Friday, 11 April 2014

बिना गाजे बाजे की फिल्म है ' देख तमाशा देख'


अंत भला तो सब भला। हलांकि यह जुमला तब कहा जाता है जब काम की खराब शुरूआत के बावजूद अंत सुखद हो। लेकिन आईआईएमसी के वर्तमान सत्र  की शुरूआत भी सुखद थी और अंत भी यादगार। इस पड़ाव को यादगार बनाया सिनेमंच की सत्र की आखिरी पेशकश फिरोज अब्बास खान निर्देशित फिल्म देख तमाशा देखने।

ये वही फिरोज अब्बास खान हैं जिनकी साल 2007 में आई विवादास्पद फिल्म 'गांधी माई फादर' ने खूब प्रशंसा बटोरी थी। इससे पहले भी इन्होने थियेटर में खूब नाम कमाया है। 'गांधी माई फादर' के लिए इन्हे बेस्ट स्क्रिन प्ले के लिए 2008 में नेशनल आवार्ड मिल चुका है। इसी कैटगरी में 2007 का एशिया पैसिफिक स्क्रिन अवार्ड इनके नाम रहा।

                   नौ सालों के बाद फिरोज फिर एक बार सच्ची घटनाओं पर आधारित वैचारिक और व्यंग्यात्मक फिल्म देख तमाशा देखके साथ आये हैं। फिल्म महाराष्ट्र के एक गांव की पृष्टभूमि पर बनी है। यह समसामयिक राजनैतिक-सामाजिक विसंगतियो पर बनी फिल्म है। फिल्म में कई गंभीर विषयों को व्यंग्य के माध्यम से निर्देशक ने उठाया है। फिल्म ने साबित किया है कि हास्य फिल्में बिना फुहड़पन के भी बनाई जा सकती है।

                          इस फिल्म में कई कहानियां समानांतर रूप से चलती है। फिल्म की कहानी एक टांगेवाले का एक राजनेता के पोस्टर तले दब कर मरने से शुरु होती है। टांगेवाले के मरने के बाद हिन्दू और मुसलमान उसके शव पर अधिकार के लिए झगड़ने लगते हैं। यह झगड़ा दंगा का रूप ले लेता है। पूरी कहानी इसी के आसपास घूमती है। हालांकि केन्द्रीय कहानी के साथ कई कहानियां साथ-साथ चलती हैं। जिनमे दंगो के बीच शब्बो और प्रशांत का निर्दोष प्यार और उसका दुखांत अंत भी है।

                           इस फिल्म में कई नए प्रयोग देखने को मिल जाएंगे। फिल्म कई टुकड़ो में है। हलांकि निर्देशक इसे मुख्य कहानी से जोड़ने में सफल रहे हैं। कई विसंगति को दो घंटे की फिल्म में दिखाने की कोशिश में कभी-कभी मुख्य कहानी पीछे छूटती लगती है। हलांकि दमदार और चुभते व्यंग्य दर्शक को बांधे रखने में सफल रहते हैं। फिल्म के सटीक संवाद और मजबूत कहानी की वजह से पूरी फिल्म में बैकग्राउंड संगीत का न होने का पता पूरी फिल्म में नहीं चलता है। निर्देशक फिरोज अब्बास खान अपने इन प्रयोगो के बारे में कहते हैं अगर मैं प्रयोग न करूँ तो कुछ नया नहीं कर पाउंगा, फिल्म की कहानी इतनी मजबूत है कि इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक की जरूरत ही नहीं है।
फिल्म को रियल बनाने में कलाकारों ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया है। ज्यादातर कलाकार मराठी रंगमंच से जुड़े रहे हैं। इन कलाकारों ने कहानी की मराठी पृष्टभूमि को जीवंत कर दिया है। फिल्म में एकमात्र सतीश कौशिक जाने-पहचाने चेहरे मिलते हैं। इन्होने फिल्म में मोटु सेठ के चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है। कहानी का प्रधान चरित्र टांगेवाला पूरी फिल्म में सिर्फ पोस्टर में ही दिखता है। फिल्म में कई चरित्र नायक जैसे लगते हैं।


फिल्म में प्रतीकों का प्रयोग किया गया है, जो गंभीर दर्शक की मांग करती है। आम बोल-चाल के शब्दो का प्रयोग और आम लोगो की कहानी की वजह से इसे छोटे शहरों में भी दर्शकोें के द्वारा पसंद की जाएगी; इसकी पूरी संभावना है। फिल्म जिस तरह मीडिया के बदलते स्वरूप, धार्मिक कट्टरता, गरीबी  जैसे सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे को उठाया है। इस काम के लिए फिरोज तारीफ के काबिल हैं।
         कहानी के अंत में पुलिस इंस्पेक्टर अपनी काबिलियत के बदौलत दंगो पर काबू पा लेता है और सबकुछ शांत हो जाता है। यहां फिल्म संदेश देती है कि प्रशासन की मुस्तैदी से हालात काबू किये जा सकते हैं।

                        फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान  निर्देशक फिरोज अब्बास खान, संस्थान के मीडिया गुरू आनंद प्रधान और कई फिल्म के जानकार मौजूद थे। फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के विभिन्न पक्षों पर चर्चा हूई। इस दौरान उन ज्वलंत सवालों पर भी बहस हुई जो फिल्म में उठाए गए थे; जैसा कि हर बार सिने मंच में होता है। देर शाम तक पूरा कुनबा जमा रहा। लेकिन आपको इस फिल्म को देखने के लिए अगले शुक्रवार तक का इंतजार करना पड़ेगा।

Thursday, 10 April 2014

नेताजी पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

अबतक नेताजी के नववर्ष, 26 जनवरी, वसंत पंचमी, गणतंत्र दिवस से लेकर होली के मुबारकबाद वाले पोस्टर सड़क के किनारे किसी खाली जगह पर टंगी मिलती थी। ढ़ेर सारे नाम और उनके फोटो वाले पोस्टर। यह कम-से-कम पैसे में अपना विज्ञापन  करने का राजनेताओं का पारंपरिक जुगाड़ तकनीक रहा है।
                       लेकिन राजनीतिक पार्टियों के ऐसे पोस्टर अब बहुत कम दिखते हैं। इनकी जगह प्रोफेशनल तरीके से बनाई गई बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर और अन्य साधनों ने ले लिया है। अब राजनेता अपना प्रचार किसी कॉरपोरेट के प्रोडक्ट की तरह करने लगे हैं। कार्टुनिस्ट गोपाल कहते हैं इन पोस्टरों में कांट्रास्ट है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
                                     अपने प्रचार-प्रसार में आधुनिक तकनीक और मौकों का फायदा उठाने में         सभी प्रमुख पार्टियां होड़ में लगी दिखती हैं। जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं उस समय उनके उपलब्धियों वाले पोस्टर हर बस-स्टाप पर दिख जाते थे। इन पोस्टरों पर प्रगति रिपोर्ट के साथ शीला दीक्षित के फोटो लगे रहते थे।
                         अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही शीला दीक्षित के फोटो वाले विज्ञापन की जगह अरविंद के अगर कोई घूस मांगता है तो उसे ना मत कहिये .... के दो लाइन के पोस्टरों ने ले ली। इनमें केजरीवाल के तस्वीर लगे थे।
                            लेकिन  प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने प्रचार के मामले में चुनाव के नजदीक आते-आते सबको पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन सड़क से लेकर घर तक पीछा नहीं छोड़ती। सड़क किनारे, बस-स्टाप, मेट्रो में हर जगह 'मोदी सरकार'  बनाने के अपील वाले विज्ञापन दिख जाते हैं। अखबार, इंटरनेट, रेडियो, टीवी के जरीये मोदी सरकार के विज्ञापन हमारे घरों में दाखिल हो रहे हैं। बचे जगह कांग्रेस के विज्ञापनों ने ले रखा है।
                         हालांकि सोशल मीडिया में आम आदमी पार्टी सक्रिय दिखती है। लेकिन यह सक्रियता प्रायोजित नहीं दिखती। लेकिन भाजपा ने सोशल मीडिया में अपनी पैठ  बेवसाइट को भारी रकम चुकाकर बनाई है। यू-ट्युब खोलते ही भाजपा या कांग्रेस के अनचाहे विज्ञापन दिख जाते हैं। इस सुविधा को पाने के लिए बेशक करोड़ो रूपय गूगल को इन दोनों प्रमुख पार्टी ने चुकाये होंगे।
पिछले कई दिनों से नरेन्द्र मोदी के फुल पेज वाले विज्ञापन सभी राष्ट्रीय अखबारों में आ रहे हैं। इसे देखते हूए  मोदी के विज्ञापन पर दस हजार करोड़ खर्च करने के कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा का आरोप निराधार नहीं लगता है। सवाल लाजिमी है कि विज्ञापन में किया जा रहा खर्च कितना सही है और खर्च का पैसा कहां से आ रहा है?
लेकिन इस हवा-हवाई प्रचार से नेता का अपनी जनता से दूरी और बढ़ गयी है। हलांकि कई पार्टियां अपना जनसंपर्क जनता से मिलकर कर रहीं हैं। उनकी समस्यओं को सुन रहीं हैं। एआइएसएफ के महासचिव विश्वजीत कहते हैं वामपंथी पार्टियां जनता से सीधे मिलकर अपने एजेंडा को बताती रही हैं। हम एक वोट एक नोट के नारे के साथ मिलते रहे हैं।
                                                       हालांकि राजनीतिज्ञों का कारपोरेट कल्चर सिर्फ दिल्ली जैसे बड़े महानगर में ही नही दिख रहा है। यह छोटे शहरों और गांवो में भी फैल रहा है। जनसंपर्क  की जगह हवा-हवाई प्रचार लेते जा रहे हैं। बिहार के दरभंगा जिले के सोनू इस बार दुखी हैं कि इस बार कोई बड़ा नेता अबतक उनके गांव नहीं आया। वे कहते हैं कि  नेताजी कम-से-कम पांच साल में एक बार वोट मांगने तो आ ही जाते थे। इस बार तो सब फोटो में ही दिखते रहे हैं। तो क्या जनसम्पर्क के बदलते ट्रेंड की वजह से नेताजी अब पांच साल में एक बार भी नहीं आएंगे।

                                   

Wednesday, 9 April 2014

क्या कोई राजनेता आम आदमी बन कर नहीं रह सकता।

अरविंद केजरीवाल को एक ऑटोवाले ने कल थप्पड़ मार दिया। पहले माला पहनाई फिर अपने गुस्से  का इजहार किया। क्योंकि 49 दिन कि लंगड़ी सरकारउसके लिए कुछ नहीं किया। विरोधी-समर्थक दोनों इस घटना के बाद सलाह देने लगे हैं। कुछ लोग गुस्से में हैं कोई खुशी जाहिर कर रहें हैं। एक समर्थक को लगता है कि यह सब विरोधियों के इशारे पर हो रहा है।  

                          फेसबुक पर आइआइएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान के एक पोस्ट के कामेंट में   प्रमोद राय लिखते हैं  “अफसोस कि अरविंद के ऊपर हो रहे हमलों को जनता का गुस्सा बताने और प्रचारित करने का तंत्र भी इन दिनों बेहद आक्रामक और कुंठित रुख अख्तियार किए हुए है। आश्चर्य कि जनता ने महज 49 दिन की सरकार से इतनी अपेक्षाएं लगा रखी थीं और वो जो 49 साल से भी ज्यादा समय तक शासन करते रहे उन्हें थप्पड़ मारना तो दूर उनकी अभेद्य सुरक्षा को भी उनके व्यक्तित्व-वैभव से जोड़कर देखा जा रहा है। महज 49 दिन के कार्यकाल के खिलाफ अगर जनता में वाकई इतना आक्रोश होता तो देश अब तक 49 क्रांतियां देख चुका होता। वैसे 49 साल वालों को अगर जनता इतना ही प्यार करती है तो कम से कम एक बार उन्हें अपनी एसपीजी, जेड प्लस, प्राइवेट गनर और गुंडों के घेरे से बाहर निकलकर जनता के बीच में जरूर जाना चाहिए, क्या पता जनता उन्हें फूलों से लाद दे।                                                           दिल्ली में एक सभा के दौरान मुक्के मारना, वाराणसी और गुजरात में अंडे और स्याही का फेका जाना, जगह-जगह काले झंडे दिखाना, और फिर एक ऑटोवाले का थप्पड़ जड़ देना। क्या वाकई यह जनता का गुस्सा हो सकता है? क्या 49 दिनों में ही केजरीवाल इतने अलोकप्रिय हो गए कि उनका विरोध इस तरह किया जाए? जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार, मंहगाई, और अनगिनत समस्याओं के लिए तो राहुल, मनमोहन को थप्पड़ नहीं मारती। डीएलएफ के साथ विवादित जमीन के घोटाले के आरोपी राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका वाड्रा आज भी कांग्रेस की स्टार प्रचारक बनी हुई हैं। बीजेपी के 22 उम्मीदवारो पर रेप जैसे संगीन आरोप लगे हैं। अगर इनका विरोध हो तो जनता का गुस्सा समझ आता है। यहां जनता की मजबूरी है कि इनके अभेद्य दुर्ग को पार कर पाना इन साधारण लोगों के लिए आसान नहीं है। बच जातें हैं तो आम आदमी की छवि बनाने वाले अरविंद केजरीवाल। बिना किसी लाव-लश्कर के साथ चलने वाले अरविंद के पास पहुंचना सबसे आसान है। यही अरविंद के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। अरविंद ने ऐसा कर एक नई शुरूआत तो नहीं की थी लेकिन इसका असर दूसरी पार्टीयों के नेताओं पर जरूर पड़ा था। चाहे भाजपा शासित राजस्थान की मुख्यमंत्री  वसुंधरा राजे हों या उत्तरप्रदेश के सपाई मुख्यमंत्री अखिलेश यादव  कई राजनेताओं ने अपने सुरक्षा खर्चों और ताम-झाम में कटौती की थी।                                                                                     उनके समर्थक उनपर हो रहे लगातार हमले से सशंकित हैं । फेसबुक पर आम आदमी पार्टी के  समर्थक अब्दुल एच हैदर लिखते हैं इन भाड़े के टटुओ से और आशा भी क्या कर सकते हैं! केजरीवाल को सिक्युरिटी ले लेनी चाहिएउन कायरो ने जब महात्मा की हत्या की तो आम आदमी की क्या बिसात!” 
                         एक साधारण आदमी के  चाल-ढाल को अपनाकर  अरविंद केजरीवाल ने एक अच्छी शुरूआत की थी। लेकिन इन घटनाओ के बाद सवाल उठता है कि क्या हमारा समाज इस लायक है कि एक नेता परंपराओं को तोड़ कर आम आदमी की तरह रह सके।

                
थप्पड़ मारने वाले ऑटो चालक से मिलते  अरविंद केजरीवाल साथ
में मनीष सिसोदिया।  सभी फोटो फेसबुक से।

                 पटनाविवि की काउंसलर नैन्सी कहती हैं हम और कितने दिन लोकतंत्र में भी राजशाही के प्रतीक को आज के राजनेताओं में जिंदा देखेंगे। आज अरविंद केजरीवाल को इस देश की जरूरत है। उस ऑटोवाले के थप्पड़ की वजह से सिक्योरिटी ले लेने से उनके कुछ समर्थक भले ही राहत महसूस करें लेकिन इससे मेरे जैसे आम आदमी पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।




फिलहाल अरविंद केजरीवाल उस ऑटोवाले मिलकर अपनी बड़प्पन दिखा चुके हैं। यह और बात है कि केजरीवाल पर थप्पड़ लगने के बाद आप समर्थकों ने प्रतिक्रिया में उस ऑटोवाले की पिटाई कर दी थी।
               
    

Monday, 7 April 2014

राजो दा क्यों विवादित हो गए?

पहली बार उस बुर्जुग को  युवाओं की टोली में  कदमताल मिलाते नंगे पैर चलते  देखा था। पुलिस के डंडे की चोट उनके सर पर भी पड़ी थी। सर से खून रिस-रिस कर जम चुका था। कुर्ता का चिथड़ा उनके बदन से झूल रहा था।उनके पैर का जूता पुलिस के साथ हुए भाग दौ़ड़ में कहीं छूट चुका था। पूरे दिन पुलिस कस्टडी में रखने के बाद सभी आंदोलनकारियों को पुलिस ने छोड़ दिया था। हम सब रेनबो स्टेडियम से पैदल  नारा लगाते चिड़ियांटाड, स्टेशन होते जनशक्ति पहुँचे थे। यहीं उस बुर्जुग से मेरा पहला परिचय हुआ था। ये सीपीआई के नये राज्य सचिव कामरेड राजेन्द्र सिंह थे। अपनी इसी सरल स्वभाव की वजह से वह बने सबके 'राजो दा' । 
         उनके राज्य सचिव बनने के बाद  राज्य में  कई छोटे-बड़े कार्यक्रमो में तेजी आई। हर जगह राजो दा एक कामरेड की तरह ही दिखे। पिछले साल 25 अक्टूबर को हुए सीपीआई के जनाक्रोश रैली में पटना के गांधी मैदान में उमड़े जनसैलाब का अंदाजा तो खुद पार्टी को भी नहीं थी। इसका क्रेडिट कामरेडों के साथ-साथ राजो दा को भी जाएगा ही।
इन सबके बावजूद लोकसभा चुनाव आते-आते सभी दलों की तरह सीपीआई में भी आपसी कलह खुल कर सामने आ गई। कारण बने राजो दा। वह भी तब; जब सीपीआई बिहार में चालिस में से मात्र दो सीटों पर लड़ रही है। बेगुसराय और बांका।
           बेगुसराय  को कम्युनिस्टों का गढ़ कहा जाता रहा है। हालांकि पिछले चार बार से सीपीआई हारती रही है।  इसी को आधार बना कर पार्टी ने चार बार से चुनाव हार रहे शत्रुघ्न सिंह को टिकट न देकर वहां से राज्य सचिव राजेन्द्र सिंह पर दांव लगाया है। लेकिन यह बदलाव शत्रुघ्न सिंह और स्थानीय कॉमरेडों को नहीं पच पाई। पार्टी के पुराने कॉमरेड जयराम कहते हैं सीपीआई अगर बेगुसराय से नहीं जीतती है, तो यह कहीं से नहीं जीतेगी। पार्टी ने शत्रुघ्न बाबू को टिकट न देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।”हालांकि  शत्रुघ्न बाबू संसद में बेगुसराय का और राज्यसभा में एक-एक बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। टिकट नहीं मिलने के बाद शत्रुघ्न बाबू पहले हीं एक लाइन में पार्टी छोड़ने की वजह लिखकर पार्टी से इस्तीफा दे चूके हैं। शत्रुघ्न बाबू के समर्थको ने भी पार्टी से इस्तीफा देकर दबाव बनाने का प्रयास किया । लेकिन पार्टी केे
 केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी एक नहीं सुनी। राजेन्द्र सिंह पर उनके पद का दुरूपयोग का भी आरोप  लग रहा है। पार्टी के एक युवा कामरेड कन्हैया कहते हैं कि राजेन्द्र सिंह ने उपर- उपर सेटिंग कर लिया। जबकी बेगुसराय के कामरेडो ने शत्रुघ्न बाबू को चुना था।फेसबुक पर आदित्या मेरे एक पोस्ट के कामेंट में लिखते हैंशत्रुघ्न बाबू लगातार हार रहे थे ऎसे में पार्टी ने जो किया है, सही किया है। एक बार टिकट नहीं मिलने पर वे बागी हो गये। मतलब वे सच्चे कामरेड नहीं हैं। 
                 लेकिन इस कलह में सबसे बड़ा धक्का उन्हे लगा है जो पार्टी के बची-खुची साख को बचाने के लिए बेगुसराय सीट को एक पार्टी के लिए एक बड़ा दांव मानते हैं। पटना के छात्र शाखा सदस्य रंजीत कहते हैं.. "अभी आपसी मतभेद को भुलाकर पार्टी हित में सबको मिल कर काम करना चाहिए इसी में सबका भला है। टिकट बंटवारे को लेकर उपजा विवाद से भले ही राजेन्द्र सिंह पर अंगुली उठ रही हो लेकिन उनके किये काम को नरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वे आज भी युवाओ की टोली के साथ कदमताल करने के लिए तत्पर दिखते हैं।