मैं पैदाइशी गंवई हुं। मेरा
जन्म भारतवर्ष के एक गांव में हुआ और पूरे तेरह सालों तक वहीं पला-बढ़ा।
अफसोस बढ़ने के साथ वहां पल न सका; पढ़ना जो था। बाबूजी चाचाओं की तरह न थे।
पढ़ाई-लिखाई के महत्व को समझते थे; सो हमें हाई स्कूल
की शिक्षा लेने पास के शहर को भेज दिया। वहीं पहली बार मकान-मालिक नामक जीव का
किरायेदार बनने का सौभाग्य प्राप्त हूआ। किराया था 600 रु माहवार। इस किराये के
एवज में जो कमरा मिला था, वह छतदार था जिसपर पंखा नाचता था। शाम को स्टडी आवर में
पूरे दो घंटे के लिए बिजली आती थी और मैं बल्ब पर बैले डांस करते फतिंगो को देखा
करता था। रिश्तेदार जब भी शहर को आते; मिलने जरूर आते थे,
लोकल ट्रेन की तरह। उन आने वालों में कुछ के लिए हॉल्ट, कुछ के लिए स्टेशन, कुछ के
लिए यार्ड था मेरा कमरा। सामाजिकता तो थी ही आर्थिक दृष्टिकोण से भी संसाधन का भरपूर दोहन हुआ।
लोगों से सुना करता था
राजधानी का माहौल ‘बड़ा पढ़ने लिखने वाला’ है। भोदुआ से भोदुआ भी ‘निकल’ ही जाता है। फिर
मैं तो इंटेलिजेंट था, मैं क्यों नहीं सक्सेस करता। तो निर्णय हो गया अब राजधानी
में ही रहकर सक्सेस करना है। मेरे गांव के चाचा जी जो उमर में हमसे थोड़े ही बड़े थे। वे पटना में कई सालों से सक्सेस करने में लगे हूए थे।
कुछ रूपये, ढेर सारी
नसीहतें औऱ हजारों ख्वहिशों के साथ पिता जी ने गांव के चाचा के साथ लगा दिया। मेरा
सामान साइकिल पर बांधते हूए बोले “कमरा ढंग का लेना,
एयरी हो, लाइटेड हो, शांत हो, आसपास लोग अच्छे रहते हों। वगैरह-वगैरह। आखिरकार
सक्सेस करने हमलोग पटना पहूँच हीं गये। चाचा का वर्तमान कमरा इतना हीं बड़ा था
जिसमें वे सिर्फ खुद समा सकते थे। कोई और ठौर था नहीं, सो तब तक वहीं दिन काटने थे । असल में वह रहने का कमरा था
ही नहीं अपने युवा काल में किचन या स्टोर रूम रहा होगा। इसे तो मकान-मालिक के मैनेजमेंट
का अद्भुत नमूना कहना चाहिए कि उन्होंने इसे कमरा का रूप दे दिया। अब जल्द से जल्द
एक कमरा ढूंढना था।
मै अपने लिए लाइटेड, एयरी और अच्छे माहौल वाले
कमरे की तलाश मे लग गया। कई दिनों तक पुरे दिन रूम की तलाश में भटकता रहता। एकाध
कमरे मिले भी वह बाबूजी के मापदंड पर खरे नहीं उतरे। मकानमालिक की शर्तों के आगे
मेरे आशियाने के सपने दम तोड़ देते थे।
किसी मकान के आगे टू-लेट के बोर्ड
मृगमरीचिका जैसे थे। पूरे दिन
पदयात्रा करने और कमखुराकी की वजह से आंखे धंस गयी। तिस पर कमरे के उस छोटे से
चौकी पर हम अंटते भी न थे। शिफ्ट में सोना पड़ता था।
चाचा के साथ रहते हुए पूरे
सप्ताह गुजर चुका था। एक सुबह मेरे चाचा का नाम पुकारते हूए मकानमालिक आया।
बोला “आपको अबतक कोई जगह नहीं मिली ?”
मैनें अपना निचला ओठ
ढ़लकाते हुए बोला ‘नहीं’
पीछे से श्रीमती जी
उलाहने के लहजे में बोलीं “तो कब तक रहना है?” वैसे उपर रूम खाली है। वही ले लिजिए।
सुनकर ऐसा लगा जैसे
कोई स्थाई वाला सरकारी नौकरी लग गई हो । मैं श्रीमान जी के पीछे लग गया । तंग सीढ़ी पर
पहुंच कर बोले “यही रूम
है।”
रूम क्या था प्लाइ
वोर्ड से घिरा सीढ़ी घर का कमरा। तपाक से बोले यहां कोई नही आता। कोई डिस्टर्ब
नहीं होगा ।
दस मिनट भी गुजरे न
होगे; गर्मीं ने असर दिखाना शुरू कर दिया। सर चकराने
लगा।
जी में आया बोल दुँ
कबूतर पाल लीजिए रखने में काम आयेगा ।
शाम को मकान मकान
मालिक फिर आये पूछा क्या डिसीजन लिये । तेवर बदलते हुए आदेश दिया अब और नहीं रख
सकते।
अब तक इसका ज्ञान हो चुका था कि
स्टुडेंट को कहां रूम मिलता है। मैंने समझौता करते हुए एक तंग गली के परित्यक्त
मकान में अपना ठौर ले लिया है। जो बेसक किचन नहीं है। उससे बड़ा है। यहां एलार्म
लगाने की जरुरत नहीं पड़ती। बच्चे समय के पक्के हैं। भोर होते हीं अपना ड्युटी
देने लगते हैं। खिड़की खोलना मना है। पूरे दिन बिजली रहती है। हीटर चलाने की छूट
है। मकानमालिक का बड़ा लड़का बिजली मैकेनिक है।
वैसे स्टुडेंट ऐसे
ही रहते हैं।
bahut achhi tarah se aapne student ke anubhavo ko likha hai..bahut achha laga ..mujhe patna k kiraye ghar me gujare din yaad aagaye !! keep it up Gaurav ..:)
ReplyDeletesach me aapne behtar likha hai student life ke bare me mai kahu to es se bhi badtar sthiti hai..............wah kya bat hai lajawab.............
ReplyDeletethank u
ReplyDelete