Sunday, 30 March 2014

फेसबुक माने इंटरनेट। इंटरनेट माने फेसबुक

मंजीत चार महीने काम करके अपने गांव लौट गया है। वह आगे पढ़ना चाहता है। मंजीत ने इसी साल मैट्रिक की परीक्षा पास की है। उसके पिता खेतों में काम करते हैं। उसके हाथ में चाइनिज स्मार्टफोन है। वह गर्व से बताता है यह मोबाइल उसने अपनी कमाई से खरीदी है।इस सात इंच के स्क्रिन पर वह हिन्दी और भोजपुरी फिल्में देख सकता है। गाने सुन सकता है। फोटो ले सकता है। और सबसे बड़ी बात वह 'फेसबुकिया' भी कर सकता है।
               उसके फेसबुक पर उसके पसंदिदा हीरो अक्षय कुमार भी हैं, और उसकी हीरोइन श्रीदेवी भी। कई सितारे तो उसके फ्रेंड भी हैं, जिससे वह चैटिंग भी कर लेता है। इस बात से बेखबर कि वे प्रोफाइल फेक हैं। उसके फ्रेंड लिस्ट में कॉलेज में पढ़ने वालों से लेकर उसके पड़ोस का गोलू भी है। लाइक, कामेंट, चैट के अलावे वह ज्यादातर फोटो शेयर करता है। जिनमें ज्यादातर उसकी खुद की तस्वीर होती हैं। इसके लिए उसे पांच रुपये रोज खर्च करना पड़ता है। लेकिन उसे फेसबुक की खूबियों के सामने यह रकम कुछ भी नहीं लगता। हलांकि उसके इस पैक का फेसबुक ब्राउज के अलावा और कोई उपयोग नहीं है।
                                                                                                     फोटो- गूगल
   फेसबुक का क्रेजी सिर्फ मंजीत ही नहीं है। यह क्रेज शहरी आधुनिक युवा वर्ग से बढ़कर कस्बों  और गांवों में रहने वाले नई पीढ़ी में फैल रहा है। फेसबुक का यह प्रभाव युवा और आधुनिक लोगों के दायरे से आगे निकल रहा है। चाहे वह क्षेत्र की सीमा हो, पीढी का फासला या फिर तकनीक की पहुंच। प्रमुख एंड्राइड डाउनलोडिंग साइट गूगल प्ले में अबतक मोबाइल पर चलने वाली फेसबुक एप्स को  14504123 इतने लोग डाउनलोड कर चुके हैं।  सितम्बर 2012 तक 1 बिलियन लोग इससे जुड़ चुके हैं। जिनमें भारत में 93 मिलियन यूजर भारत में हैं।
                             इंटरनेट सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियां भी उपभोगताओं को फेसबुक के प्रति बढ़ती दिवानगी को भूनाने के लिए फेसबुक ब्राउज के सीमित उपयोग वाले पैक ऑफर कर रही है। लेकिन इस दिवानगी के खतरे भी कम नहीं हैं। काम के घंटो में इसके उपयोग से कर्मचारियों के कार्यक्षमता के प्रभावित होने के तर्क के साथ कई नियोक्ता काम के समय फेसबुक ब्राउज को प्रतिबंधित कर चुके हैं।
                          इंटरनेट सूचना और ज्ञान का महत्वपूर्ण स्त्रोत बनक उभरा है। कई शिक्षण संस्थानों को इंटरनेट उपयोग के घंंटो को बढाने के लिए फेसबुक ब्राउज को प्रतिबंधित करना पड़ा है। पिछले साल के यूपीएससी के सफल प्रतिभागियों में ज्यादातर छात्र फेसबुक पर नहीं थे या सक्रिय नहीं थे। लेकिन सभी छात्रों ने इंटरनेट को अपनी सफलता में अपना महत्वपूर्ण सहयोगी माना।
हाल में इस नीली दुनिया के संस्थापक मार्क जुकरवर्ग ने फेसबुक के कनैक्टिविटी लैब की एक जानकारी शेयर की। जिसमें उन्होंने पूरी दुनिया में इन्टरनेट सुविधा मुहैया कराने के फेसबुक के महत्वकांक्षी योजना का जिक्र किया है। चाहे जो भी हो फेसबुक के बहाने गांव का मंजीत भी इंटरनेट की दुनिया से जुड़ रहा है।
                           

स्टूडेंट ऐसे ही रहते हैं।

मैं पैदाइशी गंवई हुं। मेरा जन्म भारतवर्ष के एक गांव में हुआ और पूरे तेरह सालों तक वहीं पला-बढ़ा।
 अफसोस बढ़ने के साथ वहां पल न सका; पढ़ना जो था। बाबूजी चाचाओं की तरह न थे। पढ़ाई-लिखाई के महत्व को समझते थे; सो हमें हाई स्कूल की शिक्षा लेने पास के शहर को भेज दिया। वहीं पहली बार मकान-मालिक नामक जीव का किरायेदार बनने का सौभाग्य प्राप्त हूआ। किराया था 600 रु माहवार। इस किराये के एवज में जो कमरा मिला था, वह छतदार था जिसपर पंखा नाचता था। शाम को स्टडी आवर में पूरे दो घंटे के लिए बिजली आती थी और मैं बल्ब पर बैले डांस करते फतिंगो को देखा करता था। रिश्तेदार जब भी शहर को आते; मिलने जरूर आते थे, लोकल ट्रेन की तरह। उन आने वालों में कुछ के लिए हॉल्ट, कुछ के लिए स्टेशन, कुछ के लिए यार्ड था मेरा कमरा। सामाजिकता तो थी ही आर्थिक दृष्टिकोण से भी संसाधन का भरपूर दोहन हुआ।
                          लोगों से सुना करता था राजधानी का माहौल बड़ा पढ़ने लिखने वालाहै। भोदुआ से भोदुआ भी निकल ही जाता है। फिर मैं तो इंटेलिजेंट था, मैं क्यों नहीं सक्सेस करता। तो निर्णय हो गया अब राजधानी में ही रहकर सक्सेस करना है। मेरे गांव के चाचा जी जो  उमर में हमसे थोड़े ही बड़े थे। वे  पटना में  कई सालों से सक्सेस करने में लगे हूए थे।
कुछ रूपये, ढेर सारी नसीहतें औऱ हजारों ख्वहिशों के साथ पिता जी ने गांव के चाचा के साथ लगा दिया। मेरा सामान साइकिल पर बांधते हूए बोले कमरा ढंग का लेना, एयरी हो, लाइटेड हो, शांत हो, आसपास लोग अच्छे रहते हों। वगैरह-वगैरह। आखिरकार सक्सेस करने हमलोग पटना पहूँच हीं गये। चाचा का वर्तमान कमरा इतना हीं बड़ा था जिसमें वे सिर्फ खुद समा सकते थे। कोई और ठौर था नहीं, सो तब तक  वहीं दिन काटने थे । असल में वह रहने का कमरा था ही नहीं अपने युवा काल में किचन या स्टोर रूम रहा होगा। इसे तो मकान-मालिक के मैनेजमेंट का अद्भुत नमूना कहना चाहिए कि उन्होंने इसे कमरा का रूप दे दिया। अब जल्द से जल्द एक कमरा ढूंढना था।
           मै अपने लिए लाइटेड, एयरी और अच्छे माहौल वाले कमरे की तलाश मे लग गया। कई दिनों तक पुरे दिन रूम की तलाश में भटकता रहता। एकाध कमरे मिले भी वह बाबूजी के मापदंड पर खरे नहीं उतरे। मकानमालिक की शर्तों के आगे मेरे आशियाने के सपने दम तोड़ देते थे। किसी मकान के आगे टू-लेट के बोर्ड  मृगमरीचिका जैसे थे। पूरे दिन पदयात्रा करने और कमखुराकी की वजह से आंखे धंस गयी। तिस पर कमरे के उस छोटे से चौकी पर हम अंटते भी न थे। शिफ्ट में सोना पड़ता था।
                      चाचा के साथ रहते हुए पूरे सप्ताह गुजर चुका था। एक सुबह मेरे चाचा का नाम पुकारते हूए मकानमालिक आया।
बोला आपको अबतक कोई जगह नहीं मिली ?”
मैनें अपना निचला ओठ ढ़लकाते हुए बोला नहीं
पीछे से श्रीमती जी उलाहने के लहजे में बोलीं  तो कब तक रहना है?”  वैसे उपर रूम खाली है। वही ले लिजिए।
सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई स्थाई वाला सरकारी नौकरी लग गई हो । मैं श्रीमान जी के पीछे लग गया । तंग सीढ़ी पर पहुंच कर बोले  “यही रूम है।
रूम क्या था प्लाइ वोर्ड से घिरा सीढ़ी घर का कमरा। तपाक से बोले यहां कोई नही आता। कोई डिस्टर्ब नहीं होगा ।
दस मिनट भी गुजरे न होगे; गर्मीं ने असर दिखाना शुरू कर दिया। सर चकराने लगा।

जी में आया बोल दुँ कबूतर पाल लीजिए रखने में काम आयेगा ।
शाम को मकान मकान मालिक फिर आये पूछा क्या डिसीजन लिये । तेवर बदलते हुए आदेश दिया अब और नहीं रख सकते।
            अब तक इसका ज्ञान हो चुका था कि स्टुडेंट को कहां रूम मिलता है। मैंने समझौता करते हुए एक तंग गली के परित्यक्त मकान में अपना ठौर ले लिया है। जो बेसक किचन नहीं है। उससे बड़ा है। यहां एलार्म लगाने की जरुरत नहीं पड़ती। बच्चे समय के पक्के हैं। भोर होते हीं अपना ड्युटी देने लगते हैं। खिड़की खोलना मना है। पूरे दिन बिजली रहती है। हीटर चलाने की छूट है। मकानमालिक का बड़ा लड़का बिजली मैकेनिक है।
वैसे स्टुडेंट ऐसे ही रहते हैं।

              

Friday, 28 March 2014

चिट्ठी





मार्च                                                                 गांव गोदाइपट्टी
                                                                                                                                                         जिला दरभंगा 
                                                                          बिहार      

मेरे प्यारे दोस्त 




यहाँ मौसम बदल रहा है। ठंड ने अपने जाने की तैयारी शुरू कर दी है। मेरी खिड़की से दिखने वाले पलास ने सारे पत्ते गिरा दिये हैं। अब सिर्फ लाल-लाल फूल बच गये हैं। नागार्जुन के 'पत्रहीन नग्न गाछ' की तरह। गेहूँ की बालियां पक गई हैं। किसान फसल काटने की तैयारी में लग गये हैं। आम पर मँजरी बौरा गया है। अबकी आम से डालियां लदने वाली है। हमारे यहां हर गांव में आम के बाग मिल जाएंगे। तरह-तरह के आम- कपूरिया, किसनभोग, कलकत्तिया, सिपिया। लेकिन मालदह आम की तो बात ही कुछ और है। यहां के आम के मिठास का राज यहां की मिट्टी है। चूना वाली मिट्टी होने के कारण यहां के आम इतने मीठे होते हैं। वैसे हमारी पहचान सिर्फ आम की मिठास से ही नहीं है। हमारी पहचान हमारी मीठी बोली से भी है। यहां मैथिली और हिन्दी बोली जाती है। भाषा के आधार पर मैथिली भाषा-भाषी क्षेत्र को 'मिथिला' के नाम से पहचान मिली है। दरभंगा उस मिथिला का प्रतिनिधि है। दरभंगा को बंगाल के द्वार के नाम से जाना जाता है। यहां की संस्कृति में बांग्ला और हिन्दी पट्टी का फ्यूजन देखने को मिल जाएगा। दरभंगा अपनी  समृद्ध और विशिष्ट  परंपराओं के लिए भी जानी जाता है।
मिथिला के बारे में एक कहावत प्रचलित है
 आम पान मछली मखान ।
 ये सब हैं मिथिला के पहचान।।
 दरभंगा मखाना उत्पादन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह हमारे पूर्वजों की प्रकृति से तालमेल बिठा कर जीने का एक बेजोड़ नमूना है। दरभंगा गंडक और बागमती दो नदियों के पाटों के बीच का भू-भाग है। बरसात के समय नेपाल से आनेवाली वाली बाढ़ के पानी को तालाब बना कर संरक्षित कर लिया जाता रहा है। इस संरक्षित पानी का उपयोग वर्ष भर होता है। तालाब में मछलियां पलती हैं तो उसके सतह पर मखाना की डालियां उतराती हैं। इसी तालाब के चारो ओर पान के पत्ते मनोरम प्राकृतिक दृश्य पैदा करते है। प्रकृति की गोद में बैठकर विद्यापति ने प्रकृति को समर्पित गीत लिखे जो साल बाद भी यहां के अमराइयों में गूंजते हैं। विद्यापति की परम्परा को यहां के विद्वानों ने आगे बढ़ाया है। गोनू झा के लघु हास्य कथा तो लोक कथाओं का हिस्सा बने हुए हैं।
               
मिथिला पेटिंग के बारे में तो आप जानते ही होंगे। हमारे यहां हर घर में मिथिला पेंटिग के नमूने देखने को मिल जाएंगे। इसके अलावे बिंदिया आर्ट के भी नमूने मिलेंगे। इसमें बिन्दी से विभिन्न एतिहासिक पात्रों का चित्रण किया जाता है।
   मिथिला में कुछ ऐसे त्योहार भी मनाये जाते हैं जो सिर्फ यहां के हैं। इनमें एक पर्व है 'सामा चकेवा'। सामा चकेवा नवयुवतियों के द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है जो जनवरी के महीने में मनाया जाता है। एक खास दिन होता है जिसमें दिन की शुरूआत सत्तू पीने से होती है। इसे सतुआनी नाम भी दिया गया है।
            दरभंगा ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र रहा है। यहां बिहार का एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय है। ललित नारायण मिथिला विवि शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। इसके विस्तृत अहाते में मनोकामना मंदिर और श्यामा मंदिर है। मनोकामना मंदिर के बारे में किंवदंती है कि यहां जो भी इच्छा मांगी जाती है वह पूरी हो जाती है। मंदिर के दीवारों पर हजारों मन्नतें लिखी मिलेंगी।
दरभंगा वर्षों से मेडिकल टुरिज्म का केन्द्र रहा है। यहाँ अब भी पड़ोसी देश नेपाल से इलाज के लिए लोग आते हैं। दरभंगा मेडिकल कॉलेज चिकित्सा का पुराना केन्द्र रहा है। शुरुआती दौर में ही आकाशवाणी और दूरदर्शन के केन्द्र यहां स्थापित किये गये थे। इस छोटे से शहर में दो संग्रहालय हैं।
 जो यहां की समृध्द इतिहास के सबूत हैं। महराजा लक्ष्मीश्वर सिंह म्युजियम में दरभंगा महराज से जुड़े बहुमूल्य कला सामग्री को सहेज कर रखा गया है। दरभंगा महराज अपनी कला प्रेम और समृध्दि के लिए जाने जाते हैं। उनके कलाकारीयुक्त भवनों के अवशेष देखे जा सकते हैं। संरक्षण के अभाव में इन महलों का क्षरण हो रहा है। दूसरे संग्रहालय चंद्रधारी म्युजियम में मिनियेचर पेंटिग, आधुनिक पेटिंग, शीशे के कटिंग, आदि हैं।
दरभंगा से 20 किलोमीटर दूर अहिल्या स्थान है। कुशेश्वर नाथ स्थान, गौतम स्थान आदि यहां के दर्शनीय स्थल है। रामायण में इन जगहो का जिक्र मिलता है। इन जगहों  के बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। यहीं उचैठ स्थान है जहां  कालिदास को देवी काली ने वरदान दिया था। कुशेश्वर ब्लाक के सिंगिया चौर के 7000 एकड़ फैले क्षेत्र में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश साइबेरिया सहित कई देशों के 9 प्रजाति के प्रवासी पक्षी हर साल आते हैं।
और भी बहुत कुछ है हमारे यहाँ कभी आइये।आप भी हमारे मेहमाननवाजी  के कायल हो जाएंगे।
               
                                                                         तुम्हारा

                                                                               गौरव

Thursday, 27 March 2014

‘एम एफ हुसेन की कहानी अपनी जुबानी’

                         
 एम एफ हुसेन की कहानी अपनी जुबानी को सुंदर लेखनी से किताब की शक्ल देने वाली राशदा सद्दिकी ने एम एफ हुसैन के इस आत्मकथा लिखने कि प्रक्रिया के बारे में लिखती हैं
हुसेन ने अपनी कहानी अपनी जुबानी लिखनी शुरु की तो वह जहाँ कहीं भी बैठे हों बस लिखते रहते। हुसेन की आत्मकथा लिखी गई थी, पेपर नैपकीन पर , चिट्ठी के पीछे की खाली सतह पर टेबल मैट पर लिफाफा खोल कर बनाये गये पर्चे पर  और जो अच्छे कागजों पर लिखे जाते वह पुलिंदा बनकर जेब से निकलती ।

इन्ही टुकड़ो को जोड़कर एक किताब का रूप राशदा ने दिया है।
वे आगे लिखती हैं लिखाई तो है ही उनकी खुबसुरत, फिर जुबान शायराना, बयान का अंदाज निराला।
राशदा के कहे मुताबिक हुसेन के जुबानी की कुछ अंश से आप कुछ अंदाजा लगा सकते हैं।

 एक उड़ने वाले घोड़े पर, पैर रकाब में डाले बना कलाकार और दुनिया के लंबाई चौड़ाई में चक्कड़ मार रहा है।

मकबूल के स्लेट पर हूबहू वही चिड़ीया ब्लैकबोर्ड से उड़कर आ बैठी।  दस में दस नंबर

लोहियाजी ने लड़के की पीठ थपकी और विषय बदलते हुए पुछा  यह जो  तुम बिरला जी और टाटा के ड्राइंगरुम में लटकने वाली तस्वीरो में घिरे हो, जरा बाहर निकलो। रामायण को पेंट करो इस देश की सदियों पुरानी दिलचस्प कहानी है।

लोहिया कि यह बात लड़के को तीर की तरह चुभी और चुभन वर्षों रही । आखिर लोहियाजी के मौत के फौरन बाद उनकी याद में रंग भरे और कलम लेकर बदरीविशाल के मोती महल को तकरीबन डेढ़ सौ पेंटिग से भर दिया। दस साल लगे कोई दाम नही मांगा सिर्फ लोहियाजी की जबान से निकले शब्दो का मान रखा।

निर्मल वर्मा लिखते हैं ‘’हुसैन की आत्मकथा की यह अनोखी और अद्भुत विशेषता है, कि वह अनुवाद की वह बैसाखी से नहीं, सीधे चित्रकला की शर्तों पर, बिंबो के माध्यम से अपनी भाषा को रुपांतरित करती है। ’’

रंग और शब्द जहां एक हो जाते हैं। चित्र जहां शब्द बन जाते हैं। हर पंक्ति एक बिंब का प्रस्तुतिकरण करती है। वाणी प्रकाशन की यह किताब आइआइएमसी की पुस्तकलय में मिल जाएगी। कई भ्रांतियां जो हमारे इस देशी परदेशी मकबूल के लिए पैदा कर दी गई हैं, शायद इस किताब को पढ़ कर हम एम एफ हुसैन के मकबूल को जान पाएँ।

बुरा न मानो

                             
     
एचओडी यानी विभागाध्यक्ष इतने जटिल प्राणी होते हैं, कि इनके महानता को बताना मेरे जैसे फिसड्डी पत्रकार के बस की बात नहीं है।  सबको अदना समझने वाला।   खुद लेट-लतिफी के शौकिन।     बावजुद दुसरों से सेकेंड के सुई के हिसाब से चलने की अपेक्षा।  अडियल, बदमाश और कुछ-कुछ बदनाम सा आदमी। चले तो नजर सीधी मानो गले को प्लास्टर आफ पेरिस से मढ़ दिया गया हो। अरदली रखने का शौकिन। हाथ काल बेल और नजर दरवाजे पर। मजाल की चपरासी से देरी हो जाए।  जनाब आफिस में बैठ कर क्यों ना नैन मटक्का कर रहें हों, दिखाना ऐसे कि शिक्षा में आमूलचूल बदलाव की सारी जिम्मेवारी भारत सरकार ने इन्हे ही दे रखी हो। उनके योग्यता को देख कर। इस महान काम में कोई किस्मत का मारा छात्र बाधक बन जाए तो इनके कोप से रक्षा स्वंय सरस्वती भी नहीं कर सकती हैं।वैसे सरस्वती की कृपा से इन्हे ज्ञान की कमी नहीं होती।  ज्ञान तो बांटना भी चाहते हैं। लेकिन बांट नहीं पाते। बड़ी-बड़ी जिम्मेवारियां पीछा ही नही छोड़ती। फिर भी ज्ञान देने की जो आदत पड़ चुकी है सो छुटती नहीं। वक्त निकाल ही लेते हैं। आते हैं तो मानों एहसान कर रहें हो। कक्षा में उनके आगमन पर सीट छोड़ना शिष्टाचार की अनिवार्य शर्त है। गुड मार्निंग का समवेग स्वर इनका प्रिय मंत्र है जिससे ये प्रसन्न होते हैं। महादेव के बम बम बुरुक की तरह। साइलेंस इन्हे बहुत पसंद होता है। वक्त का पुरा उपयोग करने में विश्वास रखते हैं। क्लास मे रहते हुए भी पूरी दुनिया से संपर्क बनाए रहते हैं। ये थोड़े नॉस्टेलजिक टाइप भी होते हैं। इनकी पुरानी स्मृति इनका पीछा नहीं छोड़ती। पाठ्यक्रम में उपलब्धियों का बखान ऐसा चैप्टर होता है, जिसका पुनरावृति पूरे कोर्स में किया जाता है। छात्रों में सफलता के लिए प्रेरणा उत्पन्न करने हेतु सफल व्यक्ति से मिलवाते रहते हैं। इनमें ज्यादातर उनके पुराने छात्र ही होते हैं जो अपने भाषण के अंत में सफलता का पुरा क्रेडिट अपने महान गुरु को देते हैं। इस समय छात्रों से अपेक्षा की जाती है कि देर तक छात्र ताली पीटे। जितनी देर तक ताली बजती रहती है। इन्हे उसके समानुपात में खुशी प्राप्त होती है। ये अपनी प्रशंसा सुनने के आदत से त्रस्त होते हैं। सो राजा महराजा की तरह ये भाट अपने कुछ छात्रों को ही बना लेते हैं। आधुनिक समाज में इन्हे ही चमचा कहा जाता है जिसकी चर्चा आगे करेंगे।