तकनीक ने ज्ञान और सूचना पर मनुष्य के एकाधिकार को खत्म किया है। अब
यह मानव के बौद्धिकता की जगह ले रही है। कम्प्युटर, मोबाइल, टैबलेट जैसे
उपकरणों में सारा ज्ञान, सूचना और बौद्धिकता समा रहा है। अब मोबाइल का कैमरा फोटो लेने के अलावा पढ़ सकता है। वह चित्र भी पहचान सकता है। आपका मोबाइल फोन सुन सकता
है। सुन कर दोहरा सकता है। उसे आपके मनपसंद भाषा के शब्दों में बदल सकता है। कहने
का मतलब है, तकनीक ने कृत्रिम आंख, कान बना लिया है, जिसके पास अब बुद्धि भी है।
लेकिन इसे मानव का प्रतियोगी नहीं समझा जाना चाहिए। बल्कि इसे मानव
सभ्यता के विकास के उत्प्रेरक (catalyst) के रूप में देखा जाना चाहिए। यह एक बड़ी चुनौती है। क्या इस तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ वैज्ञानिक और कुछ ‘खास’ लोग ही कर पायेंगे। या इसे सर्वसुलभ
बनाया जा सकता है।
पहली शर्त कम्युटर और अन्य तकनीकी साधनों तक छात्रों की पहुंच
सुनिश्चित करने की होगी। दूसरी उनको चलाने की बेसिक जानकारी छात्रों को होनी
चाहिए। डिजिटल साक्षरता इसका समाधान हो सकता है। उदाहरण के तौर पर न्यू मीडिया,
वेब 2.0, विभिन्न सर्च इंजन, सोशल साइट्स, गूगल के विभन्न टुल्स जैसे गूगल
ट्रांसलेटर, गूगल मैप की जानकारी होनी चाहिए। वहीं छात्रों को अभिव्यक्ति के
विभिन्न माध्यमों जैसे शब्द, पेंटिग, ऑडियो-विजुअल सभी माध्यम को कम्प्युटर से कर
पाने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।
ज्ञान का ग्लोबल आदान-प्रदान और बहस के फलक को बड़ा बनाना चाहिए। इसके
लिए स्कूली शिक्षा में स्थानीय समझ के साथ-साथ बाहरी दुनिया से भी जोड़ने की जरूरत
है। अंग्रेजी ग्लोबल भाषा है। अंग्रेजी भाषा के गुणवत्तापूर्ण शिक्षण से छात्रों
को अधिकतम ज्ञान और बाकी दुनिया से जोड़ा जा सकता है।
अधिकतम पहुंच सुनिश्चित करने के बाद अगला चरण उनके सही इस्तेमाल का
आता है। बेशक इसके लिए इंटरनेट के सही इस्तेमाल और उन्हे सभी खतरों से बचने की
ट्रेनिंग होनी चाहिए। आज इंटरनेट पर सारी जानकारी तेजी के साथ इकट्ठी हो रही है।
अनुवाद, टेक्सट-टू-स्पीच जैसी तकनीक में जिस तेजी से विकास हो रहा है आने वाले
दिनों में उम्मीद की जा सकती है कि विभिन्न भाषाभाषी के बीच की समस्य़ा ही खत्म हो
जाये।
आने वाले समय में शिक्षा को मानव को अधिक संवेदनशील, मानवीय, जागरूक,
सृजनशील, वैज्ञानिक सोच, सामुदायिक, समस्या दूर करने वाला, विश्लेषणात्मक, कौशल
युक्त, बनाने वाला होना चाहिए।
आने वाले समय में कई गंभीर चुनौतियां आने वाली है। यह वातावरण,
सामाजिक, आर्थिक, मनोगत और व्यक्तिगत हर क्षेत्र में हो सकते हैं। पढ़ाये जाने वाले
विषय को आस-पास से जोड़ने के अलावा आने वाली समस्या के लिए भी तैयार करने की जरूरत
है। आने वाली पीढ़ी को समस्या के समाधान के लिए समक्ष बनाने के लिए रीजनिंग को
पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
तकनीक के विकास के साथ हम एक साथ कई बड़े स्तर पर काम को निपटा रहे
होंगे। ऐसे हालात में सटीक निर्णय लेने की जरूरत होगी। छोटी-सी भूल किसी बड़ी गलती
की ओर ले जा सकती है। ऐसे हालात में छात्रों को युक्तिपरक(rational) सोच विकसित करने की
जरूरत होगी। कौन-सी सूचना जरूरी है और कौन-सी फजूल है उसे परखने की क्षमता छात्रों
में होनी चाहिए।
आने वाले समय में तकनीक कई काम अपने जिम्मे ले लेगा। ऐसे हालात में दक्ष
लोगों की संख्या बढ़ेगी। लेकिन समस्या को सुलझाने के लिए अलग-अलग क्षेत्र के लोगों
की जरूरत होगी जिनके बीच आपसी तालमेल बनाये रखने की जरूरत होगी। ऐसे हालत में
छात्रों को साथ मिलकर काम करने के अभ्यास को बढावा देना चाहिए। अपनी रुची और
क्षमता के साथ-साथ कमियों को वो जान पाये उन्हे इसका ज्ञान होनी चाहिए ताकि वो
बेहतर लोगों से तालमेल बैठा पायें। आने वाले समय में संभावना है कि कम्प्युटर के
कामों की निगरानी ही इंसान की जिम्मेवारी हो।
जिस तेजी से सभी सूचनाएं इकट्ठी हो रही है। आज का इतिहास सबसे बड़ा
लिखित इतिहास होगा। आने वाले समय में इस डाटा के आधार पर निर्णय होने की उम्मीद
है। उसे विश्लेषण करने वाले एक्सपर्ट की जरूरत होगी।
इस बात का भी डर है कि आने वाले समय में मानव का मशीनीकरण न हो जाए।
इंसान की इंसानियत बचाये रखने के लिए उन्हे नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जानी
चाहिए। हां, इस बात का पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए कि यह नैतिक मूल्य की शिक्षा
आपसी सद्भाव और भाईचारा पर आधारित हो और इससे उनके
विश्लेषणात्मक क्षमता पर कोई प्रभाव न पड़े।
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