Saturday, 17 May 2014

Report on Bihar loksabha poll result


मोदी  लहर  में कइयों  की नैया पार लग गयी  जिनमें
 भाजपा के अलोकप्रिय  नेता से लेकर  सहयोगी दल भी थे 

  16 वीं लोकसभा  चुनाव में मोदी लहर से बिहार भी  अछूता नहीं रहा।  बिहार की कुल 40 लोकसभा  सीटों में एनडीए ने  31 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही। जिनमें अकेले  भाजपा ने  22 सीटों पर परचम लहराया। वहीं  मोदी लहर पर सवार होकर एनडीए के दो सहयोगी; लोक जनशक्ति पार्टी  और नवनिर्मित राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी ने अच्छा  प्रदर्शन किया है। चुनाव परिणाम के बाद बिहार की सत्तारुढ  जनता  दल यूनाइटेड   को बड़ा झटका लगा है। हालांकि  लालू की राष्ट्रीय जनता दल  अपनी ठीक-ठाक वापसी की है। वहीं आप का प्रदर्शन बहुत खराब रहा और उसे कई लोकसभा  सीटों पर चौथे-पांचवे स्थान से संतोष करना पड़ा। यहाँ तक आआप, बसपा और वाम दल का प्रदेश में खाता भी  नहीं खुल पाया।


       
कभी भाजपा के साथ रहने वाले नितीश कुमार का नरेंद्र मोदी से
उनके हिन्दू राष्ट्रवादी चेहरे की वजह से अलग होना महंगा पड़ा 
                        पिछले साल सितंबर में भाजपा  के द्वारा अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के बाद एनडीए से अलग हुए जेडीयू को जबरदस्त धक्का लगा है। चुनाव परिणाम आने के बाद वह केवल दो सीटों पर सिमट कर रह गयी है। पिछले  लोकसभा  चुनाव में 20 सीटें लेकर  जेडीयू राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी ।

                     चुनाव पूर्व वामदलों के नेतृत्व में 11 दलों को मिलाकर बनाई गई 'तीसरा मोर्चा' फिर एक बार फ्लाप रही। जेडीयू और सीपीआई के बीच हुए गठबंधन में जदयू कुल 38 सीटों पर अपना उम्मीदवार ख़ड़े किये थे। वहीं सीपीआई को दो सीटे मिली थी। सीपीआई दोनो सीटों पर तीसरे जगह पर रही।

                        राज्य में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल  ; एनडीए से  संघर्ष करती नजर आई है। कांग्रेस के साझीदारी में लड़े गये चुनाव में  24 सीटों में चार पर जीत हासिल किया है। जबकि कांग्रेस ने साझीदारी  के तहत मिले  कुल सात सीटों में  दो सीट जीतने में कामयाब रही।  चुनावी समर में लालू की पत्नी और प्रदेश की पूर्व मुख्यमंघत्री राबड़ी देवी सारण की 'घरेलू सीट' पर हार गयीं। सारण सीट पर उन्हें भाजपा के राजीव प्रताप रुढ़ी ने शिकस्त  दी।  वहीं पाटलीपुत्र पर राजद के पूर्व नेता रामकृपाल की नाराजगी  भारी पड़ी । यहां से लालू की पुत्री मीसा भारती चुनाव लड़ रही थीं।
       
लालू   को  अपनी  खोई  जमींन  मिल सकती  है,
बिहार के पांच  विधानसभा  क्षेत्र में हुए  चुनाव में राजद ने तीन सीट  पर जीत दर्ज की है 
            वहीं पासवान की लोजपा ने  पिता-पुत्र-भाई के  तीनों  पारिवारिक सीट पर जीत हासिल की। हाजीपुर से रामविलास पासवान, जमूई से पुत्र चिराग और समस्तीपुर से पासवान के भाई रामचंद्र पासवान नें  जीत दर्ज कर ली है। पिछले  लोकसभा चुनाव में लोजपा का राज्य में सुपड़ा साफ हो गया था।  एनडीए के साथ समझौते के तहत लोजपा को छह सीट मिली थी। जिनमें  सभी   सीटों पर जीत हासिल कर लोजपा  ने  शानदार वापसी की है।
                 वहीं बिहार में तीन सीटों पर चुनाव  लड़ रही भाजपा की एक और सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के  संस्थापक उपेन्द्र कुशवाहा  अपनी कराकट  सहित  तीनों पर जीत हासिल की है। जदयू से अलग होकर पिछले साल तीन मार्च को कुशवाहा ने अपनी नई पार्टी बनाई थी।

           जदयू के कई बड़े नेताओं को इस चुनाव में  पराजय का मुंह   देखना पड़ा। कभी  एनडीए के संयोजक रह चुके जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तीसरे मोर्चे के प्रमुख रणनीतिकार शरद यादव खुद अपनी मधेपुरा  सीट बचा पाने में कामयाब नहीं रह सके ।  शरद यादव को राजद के राजेश रंजन उर्फ पप्पु यादव ने 56209  वोटों  से पराजित किया।  वहीं मशहूर फिल्म निर्माता प्रकाश झा को दूबारा हार का सामना करना पड़ा ।  इसबार जदयू की टिकट पर पश्चिम चंपारण से चुनाव लड़ रहे प्रकाश झा को भाजपा के संजय जयसवाल से पराजित हुए । वे इससे पहले लोजपा के टिकट पर इसी लोकसभा क्षेत्र से  चुनाव में हार  चुके हैं।

     
चुनाव परिणाम आने के बाद  नीतीश कुमार की मुश्किलें  बढ़ गयी है,
 वे इस्तीफा भी दे सकते हैं 
 जदयू का  मुस्लिम वोटरो को  लुभाने  के लिए भाजपा से अलग होने का दांव सही पड़ता नहीं दिखा। जदयू ने इस लोकसभा  चुनाव में तीन मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किये थे। जदयू  के टिकट पर  शिवहर से शाबिर अली, सारण के शलील परवेज और मधुबनी से चुनाव लड़ रहे गुलाम गौस  में किसी को भी  जीत नहीं मिल पाई। वहीं भागलपुर से चुनाव लड़ रहे भाजपा के एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन  राजद के शैलेश कुमार मंडल से मात्र 9485 वोटों से  पराजित हो गये हैं। हुसैन, वाजपेयी के शासनकाल में केन्द्रीय मंत्री भी  रह चुके हैं। उन्होने पिछली बार इसी सीट से जीत हासिल की थी।
     विवादित बयान देकर फंसे भाजपा के  गिरिराज सिंह नवादा से चुनाव जीत चुके हैं। साथ हीं   सीवान के निर्दलिय वर्तमान सांसद ओमप्रकाश यादव ने भाजपा की टिकट पर दुबारा जीत पाने में सफल रहे।
            वहीं राज्य में मिले वोट फीसदी की बात करें तो यहां भी  भाजपा सर्वाधिक 29 वोट फीसदी वोट हासिल किया।  वहीं राजद ने 20.1 फीसदी वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रही  । जदयू ने 15.8 फीसदी वोट के साथ तीसरी स्थान बना पाने में कामयाब रही।  वहीं नोटा पर 581011 वोटरों ने बटन दबा कर अपना विरोध दर्ज किया।

         
रामविलास पासवान को पाला बदलने से फायदा मिला ,
बिहार की राजनीति  में हासिये  पर जाने क बाद एक बार फिर रामविलास की  उम्मीद जगी है 
आनेवाले दिनों में जदयू की परेशानियां बढ़ सकती है। जीत से उत्साहित रामविलास पासवान ने जदयू के भविष्य पर टिप्पणी करते हुए कहते हैें जल्द ही नीतीश की सरकार गिरने वाली है क्योंकि हार को देखकर दर्जनों  विधायक पार्टी छोड़कर जानेवाले हैं।
           यूपीए की केंद्र  सरकार पर एनडीए  नीत  राज्य सरकार  बिहार के प्रति  लगातार  भेदभाव  का आरोप लगाती रही है।  यह अब भी  जारी रहेगी जब भाजपा केन्द्र  में होगी । देखना यह होगा कि विशेष राज्य का दर्जा मांगने में जदयू का सुर मिलाने वाली भाजपा राज्य को यह दर्जा देती है या उठापटक और आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी रहने वाला है।

हरिभूमि में प्रकाशित

Friday, 11 April 2014

बिना गाजे बाजे की फिल्म है ' देख तमाशा देख'


अंत भला तो सब भला। हलांकि यह जुमला तब कहा जाता है जब काम की खराब शुरूआत के बावजूद अंत सुखद हो। लेकिन आईआईएमसी के वर्तमान सत्र  की शुरूआत भी सुखद थी और अंत भी यादगार। इस पड़ाव को यादगार बनाया सिनेमंच की सत्र की आखिरी पेशकश फिरोज अब्बास खान निर्देशित फिल्म देख तमाशा देखने।

ये वही फिरोज अब्बास खान हैं जिनकी साल 2007 में आई विवादास्पद फिल्म 'गांधी माई फादर' ने खूब प्रशंसा बटोरी थी। इससे पहले भी इन्होने थियेटर में खूब नाम कमाया है। 'गांधी माई फादर' के लिए इन्हे बेस्ट स्क्रिन प्ले के लिए 2008 में नेशनल आवार्ड मिल चुका है। इसी कैटगरी में 2007 का एशिया पैसिफिक स्क्रिन अवार्ड इनके नाम रहा।

                   नौ सालों के बाद फिरोज फिर एक बार सच्ची घटनाओं पर आधारित वैचारिक और व्यंग्यात्मक फिल्म देख तमाशा देखके साथ आये हैं। फिल्म महाराष्ट्र के एक गांव की पृष्टभूमि पर बनी है। यह समसामयिक राजनैतिक-सामाजिक विसंगतियो पर बनी फिल्म है। फिल्म में कई गंभीर विषयों को व्यंग्य के माध्यम से निर्देशक ने उठाया है। फिल्म ने साबित किया है कि हास्य फिल्में बिना फुहड़पन के भी बनाई जा सकती है।

                          इस फिल्म में कई कहानियां समानांतर रूप से चलती है। फिल्म की कहानी एक टांगेवाले का एक राजनेता के पोस्टर तले दब कर मरने से शुरु होती है। टांगेवाले के मरने के बाद हिन्दू और मुसलमान उसके शव पर अधिकार के लिए झगड़ने लगते हैं। यह झगड़ा दंगा का रूप ले लेता है। पूरी कहानी इसी के आसपास घूमती है। हालांकि केन्द्रीय कहानी के साथ कई कहानियां साथ-साथ चलती हैं। जिनमे दंगो के बीच शब्बो और प्रशांत का निर्दोष प्यार और उसका दुखांत अंत भी है।

                           इस फिल्म में कई नए प्रयोग देखने को मिल जाएंगे। फिल्म कई टुकड़ो में है। हलांकि निर्देशक इसे मुख्य कहानी से जोड़ने में सफल रहे हैं। कई विसंगति को दो घंटे की फिल्म में दिखाने की कोशिश में कभी-कभी मुख्य कहानी पीछे छूटती लगती है। हलांकि दमदार और चुभते व्यंग्य दर्शक को बांधे रखने में सफल रहते हैं। फिल्म के सटीक संवाद और मजबूत कहानी की वजह से पूरी फिल्म में बैकग्राउंड संगीत का न होने का पता पूरी फिल्म में नहीं चलता है। निर्देशक फिरोज अब्बास खान अपने इन प्रयोगो के बारे में कहते हैं अगर मैं प्रयोग न करूँ तो कुछ नया नहीं कर पाउंगा, फिल्म की कहानी इतनी मजबूत है कि इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक की जरूरत ही नहीं है।
फिल्म को रियल बनाने में कलाकारों ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया है। ज्यादातर कलाकार मराठी रंगमंच से जुड़े रहे हैं। इन कलाकारों ने कहानी की मराठी पृष्टभूमि को जीवंत कर दिया है। फिल्म में एकमात्र सतीश कौशिक जाने-पहचाने चेहरे मिलते हैं। इन्होने फिल्म में मोटु सेठ के चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है। कहानी का प्रधान चरित्र टांगेवाला पूरी फिल्म में सिर्फ पोस्टर में ही दिखता है। फिल्म में कई चरित्र नायक जैसे लगते हैं।


फिल्म में प्रतीकों का प्रयोग किया गया है, जो गंभीर दर्शक की मांग करती है। आम बोल-चाल के शब्दो का प्रयोग और आम लोगो की कहानी की वजह से इसे छोटे शहरों में भी दर्शकोें के द्वारा पसंद की जाएगी; इसकी पूरी संभावना है। फिल्म जिस तरह मीडिया के बदलते स्वरूप, धार्मिक कट्टरता, गरीबी  जैसे सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे को उठाया है। इस काम के लिए फिरोज तारीफ के काबिल हैं।
         कहानी के अंत में पुलिस इंस्पेक्टर अपनी काबिलियत के बदौलत दंगो पर काबू पा लेता है और सबकुछ शांत हो जाता है। यहां फिल्म संदेश देती है कि प्रशासन की मुस्तैदी से हालात काबू किये जा सकते हैं।

                        फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान  निर्देशक फिरोज अब्बास खान, संस्थान के मीडिया गुरू आनंद प्रधान और कई फिल्म के जानकार मौजूद थे। फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के विभिन्न पक्षों पर चर्चा हूई। इस दौरान उन ज्वलंत सवालों पर भी बहस हुई जो फिल्म में उठाए गए थे; जैसा कि हर बार सिने मंच में होता है। देर शाम तक पूरा कुनबा जमा रहा। लेकिन आपको इस फिल्म को देखने के लिए अगले शुक्रवार तक का इंतजार करना पड़ेगा।

Thursday, 10 April 2014

नेताजी पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

अबतक नेताजी के नववर्ष, 26 जनवरी, वसंत पंचमी, गणतंत्र दिवस से लेकर होली के मुबारकबाद वाले पोस्टर सड़क के किनारे किसी खाली जगह पर टंगी मिलती थी। ढ़ेर सारे नाम और उनके फोटो वाले पोस्टर। यह कम-से-कम पैसे में अपना विज्ञापन  करने का राजनेताओं का पारंपरिक जुगाड़ तकनीक रहा है।
                       लेकिन राजनीतिक पार्टियों के ऐसे पोस्टर अब बहुत कम दिखते हैं। इनकी जगह प्रोफेशनल तरीके से बनाई गई बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर और अन्य साधनों ने ले लिया है। अब राजनेता अपना प्रचार किसी कॉरपोरेट के प्रोडक्ट की तरह करने लगे हैं। कार्टुनिस्ट गोपाल कहते हैं इन पोस्टरों में कांट्रास्ट है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
                                     अपने प्रचार-प्रसार में आधुनिक तकनीक और मौकों का फायदा उठाने में         सभी प्रमुख पार्टियां होड़ में लगी दिखती हैं। जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं उस समय उनके उपलब्धियों वाले पोस्टर हर बस-स्टाप पर दिख जाते थे। इन पोस्टरों पर प्रगति रिपोर्ट के साथ शीला दीक्षित के फोटो लगे रहते थे।
                         अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही शीला दीक्षित के फोटो वाले विज्ञापन की जगह अरविंद के अगर कोई घूस मांगता है तो उसे ना मत कहिये .... के दो लाइन के पोस्टरों ने ले ली। इनमें केजरीवाल के तस्वीर लगे थे।
                            लेकिन  प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने प्रचार के मामले में चुनाव के नजदीक आते-आते सबको पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन सड़क से लेकर घर तक पीछा नहीं छोड़ती। सड़क किनारे, बस-स्टाप, मेट्रो में हर जगह 'मोदी सरकार'  बनाने के अपील वाले विज्ञापन दिख जाते हैं। अखबार, इंटरनेट, रेडियो, टीवी के जरीये मोदी सरकार के विज्ञापन हमारे घरों में दाखिल हो रहे हैं। बचे जगह कांग्रेस के विज्ञापनों ने ले रखा है।
                         हालांकि सोशल मीडिया में आम आदमी पार्टी सक्रिय दिखती है। लेकिन यह सक्रियता प्रायोजित नहीं दिखती। लेकिन भाजपा ने सोशल मीडिया में अपनी पैठ  बेवसाइट को भारी रकम चुकाकर बनाई है। यू-ट्युब खोलते ही भाजपा या कांग्रेस के अनचाहे विज्ञापन दिख जाते हैं। इस सुविधा को पाने के लिए बेशक करोड़ो रूपय गूगल को इन दोनों प्रमुख पार्टी ने चुकाये होंगे।
पिछले कई दिनों से नरेन्द्र मोदी के फुल पेज वाले विज्ञापन सभी राष्ट्रीय अखबारों में आ रहे हैं। इसे देखते हूए  मोदी के विज्ञापन पर दस हजार करोड़ खर्च करने के कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा का आरोप निराधार नहीं लगता है। सवाल लाजिमी है कि विज्ञापन में किया जा रहा खर्च कितना सही है और खर्च का पैसा कहां से आ रहा है?
लेकिन इस हवा-हवाई प्रचार से नेता का अपनी जनता से दूरी और बढ़ गयी है। हलांकि कई पार्टियां अपना जनसंपर्क जनता से मिलकर कर रहीं हैं। उनकी समस्यओं को सुन रहीं हैं। एआइएसएफ के महासचिव विश्वजीत कहते हैं वामपंथी पार्टियां जनता से सीधे मिलकर अपने एजेंडा को बताती रही हैं। हम एक वोट एक नोट के नारे के साथ मिलते रहे हैं।
                                                       हालांकि राजनीतिज्ञों का कारपोरेट कल्चर सिर्फ दिल्ली जैसे बड़े महानगर में ही नही दिख रहा है। यह छोटे शहरों और गांवो में भी फैल रहा है। जनसंपर्क  की जगह हवा-हवाई प्रचार लेते जा रहे हैं। बिहार के दरभंगा जिले के सोनू इस बार दुखी हैं कि इस बार कोई बड़ा नेता अबतक उनके गांव नहीं आया। वे कहते हैं कि  नेताजी कम-से-कम पांच साल में एक बार वोट मांगने तो आ ही जाते थे। इस बार तो सब फोटो में ही दिखते रहे हैं। तो क्या जनसम्पर्क के बदलते ट्रेंड की वजह से नेताजी अब पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

                                   

Wednesday, 9 April 2014

क्या कोई राजनेता आम आदमी बन कर नहीं रह सकता।

अरविंद केजरीवाल को एक ऑटोवाले ने कल थप्पड़ मार दिया। पहले माला पहनाई फिर अपने गुस्से  का इजहार किया। क्योंकि 49 दिन कि लंगड़ी सरकारउसके लिए कुछ नहीं किया। विरोधी-समर्थक दोनों इस घटना के बाद सलाह देने लगे हैं। कुछ लोग गुस्से में हैं कोई खुशी जाहिर कर रहें हैं। एक समर्थक को लगता है कि यह सब विरोधियों के इशारे पर हो रहा है।  

                          फेसबुक पर आइआइएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान के एक पोस्ट के कामेंट में   प्रमोद राय लिखते हैं  “अफसोस कि अरविंद के ऊपर हो रहे हमलों को जनता का गुस्सा बताने और प्रचारित करने का तंत्र भी इन दिनों बेहद आक्रामक और कुंठित रुख अख्तियार किए हुए है। आश्चर्य कि जनता ने महज 49 दिन की सरकार से इतनी अपेक्षाएं लगा रखी थीं और वो जो 49 साल से भी ज्यादा समय तक शासन करते रहे उन्हें थप्पड़ मारना तो दूर उनकी अभेद्य सुरक्षा को भी उनके व्यक्तित्व-वैभव से जोड़कर देखा जा रहा है। महज 49 दिन के कार्यकाल के खिलाफ अगर जनता में वाकई इतना आक्रोश होता तो देश अब तक 49 क्रांतियां देख चुका होता। वैसे 49 साल वालों को अगर जनता इतना ही प्यार करती है तो कम से कम एक बार उन्हें अपनी एसपीजी, जेड प्लस, प्राइवेट गनर और गुंडों के घेरे से बाहर निकलकर जनता के बीच में जरूर जाना चाहिए, क्या पता जनता उन्हें फूलों से लाद दे।                                                           दिल्ली में एक सभा के दौरान मुक्के मारना, वाराणसी और गुजरात में अंडे और स्याही का फेका जाना, जगह-जगह काले झंडे दिखाना, और फिर एक ऑटोवाले का थप्पड़ जड़ देना। क्या वाकई यह जनता का गुस्सा हो सकता है? क्या 49 दिनों में ही केजरीवाल इतने अलोकप्रिय हो गए कि उनका विरोध इस तरह किया जाए? जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार, मंहगाई, और अनगिनत समस्याओं के लिए तो राहुल, मनमोहन को थप्पड़ नहीं मारती। डीएलएफ के साथ विवादित जमीन के घोटाले के आरोपी राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका वाड्रा आज भी कांग्रेस की स्टार प्रचारक बनी हुई हैं। बीजेपी के 22 उम्मीदवारो पर रेप जैसे संगीन आरोप लगे हैं। अगर इनका विरोध हो तो जनता का गुस्सा समझ आता है। यहां जनता की मजबूरी है कि इनके अभेद्य दुर्ग को पार कर पाना इन साधारण लोगों के लिए आसान नहीं है। बच जातें हैं तो आम आदमी की छवि बनाने वाले अरविंद केजरीवाल। बिना किसी लाव-लश्कर के साथ चलने वाले अरविंद के पास पहुंचना सबसे आसान है। यही अरविंद के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। अरविंद ने ऐसा कर एक नई शुरूआत तो नहीं की थी लेकिन इसका असर दूसरी पार्टीयों के नेताओं पर जरूर पड़ा था। चाहे भाजपा शासित राजस्थान की मुख्यमंत्री  वसुंधरा राजे हों या उत्तरप्रदेश के सपाई मुख्यमंत्री अखिलेश यादव  कई राजनेताओं ने अपने सुरक्षा खर्चों और ताम-झाम में कटौती की थी।                                                                                     उनके समर्थक उनपर हो रहे लगातार हमले से सशंकित हैं । फेसबुक पर आम आदमी पार्टी के  समर्थक अब्दुल एच हैदर लिखते हैं इन भाड़े के टटुओ से और आशा भी क्या कर सकते हैं! केजरीवाल को सिक्युरिटी ले लेनी चाहिएउन कायरो ने जब महात्मा की हत्या की तो आम आदमी की क्या बिसात!” 
                         एक साधारण आदमी के  चाल-ढाल को अपनाकर  अरविंद केजरीवाल ने एक अच्छी शुरूआत की थी। लेकिन इन घटनाओ के बाद सवाल उठता है कि क्या हमारा समाज इस लायक है कि एक नेता परंपराओं को तोड़ कर आम आदमी की तरह रह सके।

                
थप्पड़ मारने वाले ऑटो चालक से मिलते  अरविंद केजरीवाल साथ
में मनीष सिसोदिया।  सभी फोटो फेसबुक से।

                 पटनाविवि की काउंसलर नैन्सी कहती हैं हम और कितने दिन लोकतंत्र में भी राजशाही के प्रतीक को आज के राजनेताओं में जिंदा देखेंगे। आज अरविंद केजरीवाल को इस देश की जरूरत है। उस ऑटोवाले के थप्पड़ की वजह से सिक्योरिटी ले लेने से उनके कुछ समर्थक भले ही राहत महसूस करें लेकिन इससे मेरे जैसे आम आदमी पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।




फिलहाल अरविंद केजरीवाल उस ऑटोवाले मिलकर अपनी बड़प्पन दिखा चुके हैं। यह और बात है कि केजरीवाल पर थप्पड़ लगने के बाद आप समर्थकों ने प्रतिक्रिया में उस ऑटोवाले की पिटाई कर दी थी।
               
    

Monday, 7 April 2014

राजो दा क्यों विवादित हो गए?

पहली बार उस बुर्जुग को  युवाओं की टोली में  कदमताल मिलाते नंगे पैर चलते  देखा था। पुलिस के डंडे की चोट उनके सर पर भी पड़ी थी। सर से खून रिस-रिस कर जम चुका था। कुर्ता का चिथड़ा उनके बदन से झूल रहा था।उनके पैर का जूता पुलिस के साथ हुए भाग दौ़ड़ में कहीं छूट चुका था। पूरे दिन पुलिस कस्टडी में रखने के बाद सभी आंदोलनकारियों को पुलिस ने छोड़ दिया था। हम सब रेनबो स्टेडियम से पैदल  नारा लगाते चिड़ियांटाड, स्टेशन होते जनशक्ति पहुँचे थे। यहीं उस बुर्जुग से मेरा पहला परिचय हुआ था। ये सीपीआई के नये राज्य सचिव कामरेड राजेन्द्र सिंह थे। अपनी इसी सरल स्वभाव की वजह से वह बने सबके 'राजो दा' । 
         उनके राज्य सचिव बनने के बाद  राज्य में  कई छोटे-बड़े कार्यक्रमो में तेजी आई। हर जगह राजो दा एक कामरेड की तरह ही दिखे। पिछले साल 25 अक्टूबर को हुए सीपीआई के जनाक्रोश रैली में पटना के गांधी मैदान में उमड़े जनसैलाब का अंदाजा तो खुद पार्टी को भी नहीं थी। इसका क्रेडिट कामरेडों के साथ-साथ राजो दा को भी जाएगा ही।
इन सबके बावजूद लोकसभा चुनाव आते-आते सभी दलों की तरह सीपीआई में भी आपसी कलह खुल कर सामने आ गई। कारण बने राजो दा। वह भी तब; जब सीपीआई बिहार में चालिस में से मात्र दो सीटों पर लड़ रही है। बेगुसराय और बांका।
           बेगुसराय  को कम्युनिस्टों का गढ़ कहा जाता रहा है। हालांकि पिछले चार बार से सीपीआई हारती रही है।  इसी को आधार बना कर पार्टी ने चार बार से चुनाव हार रहे शत्रुघ्न सिंह को टिकट न देकर वहां से राज्य सचिव राजेन्द्र सिंह पर दांव लगाया है। लेकिन यह बदलाव शत्रुघ्न सिंह और स्थानीय कॉमरेडों को नहीं पच पाई। पार्टी के पुराने कॉमरेड जयराम कहते हैं सीपीआई अगर बेगुसराय से नहीं जीतती है, तो यह कहीं से नहीं जीतेगी। पार्टी ने शत्रुघ्न बाबू को टिकट न देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।”हालांकि  शत्रुघ्न बाबू संसद में बेगुसराय का और राज्यसभा में एक-एक बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। टिकट नहीं मिलने के बाद शत्रुघ्न बाबू पहले हीं एक लाइन में पार्टी छोड़ने की वजह लिखकर पार्टी से इस्तीफा दे चूके हैं। शत्रुघ्न बाबू के समर्थको ने भी पार्टी से इस्तीफा देकर दबाव बनाने का प्रयास किया । लेकिन पार्टी केे
 केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी एक नहीं सुनी। राजेन्द्र सिंह पर उनके पद का दुरूपयोग का भी आरोप  लग रहा है। पार्टी के एक युवा कामरेड कन्हैया कहते हैं कि राजेन्द्र सिंह ने उपर- उपर सेटिंग कर लिया। जबकी बेगुसराय के कामरेडो ने शत्रुघ्न बाबू को चुना था।फेसबुक पर आदित्या मेरे एक पोस्ट के कामेंट में लिखते हैंशत्रुघ्न बाबू लगातार हार रहे थे ऎसे में पार्टी ने जो किया है, सही किया है। एक बार टिकट नहीं मिलने पर वे बागी हो गये। मतलब वे सच्चे कामरेड नहीं हैं। 
                 लेकिन इस कलह में सबसे बड़ा धक्का उन्हे लगा है जो पार्टी के बची-खुची साख को बचाने के लिए बेगुसराय सीट को एक पार्टी के लिए एक बड़ा दांव मानते हैं। पटना के छात्र शाखा सदस्य रंजीत कहते हैं.. "अभी आपसी मतभेद को भुलाकर पार्टी हित में सबको मिल कर काम करना चाहिए इसी में सबका भला है। टिकट बंटवारे को लेकर उपजा विवाद से भले ही राजेन्द्र सिंह पर अंगुली उठ रही हो लेकिन उनके किये काम को नरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वे आज भी युवाओ की टोली के साथ कदमताल करने के लिए तत्पर दिखते हैं।

Sunday, 30 March 2014

फेसबुक माने इंटरनेट। इंटरनेट माने फेसबुक

मंजीत चार महीने काम करके अपने गांव लौट गया है। वह आगे पढ़ना चाहता है। मंजीत ने इसी साल मैट्रिक की परीक्षा पास की है। उसके पिता खेतों में काम करते हैं। उसके हाथ में चाइनिज स्मार्टफोन है। वह गर्व से बताता है यह मोबाइल उसने अपनी कमाई से खरीदी है।इस सात इंच के स्क्रिन पर वह हिन्दी और भोजपुरी फिल्में देख सकता है। गाने सुन सकता है। फोटो ले सकता है। और सबसे बड़ी बात वह 'फेसबुकिया' भी कर सकता है।
               उसके फेसबुक पर उसके पसंदिदा हीरो अक्षय कुमार भी हैं, और उसकी हीरोइन श्रीदेवी भी। कई सितारे तो उसके फ्रेंड भी हैं, जिससे वह चैटिंग भी कर लेता है। इस बात से बेखबर कि वे प्रोफाइल फेक हैं। उसके फ्रेंड लिस्ट में कॉलेज में पढ़ने वालों से लेकर उसके पड़ोस का गोलू भी है। लाइक, कामेंट, चैट के अलावे वह ज्यादातर फोटो शेयर करता है। जिनमें ज्यादातर उसकी खुद की तस्वीर होती हैं। इसके लिए उसे पांच रुपये रोज खर्च करना पड़ता है। लेकिन उसे फेसबुक की खूबियों के सामने यह रकम कुछ भी नहीं लगता। हलांकि उसके इस पैक का फेसबुक ब्राउज के अलावा और कोई उपयोग नहीं है।
                                                                                                     फोटो- गूगल
   फेसबुक का क्रेजी सिर्फ मंजीत ही नहीं है। यह क्रेज शहरी आधुनिक युवा वर्ग से बढ़कर कस्बों  और गांवों में रहने वाले नई पीढ़ी में फैल रहा है। फेसबुक का यह प्रभाव युवा और आधुनिक लोगों के दायरे से आगे निकल रहा है। चाहे वह क्षेत्र की सीमा हो, पीढी का फासला या फिर तकनीक की पहुंच। प्रमुख एंड्राइड डाउनलोडिंग साइट गूगल प्ले में अबतक मोबाइल पर चलने वाली फेसबुक एप्स को  14504123 इतने लोग डाउनलोड कर चुके हैं।  सितम्बर 2012 तक 1 बिलियन लोग इससे जुड़ चुके हैं। जिनमें भारत में 93 मिलियन यूजर भारत में हैं।
                             इंटरनेट सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियां भी उपभोगताओं को फेसबुक के प्रति बढ़ती दिवानगी को भूनाने के लिए फेसबुक ब्राउज के सीमित उपयोग वाले पैक ऑफर कर रही है। लेकिन इस दिवानगी के खतरे भी कम नहीं हैं। काम के घंटो में इसके उपयोग से कर्मचारियों के कार्यक्षमता के प्रभावित होने के तर्क के साथ कई नियोक्ता काम के समय फेसबुक ब्राउज को प्रतिबंधित कर चुके हैं।
                          इंटरनेट सूचना और ज्ञान का महत्वपूर्ण स्त्रोत बनक उभरा है। कई शिक्षण संस्थानों को इंटरनेट उपयोग के घंंटो को बढाने के लिए फेसबुक ब्राउज को प्रतिबंधित करना पड़ा है। पिछले साल के यूपीएससी के सफल प्रतिभागियों में ज्यादातर छात्र फेसबुक पर नहीं थे या सक्रिय नहीं थे। लेकिन सभी छात्रों ने इंटरनेट को अपनी सफलता में अपना महत्वपूर्ण सहयोगी माना।
हाल में इस नीली दुनिया के संस्थापक मार्क जुकरवर्ग ने फेसबुक के कनैक्टिविटी लैब की एक जानकारी शेयर की। जिसमें उन्होंने पूरी दुनिया में इन्टरनेट सुविधा मुहैया कराने के फेसबुक के महत्वकांक्षी योजना का जिक्र किया है। चाहे जो भी हो फेसबुक के बहाने गांव का मंजीत भी इंटरनेट की दुनिया से जुड़ रहा है।
                           

स्टूडेंट ऐसे ही रहते हैं।

मैं पैदाइशी गंवई हुं। मेरा जन्म भारतवर्ष के एक गांव में हुआ और पूरे तेरह सालों तक वहीं पला-बढ़ा।
 अफसोस बढ़ने के साथ वहां पल न सका; पढ़ना जो था। बाबूजी चाचाओं की तरह न थे। पढ़ाई-लिखाई के महत्व को समझते थे; सो हमें हाई स्कूल की शिक्षा लेने पास के शहर को भेज दिया। वहीं पहली बार मकान-मालिक नामक जीव का किरायेदार बनने का सौभाग्य प्राप्त हूआ। किराया था 600 रु माहवार। इस किराये के एवज में जो कमरा मिला था, वह छतदार था जिसपर पंखा नाचता था। शाम को स्टडी आवर में पूरे दो घंटे के लिए बिजली आती थी और मैं बल्ब पर बैले डांस करते फतिंगो को देखा करता था। रिश्तेदार जब भी शहर को आते; मिलने जरूर आते थे, लोकल ट्रेन की तरह। उन आने वालों में कुछ के लिए हॉल्ट, कुछ के लिए स्टेशन, कुछ के लिए यार्ड था मेरा कमरा। सामाजिकता तो थी ही आर्थिक दृष्टिकोण से भी संसाधन का भरपूर दोहन हुआ।
                          लोगों से सुना करता था राजधानी का माहौल बड़ा पढ़ने लिखने वालाहै। भोदुआ से भोदुआ भी निकल ही जाता है। फिर मैं तो इंटेलिजेंट था, मैं क्यों नहीं सक्सेस करता। तो निर्णय हो गया अब राजधानी में ही रहकर सक्सेस करना है। मेरे गांव के चाचा जी जो  उमर में हमसे थोड़े ही बड़े थे। वे  पटना में  कई सालों से सक्सेस करने में लगे हूए थे।
कुछ रूपये, ढेर सारी नसीहतें औऱ हजारों ख्वहिशों के साथ पिता जी ने गांव के चाचा के साथ लगा दिया। मेरा सामान साइकिल पर बांधते हूए बोले कमरा ढंग का लेना, एयरी हो, लाइटेड हो, शांत हो, आसपास लोग अच्छे रहते हों। वगैरह-वगैरह। आखिरकार सक्सेस करने हमलोग पटना पहूँच हीं गये। चाचा का वर्तमान कमरा इतना हीं बड़ा था जिसमें वे सिर्फ खुद समा सकते थे। कोई और ठौर था नहीं, सो तब तक  वहीं दिन काटने थे । असल में वह रहने का कमरा था ही नहीं अपने युवा काल में किचन या स्टोर रूम रहा होगा। इसे तो मकान-मालिक के मैनेजमेंट का अद्भुत नमूना कहना चाहिए कि उन्होंने इसे कमरा का रूप दे दिया। अब जल्द से जल्द एक कमरा ढूंढना था।
           मै अपने लिए लाइटेड, एयरी और अच्छे माहौल वाले कमरे की तलाश मे लग गया। कई दिनों तक पुरे दिन रूम की तलाश में भटकता रहता। एकाध कमरे मिले भी वह बाबूजी के मापदंड पर खरे नहीं उतरे। मकानमालिक की शर्तों के आगे मेरे आशियाने के सपने दम तोड़ देते थे। किसी मकान के आगे टू-लेट के बोर्ड  मृगमरीचिका जैसे थे। पूरे दिन पदयात्रा करने और कमखुराकी की वजह से आंखे धंस गयी। तिस पर कमरे के उस छोटे से चौकी पर हम अंटते भी न थे। शिफ्ट में सोना पड़ता था।
                      चाचा के साथ रहते हुए पूरे सप्ताह गुजर चुका था। एक सुबह मेरे चाचा का नाम पुकारते हूए मकानमालिक आया।
बोला आपको अबतक कोई जगह नहीं मिली ?”
मैनें अपना निचला ओठ ढ़लकाते हुए बोला नहीं
पीछे से श्रीमती जी उलाहने के लहजे में बोलीं  तो कब तक रहना है?”  वैसे उपर रूम खाली है। वही ले लिजिए।
सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई स्थाई वाला सरकारी नौकरी लग गई हो । मैं श्रीमान जी के पीछे लग गया । तंग सीढ़ी पर पहुंच कर बोले  “यही रूम है।
रूम क्या था प्लाइ वोर्ड से घिरा सीढ़ी घर का कमरा। तपाक से बोले यहां कोई नही आता। कोई डिस्टर्ब नहीं होगा ।
दस मिनट भी गुजरे न होगे; गर्मीं ने असर दिखाना शुरू कर दिया। सर चकराने लगा।

जी में आया बोल दुँ कबूतर पाल लीजिए रखने में काम आयेगा ।
शाम को मकान मकान मालिक फिर आये पूछा क्या डिसीजन लिये । तेवर बदलते हुए आदेश दिया अब और नहीं रख सकते।
            अब तक इसका ज्ञान हो चुका था कि स्टुडेंट को कहां रूम मिलता है। मैंने समझौता करते हुए एक तंग गली के परित्यक्त मकान में अपना ठौर ले लिया है। जो बेसक किचन नहीं है। उससे बड़ा है। यहां एलार्म लगाने की जरुरत नहीं पड़ती। बच्चे समय के पक्के हैं। भोर होते हीं अपना ड्युटी देने लगते हैं। खिड़की खोलना मना है। पूरे दिन बिजली रहती है। हीटर चलाने की छूट है। मकानमालिक का बड़ा लड़का बिजली मैकेनिक है।
वैसे स्टुडेंट ऐसे ही रहते हैं।

              

Friday, 28 March 2014

चिट्ठी





मार्च                                                                 गांव गोदाइपट्टी
                                                                                                                                                         जिला दरभंगा 
                                                                          बिहार      

मेरे प्यारे दोस्त 




यहाँ मौसम बदल रहा है। ठंड ने अपने जाने की तैयारी शुरू कर दी है। मेरी खिड़की से दिखने वाले पलास ने सारे पत्ते गिरा दिये हैं। अब सिर्फ लाल-लाल फूल बच गये हैं। नागार्जुन के 'पत्रहीन नग्न गाछ' की तरह। गेहूँ की बालियां पक गई हैं। किसान फसल काटने की तैयारी में लग गये हैं। आम पर मँजरी बौरा गया है। अबकी आम से डालियां लदने वाली है। हमारे यहां हर गांव में आम के बाग मिल जाएंगे। तरह-तरह के आम- कपूरिया, किसनभोग, कलकत्तिया, सिपिया। लेकिन मालदह आम की तो बात ही कुछ और है। यहां के आम के मिठास का राज यहां की मिट्टी है। चूना वाली मिट्टी होने के कारण यहां के आम इतने मीठे होते हैं। वैसे हमारी पहचान सिर्फ आम की मिठास से ही नहीं है। हमारी पहचान हमारी मीठी बोली से भी है। यहां मैथिली और हिन्दी बोली जाती है। भाषा के आधार पर मैथिली भाषा-भाषी क्षेत्र को 'मिथिला' के नाम से पहचान मिली है। दरभंगा उस मिथिला का प्रतिनिधि है। दरभंगा को बंगाल के द्वार के नाम से जाना जाता है। यहां की संस्कृति में बांग्ला और हिन्दी पट्टी का फ्यूजन देखने को मिल जाएगा। दरभंगा अपनी  समृद्ध और विशिष्ट  परंपराओं के लिए भी जानी जाता है।
मिथिला के बारे में एक कहावत प्रचलित है
 आम पान मछली मखान ।
 ये सब हैं मिथिला के पहचान।।
 दरभंगा मखाना उत्पादन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह हमारे पूर्वजों की प्रकृति से तालमेल बिठा कर जीने का एक बेजोड़ नमूना है। दरभंगा गंडक और बागमती दो नदियों के पाटों के बीच का भू-भाग है। बरसात के समय नेपाल से आनेवाली वाली बाढ़ के पानी को तालाब बना कर संरक्षित कर लिया जाता रहा है। इस संरक्षित पानी का उपयोग वर्ष भर होता है। तालाब में मछलियां पलती हैं तो उसके सतह पर मखाना की डालियां उतराती हैं। इसी तालाब के चारो ओर पान के पत्ते मनोरम प्राकृतिक दृश्य पैदा करते है। प्रकृति की गोद में बैठकर विद्यापति ने प्रकृति को समर्पित गीत लिखे जो साल बाद भी यहां के अमराइयों में गूंजते हैं। विद्यापति की परम्परा को यहां के विद्वानों ने आगे बढ़ाया है। गोनू झा के लघु हास्य कथा तो लोक कथाओं का हिस्सा बने हुए हैं।
               
मिथिला पेटिंग के बारे में तो आप जानते ही होंगे। हमारे यहां हर घर में मिथिला पेंटिग के नमूने देखने को मिल जाएंगे। इसके अलावे बिंदिया आर्ट के भी नमूने मिलेंगे। इसमें बिन्दी से विभिन्न एतिहासिक पात्रों का चित्रण किया जाता है।
   मिथिला में कुछ ऐसे त्योहार भी मनाये जाते हैं जो सिर्फ यहां के हैं। इनमें एक पर्व है 'सामा चकेवा'। सामा चकेवा नवयुवतियों के द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है जो जनवरी के महीने में मनाया जाता है। एक खास दिन होता है जिसमें दिन की शुरूआत सत्तू पीने से होती है। इसे सतुआनी नाम भी दिया गया है।
            दरभंगा ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र रहा है। यहां बिहार का एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय है। ललित नारायण मिथिला विवि शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। इसके विस्तृत अहाते में मनोकामना मंदिर और श्यामा मंदिर है। मनोकामना मंदिर के बारे में किंवदंती है कि यहां जो भी इच्छा मांगी जाती है वह पूरी हो जाती है। मंदिर के दीवारों पर हजारों मन्नतें लिखी मिलेंगी।
दरभंगा वर्षों से मेडिकल टुरिज्म का केन्द्र रहा है। यहाँ अब भी पड़ोसी देश नेपाल से इलाज के लिए लोग आते हैं। दरभंगा मेडिकल कॉलेज चिकित्सा का पुराना केन्द्र रहा है। शुरुआती दौर में ही आकाशवाणी और दूरदर्शन के केन्द्र यहां स्थापित किये गये थे। इस छोटे से शहर में दो संग्रहालय हैं।
 जो यहां की समृध्द इतिहास के सबूत हैं। महराजा लक्ष्मीश्वर सिंह म्युजियम में दरभंगा महराज से जुड़े बहुमूल्य कला सामग्री को सहेज कर रखा गया है। दरभंगा महराज अपनी कला प्रेम और समृध्दि के लिए जाने जाते हैं। उनके कलाकारीयुक्त भवनों के अवशेष देखे जा सकते हैं। संरक्षण के अभाव में इन महलों का क्षरण हो रहा है। दूसरे संग्रहालय चंद्रधारी म्युजियम में मिनियेचर पेंटिग, आधुनिक पेटिंग, शीशे के कटिंग, आदि हैं।
दरभंगा से 20 किलोमीटर दूर अहिल्या स्थान है। कुशेश्वर नाथ स्थान, गौतम स्थान आदि यहां के दर्शनीय स्थल है। रामायण में इन जगहो का जिक्र मिलता है। इन जगहों  के बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। यहीं उचैठ स्थान है जहां  कालिदास को देवी काली ने वरदान दिया था। कुशेश्वर ब्लाक के सिंगिया चौर के 7000 एकड़ फैले क्षेत्र में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश साइबेरिया सहित कई देशों के 9 प्रजाति के प्रवासी पक्षी हर साल आते हैं।
और भी बहुत कुछ है हमारे यहाँ कभी आइये।आप भी हमारे मेहमाननवाजी  के कायल हो जाएंगे।
               
                                                                         तुम्हारा

                                                                               गौरव