Friday, 9 January 2015

मैं एक गांधी फैलो हूं।

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी फैलोशिप ज्वाइंन करने का निर्णय यू-टर्न था। लेकिन मैं इस निर्णय से संतुष्ठ था। मैनें फैलोशिप को अपने अधूरे कामों को पूरा करने के मौके की तरह देखा। हलांकि मैं पत्रकार बनकर हशिये पर पड़े लोगों की आवाज बनना चाहता था। फैलोशिप ज्वाइंन करने के निर्णय से मेरे परिजन हैरान थे। मैं भी थोड़ा कन्यफ्युज्ड था। मेरे गुरू प्रोफेसर आनंद प्रधान ने कहा था, पत्रकारिता शुरू करने की कोई उम्र नहीं होती, फैलोशिप दोबारा नहीं मिलेगी।कालेज में दाखिला लेने के बाद से ही मैं छात्र राजनीति में सक्रिय हो गया था। फैलोशिप ज्वाइंन करने के बाद जगह और काम के तरीके बदल गये। लेकिन मैनें अपने अधूरे कामों को पूरा करना शुरु कर दिया है।
मेरे अनुभव
लेकिन फैलोशिप मेरे अधूरे पड़े कामों को पूरे करने का अवसर ही नहीं दिया। यहां मुझे स्कूलों में काम करने का मौका मिला। इसने मेरे बचपन को फिर एक बार लौटा दिया है। अब कालेज छूट गये हैं, हालांकि यहां अपने हमउम्र साथियों के साथ काम करते इसकी कमी नहीं खलती। यहां सहकर्मी और दोस्त का फर्क मिट गया है। कई दोस्त मिले हैं, जिनसे हर रोज कुछ न कुछ सीखता हूं। यहां जहूर नफीस उर्दू लहजे में कश्मीर के बारे में बताता है। राम के साथ स्कूटी पर स्कूल जाते हूए रोज बेधरक अंग्रेजी बोलता हूं, जिसे कभी अपने टीचर के सामने नहीं बोल पाया। हवा हमारे बातों को सुनती है। अंग्रेजी नॉवेल के हिन्दी अनुवाद को पढ़कर जो अंग्रेजी नहीं सीखी। राम के साथ रहकर लगता है अंग्रेजी सीख लूंगा। हर किसी के बारे में लिखने का मन हो रहा है... शब्द सीमा का ध्यान भी रखना है।

गुजरात के विकास के बारे में बहुत सुना था। सूरत में काम करते हुए उसे देख रहा हूं। स्कूलों में उसे हर रोज महसूस करता हूं। यह शहर कई संस्कृतियों का शहर है। इसे जीना पूरे भारत को जीने जैसा लगता है। अमितजी कुछ दिन गुजरात में बिताने के लिए टीवी पर बुलाते रहते हैं। सो उनका बात भी पूरा हो गया। एक महीने के कम्युनिटी इमरजन में कई स्लम को देखने का मौका मिला। विकसित गुजरात में स्लम! खैर छोड़िये...यह जगह यह सब लिखने कहने का नहीं है।
आप भी जुड़िये
विकास पत्रकारिता के किताबी ज्ञान को यहां प्रैक्टिकली आजमाने का मौका मिल रहा है। अखबार में काम करते हुए शायद ही यह मौका मिल पाता। सबसे बड़ी बात यहां मुझे सुना जाता है। उससे भी बड़ी बात उस पर अमल किया जाता है। फैलोशिप ज्वाइंन करने से पहले मैं कन्फुजन में था। यहां आने के बाद मैनें अपनी रुची, क्षमता और पेशे को जोड़ कर सपने देखने शुरू कर दिया हूं। यहां बहुत कुछ है। फैलोशिप से जुड़िये, आपको जिसकी तलाश है, वह आप ढूंढ ही लेंगे।


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