो पाई है।
हरी अनंत हरी कथा अनंता।

हर स्कूल की अपनी समस्या है। हर आचार्य अलग चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चुनौतियां हैं, लेकिन हमें उन चुनौतियां को पार पाना है। बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए, उन्नत जीवन स्तर के लिए, एक बेहतर शिक्षा ही उन्हे एक बेहतर जीवन स्तर दे सकता है। स्कूल चलाना एक बिजनेस चलाना जैसा है। स्कूल में बेहतर माहौल बनाने के लिए कई मोर्चों पर मैनेजमेंट की जरूरत होती है। और अच्छे मैनेजमेंट के लिए लीडरशिप की जरूरत होती है। इसलिए कैवल्या एजुकेशन फाउंडेशन स्कूलो में लीडरशिप प्रोग्राम चलाती है। शिक्षकों के साथ मैनेजमेंट, एसएमसी के साथ मैनेजमेंट, टीचर के साथ मैनेजमेंट, कम्युनिटी और पैरेन्टस के साथ मैनेजमेंट। हर जगह आचार्य को अपने नेतृत्व कौशल को दिखाना होता है।

इस भारत भूमि ने कई नेता दिये हैं, जिन्होंने देश को बदला है, जिन्होंने लोगों को दिशा दी है। जिन्होंने विश्व में भारत की साख ऊंची की है। इन महापुरूषों ने चुनौतियों का सामना किया। आज हर जगह चुनौतियां है। हर जगह एक लीडर की जरूरत है। आज स्कूलों में भी एक लीडर की जरूरत है। और स्कूल के लीडर आप हैं। आप ही स्कूल को बदल सकते हैं। आप सैकड़ों बच्चों के भविष्य को दिशा दे सकते हैं। आप स्कूल की साख ऊंची कर सकते हैं। आप देश के लाखों एचएम के रोल मॉडल हो सकते हैं, जो आपकी तरह ही समस्या को सुलझाने में लगे हैं।
हम काम करते हुए आपकी समस्या समझने लगे हैं। हम उन चुनौतियों को सुलझाने में साझीदार बनना चाहते हैं। हम  इसी उदेश्य से आपके स्कूल आते हैं। हम समस्या को समझने की कोशिश करते हैं। अपने स्तर पर उन्हे सुलझाने की कोशिश करते हैं। फैलोशिप विभिन्न प्रोफेशनल वाले युवा उद्यमियों का समूह है। जो समस्या का समाधान मिलकर ढूंढती है। इसे पूरी करने के लिए कैवल्या की पूरी टीम विभिन्न स्तरों पर लगातार काम में लगी रहती है। हम उन बिन्दुओं पर भी ध्यान केन्द्रित करते हैं जो स्कूल से बाहर बच्चों के सीखने की क्षमता को प्रभावित करती है। हमने बच्चों की समस्या को समझने के लिए उनके मोहल्ले में रहते हैं और उनकी समस्या को दूर करने की कोशिश करते हैं।

वर्षों स्कूलों में काम करते हुए अनुभव के आधार पर हमने कुछ कॉमन समस्या के परखे उपाय को विकसित किया है। ये वो उपाय हैं जिनसे बच्चों के सीखने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

हाल के प्रयोग से साबित हो गया है कि बच्चे भयमुक्त वातावरण में जल्दी सीखते हैं। इस माहौल में बच्चे खुद को बेहतर तरीके से संप्रेषित कर सकते हैं। बालगीत इस प्रक्रिया को आसान बनाते हैं।

लेकिन बालगीत का उदेश्य सिर्फ इतना ही भर ही नहीं है। बालगीत के माध्यम से बच्चे मजे-मजे में सीखते हैं। गणित और भाषा सीखाने में बालगीत आसान होते हैं। जरूरत है उनको पाठ्यक्रम से जोड़ कर एक पैकेज के रूप में बताना।

बच्चों को खेल प्रिय होता है। खेल को ज्ञान से जोड़ कर सीखाना। हम लगातार प्रयास करते हैं कि ऐसे खेल विकसित करें जिससे बच्चों के ज्ञान में वृध्दि हो सके।

आज टीवी के जमाने में बच्चे भले ही कहानियों से दूर हो रहे हैं। लेकिन कहानी की मिठास अब भी बाकी है। हम लाइब्रेरी तक बच्चों की पहुंच बढ़ाने की कोशिश करते हैं। ताकि उनके पढ़ने की क्षमता का विकास हो सके।

हमारी कोशिश होती है कि बच्चे जितनी देर रहें, उनके सीखने की प्रक्रिया जारी रहे। जैसे कि एसेम्बली। यहां से स्कूल की गतिविधी शुरू होती है, लेकिन यहां वर्षों से एक ही पैटर्न को फॉलो किया जाता रहा है। हम कोशिश करते हैं कि एसेम्बली रोचक हो और बच्चे इस दौरान भी सीखें।

हमारी पूरी टीम नए तरीकों की खोज करने में लगी रहती है। लेकिन इसमें हमारे साथ एक बड़ा उत्साही समूह भी हमारी मदद करती है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले विभिन्न स्वंयसेवी संगठन हमारी मदद करते हैं।

कैवल्य के साथ काम करते हुए कई आचार्यों ने स्कूल की तस्वीर बदल रख दी है। आचार्यों ने अपने दूर दृष्टी और नये तरीकों से नजीर पेश की है।
आपके पास वर्षों का अनुभव है, आपके पास ज्ञान है, हमारे पास जोश है। आइये अब वक्त आ गया है। एक सशक्त देश के निर्माण में अपने लीडरशीप के जरीये स्कूलों की नई तकदीर लिखें।

आचार्य के साथ हमारी फिनिक्स टीम
एक सवाल के साथ मैं अपनी बात खत्म करना चाहता हूं। क्या आप भगत सिंह, गांधी, सुभाष और नेहरू की कड़ी बनना चाहेंगे? अब, परिचय सत्र की शरूआत करते हैं। आप सभी के भीतर एक लीडर है। आप जिन लीडर से प्रभावित हैं उनके नाम के साथ अपना परिचय दें। 

Saturday, 18 October 2014

धर्म की दीवार लांघती एक लड़की

जब बडोदरा में दंगे का माहौल था। सूरत में एक लड़की दोबारा अपने पुराने घर में लौटने की तैयारी कर रही थी। मुंबई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से ग्रेजुएट उस हिन्दू लड़की को एक मुस्लिम परिवार में दोबारा लौटना था।
सूरत का नानपुरा मार्केट; जहां ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। जिनके पास घर के नाम पर एक तंग कमरा है। दिहाड़ी की नौकरी है। बदहाल जिंदगी और बेबसी भरे दिन हैं। वह उनके बदहाली को दूर करना चाहती थी। बेखबर कि बडोदरा में दंगे का माहौल बना हुआ है।

वह डेढ़ साल तक एक मल्टीनेशनल एडवरटाईजिंग कंपनी में काम कर चुकी थी। डोमिनोज का पिज्जा और बिसलरी का बोतलबंद पानी पीनेवाली लड़की दस बाई दस के छोटे से कमरे में दोबारा लौट रही थी।

यह सिर्फ हिम्मत ही नहीं था; उससे बढ़कर था। हिम्मत तो उसने तब भी दिखायी थी; जब उसने अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गांधी फैलो को ज्वाइंन किया था। जहां पहले ही बता दिया गया था, स्लम में रहकर काम करना होगा।

मैंनें रुची को पहली बार ऑटो में देखा था। हड़बड़ी में, लेकिन उसने अपना व्हाट्सअप नंबर देना नहीं भूली। शायद यह पब्लिक रिलेशन में पढ़ाई करने का असर था।

महीनों तक बातें नहीं हुई।  पता चला रुची बीमार है। डॉक्टर ने साफ जगह पर रहने की सलाह दी है। उसी रात व्हाटस अप पर मैसेज मिला। कल 11 बजे हेल्थ चेकअप कैंप है। स्कूल नं. 141, नानपुरा आ जाना
 जिसे खुद इलाज की जरूरत है; वह दूसरों का इलाज करवा रही है। 11 बजे मैं स्कूल नंबर 141 में था।

हेल्थ चेकअप कैंप में बच्चों और उनके पैरेंट्स को मनोवैज्ञानिक सलाह देते डॉ. मुर्तुजा
वह कमजोर दिमाग वाले बच्चों की पहचान डॉक्टर से करवा रही है। वह डॉक्टर के पास जमें भीड़ को व्यवस्थित कर रही है। वह एचएम से बात कर रही है। एचएम खुश हैं। उनके स्कूल में कुछ नया हो रहा है। मोहल्लेवालों को पहली बार डॉक्टर साहब से बिना मशक्कत सलाह मिल रही है, वह भी मुफ्त में।

रुची के चेहरे पर संतुष्टी के भाव थे। कैमरे की फ्लैश के बीच जरूर मैनें कई हेल्थ चेकअप कैंप देखे थे। लेकिन ऐसा पहली बार था जब बिना शोरशराबे के डॉक्टर बच्चों के स्वास्थ जांचने में व्यस्त थे।  लेकिन उस बदरंग मोहल्ले में डॉक्टरों को मुफ्त सलाह देने के लिए लाना आसान भी नहीं था।  बेशक डॉक्टरों की टीम को धन्यवाद देना चाहिए। लेकिन जो दिख रहा था वह रुची के प्रयासों का ही नतीजा था।



वह लोगों के बदहाली को दूर करना चाहती थी। उसने लगातार काम किया। उसने अपने काम से घर में ही नहीं, दिलों में भी जगह बनायी। बेखबर कि बडोदरा में दंगे का माहौल है। 
चेकअप कैंप में दांतों की जांच भी हुई। 
रुची के साथ सेल्फी।
हमदोनों  गांधी फैलोशिप से जुड़े हैं।
सूरत में 47 फैलो स्कूली शिक्षा के हालात
बेहतर बनाने में लगे हैं। 

Wednesday, 15 October 2014

यहां सिर्फ किताबों से बात होती है।

शाला नंबर 203
 यहां मेरा पहला विजिट था। हेडमास्टर से बातचीत की शुरूआत स्कूल की समस्या से शुरू हुई। यहां टीचर की कमी थी। जो हर गैर गुजराती स्कूलों की कॉमन समस्या है। हर क्लास में सौ से उपर बच्चे थे। समाधान की हर बात टीचर की कमी पर अटक जाती थी। शिक्षकों की कमी से कोई न कोई क्लास खाली पड़ा रहता। इसके लिए हमने एचएम को लाइब्रेरी सेशन रखने का सुझाव दिया। हेडमास्टर साहब को यह बात अटपटी लगी। बच्चे शांत होकर कैसे पढ़ सकते हैं?  मैनें उस दिन दो घंटे की कक्षा ली। यह हिन्दी स्कूल था। हमने पांचवी के बच्चों को बालगीत करवाये, गणित का एसेसमेंट लिया, समाज विज्ञान पढ़ाया।
पुस्तकें सबसे अच्छी दोस्त होतीं है, और पुस्तकालय में हम सबसे अच्छे दोस्त से मिलने जाते हैं। चलो इस कक्षा को घंटेभर के लिए इसे पुस्तकालय बना देते हैं। यहां सिर्फ किताबों से बात होती है।

मुझे उन्हे बिना बात किये कक्षा में पढ़ना सीखाना था। मैंने उन्हे लाइब्रेरी में पढ़ने की ट्रेनिंग देने की कोशिश करने लगा। पाठ को जल्द से जल्द खत्म करना। कुछ आसान सवाल पूछना। फिर अगले चैप्टर की ओर बढ़ जाना। बच्चे बात करने लगते। मैं उन्हे याद दिलाता कि यहां बोला नहीं जाता। थोड़ी देर के लिए क्लास शांत रहा। मैं वहां से बाहर निकल गया। शोरगुल फिर शुरु। मैंने दोबारा समझाया। अगली बार बाहर निकलने पर सच में शोर नहीं था। बच्चे पढ़ रहे थे और होड़ में थे कि कौन सबसे पहले चैप्टर पूरी करता है। क्लास खत्म होने पर वे पूछ रहे थे। आप सब दिन आओगे. कल भी आओगे। एक बच्चे ने कहा इतने स्नेह से कोई नहीं पढ़ाता आप रोज आना। मैं खुश था। इसे बचा के रखना था। यह स्लम इमरजन के पांचवा दिन की बात है।

Monday, 13 October 2014

स्लम के 28 दिन

चार सप्ताह के कम्युनिटी इमरजन के बाद 
फिनिक्स लौट आया है।
जब सात युवा मिलते हैं तब फिनिक्स अपने अस्तित्व में आता है। इन्द्रधनुष के सात 
रंगों की तरह सबके अलग रंग हैं, लेकिन उदेश्य एक है
सीखना है, बदलना है

सितम्बर की नौ तारीख का दिन जब फिनिक्स के सात रंग बिखर गये। फिनिक्स एक बा फिर गायब हो गया। अब सातों के अपने रंग में थे। एक अमित था, एक मधुरा थी, एक बना खालिद, एक गौरव बना, शीतल अपने रंग में थी, राम को अपना रंग मिला, चेतना ने भी अलग होकर अपना रंग पाया। यही वह वक्त था जब हमें खुद को साबित करना था। 
हमें खुद को परखना था। खुद को बदलना था। 
सीखना था और बदलना था। 

लेकिन यह आसान नहीं था। परदेशी बाबू का गांव आना और उनके स्वागत में बच्चे-बड़ों का उमड़ जाना यह फिल्मों में होता है। यहां हमारे हालात बिल्कुल अलग थे। हम घर ढूंढ रहे थे। वहां; जहां एक कमरे में पूरा परिवार रात को सिमट जाता है। हमें वहां अपनी जगह बनानी थी। हमें घर ही नहीं चाहिए था, हमें उनके दिलों में भी जगह चाहिए थी। हमारे कुछ साथियों को एक नया परिवार मिल गया था। कुछ अब भी घर ढुंढनें में लगे थे। जाति की जकड़न, धर्म की दीवार, भाषा की बंदिश, प्रदेश की दूरी इन सबसे हमें पार पाना था। हम कोशिश कर रहे थे।
हम गलतियों से सीख रहे थे, हमें बदलना था।
15 सितम्बर, अमानुष का बर्थ डे। एक्सपेरियंस शेयर के दरम्यान मेरे दोस्तों ने
मेरे जन्मदिन को यादगार बनाया। रिकिता को अलग से थैंक्स।

सप्ताह के तीन दिन मंगल, गुरू और शनि वह दिन होता, जब थोड़ी देर के लिए फिनिक्स का उदय होता। सात फैलो के सात अनुभव जो हमें फिर से उठ कर खड़े होने की प्रेरणा देते। सातों के पास कहने को कुछ न कुछ होता जो हमें सपोर्ट करता। किसी के पास अपने नये परिवार का प्यार होता था, तो किसी के पास कम्युनिटी का सपोर्ट, कोई अपने सहयोगी हेडमास्टर की मदद को साझा करता, किसी के पास नये इनोवेटिव आइडिया। हम मिलते और रिचार्ज होकर वापस अपने कम्युनिटी में लौट जाते।
हम लौट जाते सोचते हुए कि कुछ तो बदलेगा।
अमित और उसका परिवार। सूरत का एक परिवार जिसने साबित किया
जगह घर में नहीं दिलों में होनी चाहिए।
मुकेश अंकल जिनका घर सबके लिए खुला था।

जब फिनिक्स के सात रंग अलग हुए तो कुछ तो आश्वस्त थे लेकिन बाकियों ने अनिश्चितता के साथ घर छोड़ा था। अमित अम्बातलाबारी के आंगनबाड़ी केन्द्र में ठहरा। यहां के लोगों से जो प्यार मिला वह कम्युनिटी इमरजन के सभी निगेटीविटी पर भारी पड़ता है। अम्बातलाबाड़ी के लोगों का प्यार सिर्फ अमित को ही नहीं मिला यह सबको मिला जिसने उधर रुख किया। अमित पहले दिन से ही काम शुरू कर चुका था। सबसे पहले उसने डेंगु-मलेरिया सर्वे करवाया और बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना शुरु किया। हेल्थ अवेरनेस, शिक्षा के महत्व जैसे कई इवेंट उसने करवाये।
चेतना। कल्चरल शॉक्स चेेंज इनटू कल्चरल रेसपेक्ट


चेतना एक मध्यवर्गीय काठियावाड़ी परिवार की सदस्य पहले दिन से ही बन चुकी थी। लेकिन यहां कुछ अलग मामला था। शुरू में कुछ दिन तक यह फैमली इमरजन ही बना रहा, लेकिन समय बितने के साथ फैमली ने समझा, फिर कम्युनिटी ने भी। गरबा के धूम के बीच चेतना लड़कियों की शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण संदेश देने में कामयाब रही।

मधुरा। फैमली मिली कम्युनिटी की तलाश जारी रही।
मधुरा को भी 22 लोगों का एक बड़ा सा परिवार मिल गया था। उस बड़े से परिवार के सदस्यों के बीच मधुरा ने खाना बनाने से लेकर घर के कामों को सीख लिया है। 19 अक्टुबर से सभी छुट्टियों में घर जा रहे हैं। मधुरा की मां जरूर खुश होंगी। उनकी बेटी अब भोर होने से पहले उठने लगी है। आखिरी दिनों में मधुरा इवेंट के लिए चेतना के साथ रही। 

खालिद। बैकग्राउंड में मुकेश, समीर, विलाश। सामंजस्य का नमूना।
खालिद का सफर आसान नहीं रहा। वह स्कूल में रुका। बाद में चार फेलो के साथ एक मुस्लिम कम्युनिटी में। बीमार भी हुआ। कम्युनिटी से अस्पताल फिर ऑफिस में तीन दिन का ठहराव। जज्बे में कमीं नहीं आने दिया। फिर से निकल पड़ा। बच्चों को पढ़ाते हुए, यूथ को समझाते हुए, उन्हें तकनीक और तरकीब बताते हुए। खालीद ने अच्छा तालमेल बिठाया।
शीतल। रंग और कूची से बनायी जगह। 

शीतल स्कूल के चपरासी के घर रही। घर संभाला, झाडु लगाया, खाना भी पकाया और कम्युनिटी के बीच टीचर दीदी भी बन गयी। एक ऐसी लड़की जो टीचर भी थी और दीदी भी। उसने दोनों जिम्मेवारी को बखूबी निभाया। महिलाओं के लिए वह दीदी थी। बच्चों के लिए टीचर। उसने बच्चों के साथ बड़ों को भी रंग और कूची हाथों में पकड़वा दिया और सरलता के साथ 
पढ़ाई के महत्व के संदेश देने में कामयाब रही।

आखिर में फिनिक्स के दो रंग और थे। जो साथ रहे। मैं और मेरे कठिन दिनों का साथी राम। मैंने फैलोशिप देर से ज्वाइंन किया था, इमरजन से ठीक पहले। राम तमिलनाडु से है। उसके लिए भाषा की समस्या थी। शायद हमदोनों को इसी कमजोरी की वजह से साथ रखा गया। हम हप्ते भर तक भटकते रहे। फेसबुक पर उस समय राम ने जो फेसबुक स्टेट्स लिखा था उससे हमारे हालात बखूबी बयान होते हैं।

Community immersion

Thursday stayed at Hindu temple …
Friday stayed at Christian Church …
Saturday stayed at muslim Home…
Today don’t know the place…
Still searching for home to stay…
Living like nomadic
Nice experience
यह सच में नाइस अनुभव था। हम दोनों बीमार भी हुए। अम्बातलाबाड़ी की मौसी ने हमें ठहरने को कहा। राम वहीं रुक गया। मैंने तलाश जारी रखने का फैसला किया। 
राम ने अमित के साथ मिलकर कम्युनिटी का दिल जीत लिया।

मैं दस दिनों तक भागता रहा। मैंने अनुभव किया कि भागने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। अब मैंने ठहर कर जूझने का फैसला किया। मैं बीमार था। मेरे रहने का ठिकाना नहीं था। मैं रोज स्कूल जाता रह़ा। स्कूल नंबर 171। बच्चों को पढ़ाने के साथ योगा, पी.टी, गेम्स, कहानी और बालगीत। हमारे स्कूल के 34 बच्चे अनाथ आश्रम से आते थे। मैं यहां रहकर काम करने का फैसला किया। काफी भागदौड़ के बाद मुझे यहां रहने की जगह मिल गई। मुझे 94 बच्चों की कम्युनिटी मिल गयी थी। मैंने बच्चों के साथ कविता रची, कहानी लिखा, क्रिकेट और कैरम खेला, चित्र बनाये। भगत सिंह और गांधी के जन्मदिन पर नैतिक शिक्षा और देशभक्ति की सीख देने की कोशिश की। कैंपस की सफाई की। ये बेहतरीन दिन थे।
गौरव। कई काम अधूरे छो़ड़ कर लौटना पड़ा।
मुझे कोई अफसोस नहीं था कि मुझे कोई कम्युनिटी नहीं मिली। मुझे इवेंट भी करना था। मैंने इसके लिए जे.के.पी नगर को चुना, क्योंकि यहीं से सबसे ज्यादा बच्चे आते थे। यहां सबसे जरुरी था शिक्षा को लेकर कोई इवेंट कराना।  लेकिन यह  सबसे मुश्किल भी था। मैं रोज कम्युनिटी जाता रहा। बिना परवाह किये कि लोग मेरे बुलाने पर आते हैं कि नहीं। आखिर मैंने इमरजन के आखिरी दिनों में शिक्षा के सोपान: समस्या और समाधान विषय पर परिचर्चा करा पाने में सफल रहा। बच्चे-बड़े सभी मुहल्ले में शैक्षणिक माहौल बनाने के लिए जुटे और तय समय से दुगुने तक सुनते 
रहे।
परिचर्चा में रिकिता, गांधी फेलो रुची, डा. मुर्तुजा, समीर व श्याम भाई ने कम्युनिटी का मार्गदर्शन किया।
अाश्रम के बच्चों ने पैनल को अपने पेंटिग भेजकर अामंत्रित किया।
यह मेरे लिए इनोवेटिव था।
यह मुझे दोबारा सीआई के लिए प्रेरित करेगा।
एक समय ऐसा भी आया जब हमारे स्लम इमरजन के 28 दिन पूरे हो चुके थे। हम लौटने वाले थे। हर कोई कहीं न कहीं से जुड़ चुका था। जड़ें मिट्टी तलाश ही लेती हैं।  अम्बातलाबरी में सभी मायूस थे। अनाथालय के बच्चों के हाथ विदा नहीं कर रहे थे, वापस बुला रहे थे। सात रंगों के जुड़ने का वक्त आ गया था।
 फिनिक्स फिर से लौट आया है।

बहुत कुछ सीखकर; थोड़ा बहुत बदलकर

Saturday, 17 May 2014

Report on Bihar loksabha poll result


मोदी  लहर  में कइयों  की नैया पार लग गयी  जिनमें
 भाजपा के अलोकप्रिय  नेता से लेकर  सहयोगी दल भी थे 

  16 वीं लोकसभा  चुनाव में मोदी लहर से बिहार भी  अछूता नहीं रहा।  बिहार की कुल 40 लोकसभा  सीटों में एनडीए ने  31 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही। जिनमें अकेले  भाजपा ने  22 सीटों पर परचम लहराया। वहीं  मोदी लहर पर सवार होकर एनडीए के दो सहयोगी; लोक जनशक्ति पार्टी  और नवनिर्मित राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी ने अच्छा  प्रदर्शन किया है। चुनाव परिणाम के बाद बिहार की सत्तारुढ  जनता  दल यूनाइटेड   को बड़ा झटका लगा है। हालांकि  लालू की राष्ट्रीय जनता दल  अपनी ठीक-ठाक वापसी की है। वहीं आप का प्रदर्शन बहुत खराब रहा और उसे कई लोकसभा  सीटों पर चौथे-पांचवे स्थान से संतोष करना पड़ा। यहाँ तक आआप, बसपा और वाम दल का प्रदेश में खाता भी  नहीं खुल पाया।


       
कभी भाजपा के साथ रहने वाले नितीश कुमार का नरेंद्र मोदी से
उनके हिन्दू राष्ट्रवादी चेहरे की वजह से अलग होना महंगा पड़ा 
                        पिछले साल सितंबर में भाजपा  के द्वारा अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के बाद एनडीए से अलग हुए जेडीयू को जबरदस्त धक्का लगा है। चुनाव परिणाम आने के बाद वह केवल दो सीटों पर सिमट कर रह गयी है। पिछले  लोकसभा  चुनाव में 20 सीटें लेकर  जेडीयू राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी ।

                     चुनाव पूर्व वामदलों के नेतृत्व में 11 दलों को मिलाकर बनाई गई 'तीसरा मोर्चा' फिर एक बार फ्लाप रही। जेडीयू और सीपीआई के बीच हुए गठबंधन में जदयू कुल 38 सीटों पर अपना उम्मीदवार ख़ड़े किये थे। वहीं सीपीआई को दो सीटे मिली थी। सीपीआई दोनो सीटों पर तीसरे जगह पर रही।

                        राज्य में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल  ; एनडीए से  संघर्ष करती नजर आई है। कांग्रेस के साझीदारी में लड़े गये चुनाव में  24 सीटों में चार पर जीत हासिल किया है। जबकि कांग्रेस ने साझीदारी  के तहत मिले  कुल सात सीटों में  दो सीट जीतने में कामयाब रही।  चुनावी समर में लालू की पत्नी और प्रदेश की पूर्व मुख्यमंघत्री राबड़ी देवी सारण की 'घरेलू सीट' पर हार गयीं। सारण सीट पर उन्हें भाजपा के राजीव प्रताप रुढ़ी ने शिकस्त  दी।  वहीं पाटलीपुत्र पर राजद के पूर्व नेता रामकृपाल की नाराजगी  भारी पड़ी । यहां से लालू की पुत्री मीसा भारती चुनाव लड़ रही थीं।
       
लालू   को  अपनी  खोई  जमींन  मिल सकती  है,
बिहार के पांच  विधानसभा  क्षेत्र में हुए  चुनाव में राजद ने तीन सीट  पर जीत दर्ज की है 
            वहीं पासवान की लोजपा ने  पिता-पुत्र-भाई के  तीनों  पारिवारिक सीट पर जीत हासिल की। हाजीपुर से रामविलास पासवान, जमूई से पुत्र चिराग और समस्तीपुर से पासवान के भाई रामचंद्र पासवान नें  जीत दर्ज कर ली है। पिछले  लोकसभा चुनाव में लोजपा का राज्य में सुपड़ा साफ हो गया था।  एनडीए के साथ समझौते के तहत लोजपा को छह सीट मिली थी। जिनमें  सभी   सीटों पर जीत हासिल कर लोजपा  ने  शानदार वापसी की है।
                 वहीं बिहार में तीन सीटों पर चुनाव  लड़ रही भाजपा की एक और सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के  संस्थापक उपेन्द्र कुशवाहा  अपनी कराकट  सहित  तीनों पर जीत हासिल की है। जदयू से अलग होकर पिछले साल तीन मार्च को कुशवाहा ने अपनी नई पार्टी बनाई थी।

           जदयू के कई बड़े नेताओं को इस चुनाव में  पराजय का मुंह   देखना पड़ा। कभी  एनडीए के संयोजक रह चुके जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तीसरे मोर्चे के प्रमुख रणनीतिकार शरद यादव खुद अपनी मधेपुरा  सीट बचा पाने में कामयाब नहीं रह सके ।  शरद यादव को राजद के राजेश रंजन उर्फ पप्पु यादव ने 56209  वोटों  से पराजित किया।  वहीं मशहूर फिल्म निर्माता प्रकाश झा को दूबारा हार का सामना करना पड़ा ।  इसबार जदयू की टिकट पर पश्चिम चंपारण से चुनाव लड़ रहे प्रकाश झा को भाजपा के संजय जयसवाल से पराजित हुए । वे इससे पहले लोजपा के टिकट पर इसी लोकसभा क्षेत्र से  चुनाव में हार  चुके हैं।

     
चुनाव परिणाम आने के बाद  नीतीश कुमार की मुश्किलें  बढ़ गयी है,
 वे इस्तीफा भी दे सकते हैं 
 जदयू का  मुस्लिम वोटरो को  लुभाने  के लिए भाजपा से अलग होने का दांव सही पड़ता नहीं दिखा। जदयू ने इस लोकसभा  चुनाव में तीन मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किये थे। जदयू  के टिकट पर  शिवहर से शाबिर अली, सारण के शलील परवेज और मधुबनी से चुनाव लड़ रहे गुलाम गौस  में किसी को भी  जीत नहीं मिल पाई। वहीं भागलपुर से चुनाव लड़ रहे भाजपा के एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन  राजद के शैलेश कुमार मंडल से मात्र 9485 वोटों से  पराजित हो गये हैं। हुसैन, वाजपेयी के शासनकाल में केन्द्रीय मंत्री भी  रह चुके हैं। उन्होने पिछली बार इसी सीट से जीत हासिल की थी।
     विवादित बयान देकर फंसे भाजपा के  गिरिराज सिंह नवादा से चुनाव जीत चुके हैं। साथ हीं   सीवान के निर्दलिय वर्तमान सांसद ओमप्रकाश यादव ने भाजपा की टिकट पर दुबारा जीत पाने में सफल रहे।
            वहीं राज्य में मिले वोट फीसदी की बात करें तो यहां भी  भाजपा सर्वाधिक 29 वोट फीसदी वोट हासिल किया।  वहीं राजद ने 20.1 फीसदी वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रही  । जदयू ने 15.8 फीसदी वोट के साथ तीसरी स्थान बना पाने में कामयाब रही।  वहीं नोटा पर 581011 वोटरों ने बटन दबा कर अपना विरोध दर्ज किया।

         
रामविलास पासवान को पाला बदलने से फायदा मिला ,
बिहार की राजनीति  में हासिये  पर जाने क बाद एक बार फिर रामविलास की  उम्मीद जगी है 
आनेवाले दिनों में जदयू की परेशानियां बढ़ सकती है। जीत से उत्साहित रामविलास पासवान ने जदयू के भविष्य पर टिप्पणी करते हुए कहते हैें जल्द ही नीतीश की सरकार गिरने वाली है क्योंकि हार को देखकर दर्जनों  विधायक पार्टी छोड़कर जानेवाले हैं।
           यूपीए की केंद्र  सरकार पर एनडीए  नीत  राज्य सरकार  बिहार के प्रति  लगातार  भेदभाव  का आरोप लगाती रही है।  यह अब भी  जारी रहेगी जब भाजपा केन्द्र  में होगी । देखना यह होगा कि विशेष राज्य का दर्जा मांगने में जदयू का सुर मिलाने वाली भाजपा राज्य को यह दर्जा देती है या उठापटक और आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी रहने वाला है।

हरिभूमि में प्रकाशित

Friday, 11 April 2014

बिना गाजे बाजे की फिल्म है ' देख तमाशा देख'


अंत भला तो सब भला। हलांकि यह जुमला तब कहा जाता है जब काम की खराब शुरूआत के बावजूद अंत सुखद हो। लेकिन आईआईएमसी के वर्तमान सत्र  की शुरूआत भी सुखद थी और अंत भी यादगार। इस पड़ाव को यादगार बनाया सिनेमंच की सत्र की आखिरी पेशकश फिरोज अब्बास खान निर्देशित फिल्म देख तमाशा देखने।

ये वही फिरोज अब्बास खान हैं जिनकी साल 2007 में आई विवादास्पद फिल्म 'गांधी माई फादर' ने खूब प्रशंसा बटोरी थी। इससे पहले भी इन्होने थियेटर में खूब नाम कमाया है। 'गांधी माई फादर' के लिए इन्हे बेस्ट स्क्रिन प्ले के लिए 2008 में नेशनल आवार्ड मिल चुका है। इसी कैटगरी में 2007 का एशिया पैसिफिक स्क्रिन अवार्ड इनके नाम रहा।

                   नौ सालों के बाद फिरोज फिर एक बार सच्ची घटनाओं पर आधारित वैचारिक और व्यंग्यात्मक फिल्म देख तमाशा देखके साथ आये हैं। फिल्म महाराष्ट्र के एक गांव की पृष्टभूमि पर बनी है। यह समसामयिक राजनैतिक-सामाजिक विसंगतियो पर बनी फिल्म है। फिल्म में कई गंभीर विषयों को व्यंग्य के माध्यम से निर्देशक ने उठाया है। फिल्म ने साबित किया है कि हास्य फिल्में बिना फुहड़पन के भी बनाई जा सकती है।

                          इस फिल्म में कई कहानियां समानांतर रूप से चलती है। फिल्म की कहानी एक टांगेवाले का एक राजनेता के पोस्टर तले दब कर मरने से शुरु होती है। टांगेवाले के मरने के बाद हिन्दू और मुसलमान उसके शव पर अधिकार के लिए झगड़ने लगते हैं। यह झगड़ा दंगा का रूप ले लेता है। पूरी कहानी इसी के आसपास घूमती है। हालांकि केन्द्रीय कहानी के साथ कई कहानियां साथ-साथ चलती हैं। जिनमे दंगो के बीच शब्बो और प्रशांत का निर्दोष प्यार और उसका दुखांत अंत भी है।

                           इस फिल्म में कई नए प्रयोग देखने को मिल जाएंगे। फिल्म कई टुकड़ो में है। हलांकि निर्देशक इसे मुख्य कहानी से जोड़ने में सफल रहे हैं। कई विसंगति को दो घंटे की फिल्म में दिखाने की कोशिश में कभी-कभी मुख्य कहानी पीछे छूटती लगती है। हलांकि दमदार और चुभते व्यंग्य दर्शक को बांधे रखने में सफल रहते हैं। फिल्म के सटीक संवाद और मजबूत कहानी की वजह से पूरी फिल्म में बैकग्राउंड संगीत का न होने का पता पूरी फिल्म में नहीं चलता है। निर्देशक फिरोज अब्बास खान अपने इन प्रयोगो के बारे में कहते हैं अगर मैं प्रयोग न करूँ तो कुछ नया नहीं कर पाउंगा, फिल्म की कहानी इतनी मजबूत है कि इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक की जरूरत ही नहीं है।
फिल्म को रियल बनाने में कलाकारों ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया है। ज्यादातर कलाकार मराठी रंगमंच से जुड़े रहे हैं। इन कलाकारों ने कहानी की मराठी पृष्टभूमि को जीवंत कर दिया है। फिल्म में एकमात्र सतीश कौशिक जाने-पहचाने चेहरे मिलते हैं। इन्होने फिल्म में मोटु सेठ के चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है। कहानी का प्रधान चरित्र टांगेवाला पूरी फिल्म में सिर्फ पोस्टर में ही दिखता है। फिल्म में कई चरित्र नायक जैसे लगते हैं।


फिल्म में प्रतीकों का प्रयोग किया गया है, जो गंभीर दर्शक की मांग करती है। आम बोल-चाल के शब्दो का प्रयोग और आम लोगो की कहानी की वजह से इसे छोटे शहरों में भी दर्शकोें के द्वारा पसंद की जाएगी; इसकी पूरी संभावना है। फिल्म जिस तरह मीडिया के बदलते स्वरूप, धार्मिक कट्टरता, गरीबी  जैसे सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे को उठाया है। इस काम के लिए फिरोज तारीफ के काबिल हैं।
         कहानी के अंत में पुलिस इंस्पेक्टर अपनी काबिलियत के बदौलत दंगो पर काबू पा लेता है और सबकुछ शांत हो जाता है। यहां फिल्म संदेश देती है कि प्रशासन की मुस्तैदी से हालात काबू किये जा सकते हैं।

                        फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान  निर्देशक फिरोज अब्बास खान, संस्थान के मीडिया गुरू आनंद प्रधान और कई फिल्म के जानकार मौजूद थे। फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के विभिन्न पक्षों पर चर्चा हूई। इस दौरान उन ज्वलंत सवालों पर भी बहस हुई जो फिल्म में उठाए गए थे; जैसा कि हर बार सिने मंच में होता है। देर शाम तक पूरा कुनबा जमा रहा। लेकिन आपको इस फिल्म को देखने के लिए अगले शुक्रवार तक का इंतजार करना पड़ेगा।

Thursday, 10 April 2014

नेताजी पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

अबतक नेताजी के नववर्ष, 26 जनवरी, वसंत पंचमी, गणतंत्र दिवस से लेकर होली के मुबारकबाद वाले पोस्टर सड़क के किनारे किसी खाली जगह पर टंगी मिलती थी। ढ़ेर सारे नाम और उनके फोटो वाले पोस्टर। यह कम-से-कम पैसे में अपना विज्ञापन  करने का राजनेताओं का पारंपरिक जुगाड़ तकनीक रहा है।
                       लेकिन राजनीतिक पार्टियों के ऐसे पोस्टर अब बहुत कम दिखते हैं। इनकी जगह प्रोफेशनल तरीके से बनाई गई बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर और अन्य साधनों ने ले लिया है। अब राजनेता अपना प्रचार किसी कॉरपोरेट के प्रोडक्ट की तरह करने लगे हैं। कार्टुनिस्ट गोपाल कहते हैं इन पोस्टरों में कांट्रास्ट है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
                                     अपने प्रचार-प्रसार में आधुनिक तकनीक और मौकों का फायदा उठाने में         सभी प्रमुख पार्टियां होड़ में लगी दिखती हैं। जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं उस समय उनके उपलब्धियों वाले पोस्टर हर बस-स्टाप पर दिख जाते थे। इन पोस्टरों पर प्रगति रिपोर्ट के साथ शीला दीक्षित के फोटो लगे रहते थे।
                         अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही शीला दीक्षित के फोटो वाले विज्ञापन की जगह अरविंद के अगर कोई घूस मांगता है तो उसे ना मत कहिये .... के दो लाइन के पोस्टरों ने ले ली। इनमें केजरीवाल के तस्वीर लगे थे।
                            लेकिन  प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने प्रचार के मामले में चुनाव के नजदीक आते-आते सबको पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन सड़क से लेकर घर तक पीछा नहीं छोड़ती। सड़क किनारे, बस-स्टाप, मेट्रो में हर जगह 'मोदी सरकार'  बनाने के अपील वाले विज्ञापन दिख जाते हैं। अखबार, इंटरनेट, रेडियो, टीवी के जरीये मोदी सरकार के विज्ञापन हमारे घरों में दाखिल हो रहे हैं। बचे जगह कांग्रेस के विज्ञापनों ने ले रखा है।
                         हालांकि सोशल मीडिया में आम आदमी पार्टी सक्रिय दिखती है। लेकिन यह सक्रियता प्रायोजित नहीं दिखती। लेकिन भाजपा ने सोशल मीडिया में अपनी पैठ  बेवसाइट को भारी रकम चुकाकर बनाई है। यू-ट्युब खोलते ही भाजपा या कांग्रेस के अनचाहे विज्ञापन दिख जाते हैं। इस सुविधा को पाने के लिए बेशक करोड़ो रूपय गूगल को इन दोनों प्रमुख पार्टी ने चुकाये होंगे।
पिछले कई दिनों से नरेन्द्र मोदी के फुल पेज वाले विज्ञापन सभी राष्ट्रीय अखबारों में आ रहे हैं। इसे देखते हूए  मोदी के विज्ञापन पर दस हजार करोड़ खर्च करने के कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा का आरोप निराधार नहीं लगता है। सवाल लाजिमी है कि विज्ञापन में किया जा रहा खर्च कितना सही है और खर्च का पैसा कहां से आ रहा है?
लेकिन इस हवा-हवाई प्रचार से नेता का अपनी जनता से दूरी और बढ़ गयी है। हलांकि कई पार्टियां अपना जनसंपर्क जनता से मिलकर कर रहीं हैं। उनकी समस्यओं को सुन रहीं हैं। एआइएसएफ के महासचिव विश्वजीत कहते हैं वामपंथी पार्टियां जनता से सीधे मिलकर अपने एजेंडा को बताती रही हैं। हम एक वोट एक नोट के नारे के साथ मिलते रहे हैं।
                                                       हालांकि राजनीतिज्ञों का कारपोरेट कल्चर सिर्फ दिल्ली जैसे बड़े महानगर में ही नही दिख रहा है। यह छोटे शहरों और गांवो में भी फैल रहा है। जनसंपर्क  की जगह हवा-हवाई प्रचार लेते जा रहे हैं। बिहार के दरभंगा जिले के सोनू इस बार दुखी हैं कि इस बार कोई बड़ा नेता अबतक उनके गांव नहीं आया। वे कहते हैं कि  नेताजी कम-से-कम पांच साल में एक बार वोट मांगने तो आ ही जाते थे। इस बार तो सब फोटो में ही दिखते रहे हैं। तो क्या जनसम्पर्क के बदलते ट्रेंड की वजह से नेताजी अब पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।