Tuesday, 28 July 2015

सूरज तुम कहां हो?

प्रिय सूरज
सोचा था, तुम्हे अपने कहानी का हीरो बनाउंगा। लेकिन मेरा हीरो गुम हो जाएगा और उसे बुलाने के लिए चिट्ठी लिखनी पड़ेगी, किसे मालूम था। जब मैं अनाथआश्रम रहने आया। तुमसे बात करके लगा, तुम यहां खुश हो। तुम ही तो कहते थे “यह आश्रम सबसे बेहतर है।“ फिर क्या हो गया कि तुम यहां से भी चले गए। 
तुम्हे रोज क्लास को संभालते देखता था। परसो स्कूल गया तुम नहीं दिखे। चिंता हुई। तुम्हारे सहपाठी ने बताया तुम भी आश्रम से भाग गए। सुन कर अच्छा नहीं लगा। उससे भी बढ़कर तुम्हारा फोन न करना अखरा। मोबाइल नंबर क्यों लिया था? कोई दिक्कत थी, तो बताना चाहिए था। मैं कुछ कोशिश करता।
अब जब तुम स्कूल में नहीं मिलते हमारी आंखे ढूंढ़ा करती है तुमको। तुम्हारी जरूरत महसूस होती है; जब बच्चे शोर मचाते हैं। तुम्हारे बिना अब आश्रम जाते हुए पहले जैसा अपनापन नहीं लगता।
जब मैं अनाथआश्रम आया यहाँ का माहौल बिल्कुल अपरिचित था। तुमने उसमें अपनापन घोला। जब पूरे दिन की भागदौड़ के बाद शाम को आश्रम लौटता था। तुम दान में मिले चॉकलेट और पाव संभाल कर रखते थे। याद है, आइसक्रिम का क्या हाल हुआ था। आज जब कपड़े कई दिनों तक तार पर टंगे रहते हैं, हवा से गिर कर धूल-मिट्टी से सन जाते हैं। उस वक्त तुम्हारी याद आ जाती है। शाम को जब आश्रम लौटता था। कपड़े तह कर अपने जगह मिलते थे। इसके लिए कभी थैंक्स नहीं कह पाया।
तुम कहां होगे? किसी  ढाबे पर सूरज से रामू बन गए होगे। या 
किसी प्लेटफार्म पर मजदूरी कर रहे होगे या कुछ औऱ। किसी ने तुम्हे बंधुआ मजदूर तो नहीं बना लिया?  तुम भी बचपन को खोते हजारों बच्चों में  शामिल हो गए! सोचता हूं तो दुख होता है।
तुम्हें तो मालूम है, मुझे नाम याद नहीं रहता। लेकिन तुम्हारा नाम जेहन में उतर गया है। तुम जल्द लौट आओ। तुमसे एक कंफेसन भी करना है। मैंने झूठ बोला था कि मैं भी तुम्हारे जैसा हूं। असल में मैं तुम्हारे लिए इंसपरेसन बनना चाहता था। मैं समझ सकता हूं, बिना परवरिस के आगे बढ़ना कितना मुश्किल होता है। तुम जब मिलोगे पूछना है, जिसने समाज से हर पल तिरस्कार सहे, जो प्यार के लिए तरसा उसके अंदर इतना प्रेम कहां से आया। तुमसे बचपन में बड़े होना सीखना है।
बेवकूफ, तुम्हे तो ठीक से पढ़ना भी नहीं आता। किसी पढ़े-लिखे के हाथ जब यह चिट्ठी लगेगी। शायद वह समझा पाये कोई तितली वाले उस डिब्बे को कोई खोल कर एक पेन, एक ताबीज और पेंटिंग देखा करता है।
तुम्हारे इंतजार में
गौरव सर

Thursday, 12 February 2015

धर्मगुरु के धर्म

घर से ऑफिस जाते हुए दो दृश्य इस रायते का जिम्मेदार है। छह महिने सूरत में रहते हुए यह रास्ता सबसे ज्यादा परिचित हो चला है। पहला दृश्य ऑटो के पीछे लगी बैनर का था। बैनर पर आसाराम युवाओं से 14 फरवरी को मातृ-पितृ दिवस मनाने की अपील कर रहे थे। दूसरा दृश्य मजदूरों के एक झुंड का था जो अपने पुराने कमीज पर एमएसजी छपे नए टी-शर्ट पहन रखा था|
राम रहीम नें सारी हदें तोड़ दी 

वैलेंटाइन डे पर हर साल हल्ला मचता है। सो इस हल्ले में शामिल हो आसाराम कम से कम उन तथाकथित हिन्दुओ के संगठनों में फिर से जगह बना लेना चाहते हैं, जो नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोप की वजह से खत्म हो चली है। वहीं राम रहीम अपनी फिल्म के जरिये नये भक्तों की तलाश कर रहे हैं।

संविधान के मुताबिक हमें अभिव्यक्ति की आजादी है। आजादी कहां तक और कितनी है। यह तो सरकार अपने सहूलियत से तय करती रही है। फिलहाल केन्द्र की सरकार का भरोसा बना हुआ है कि बाबाओं के भक्तों के वोट से चुनाव में बढ़त बनायी जा सकती है। चाहे एमएसजी के रिलीज को हरी झंडी देकर दिल्ली में रामरहीम के समर्थन पाने का फंडा भले ही फेल हो गया हो। लेकिन तरकश में कई तीर हैं तो कई जंग और भी लड़ने हैं।
सरकार इन बाबाओं की काली करतूतों और ढ़कोसलों पर रोक लगाने का रिस्क नहीं लेती। जबतक घाव कैंसर जैसा नहीं बन जाती।

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वैसे भी देश के सीने पर ऐसे अनगिनत घाव हैं। सरकार कभी घर्मनिरपेक्षता के नाम पर कभी धर्म के नाम पर इन घावों पर हाथ नहीं लगाती और कैंसर बनने तक इंतजार करती है।
देश में दर्जनों धर्म उनके सैकड़ों पंथ और उनके करोड़ों मैसेंजर। सबकी अपनी-अपनी दूका
नें हैं। सबके ग्राहक हैं। सबके बीच ग्राहक बढ़ाने की जोर आजमाइश भी। जब भी कोई नई दुकान खुलती है। वहां नियम कायदों में ढील दी जाती है।

अपने मार्केटिंग के लिए पब्लिक रिलेशन और टारगेड आडियंस के सिद्धांत का यहां भी पालन बखूवी होता है।
उपवास-ब्रह्मचर्य-पश्याताप-दान और गुरू का शरण ये उपाय सभी बाबाओं के दुकानों में कॉमन होती हैं।
 यहां से निकलने वाले प्रचारात्म साहित्यों में ब्रह्मचर्य को आदर्श जीवन पद्धति बताया जाता है। इन दूकानों से छपने वाली साहित्यों व प्रवचनों में ब्रह्मचर्य पर बड़ा सा व्याख्यान होता है। जो मनोविज्ञान के जनक फ्रायड को सीधी चुनौती देते हैं। हालांकि ब्रह्मचर्य भंग होने पर पश्चाताप, यानी की खुद को कोसने की सलाह दी जाती है। इसके अंतर्गत उपवास यानी भूखे रहकर खुद को कष्ट देने की बात कही गयी है। हलांकि आप दान देकर रियायत पा सकते हैं। ब्रह्मचर्य के फंडे से युवाओं को मुख्य रूप से टारगेट किया जाता है, उन्हे कुंठित कर बाबाओं का दास बना लेने का प्रयत्न होता है। यह और बात है कभी चार कभी छह बच्चे पैदा करने  के फरमान भी औरतों को मिलते रहते हैं। क्योंकि शायद बाबा लोग मानते हैं बच्चे भगवान की देन हैं।

मां-बाप को प्रवचनों में बताया जाता है कि भक्ति के अंकुर बचपन में ही फूटते हैं। इसलिए संत्संग की आदत बचपन से लगानी चाहिए। इस तरह बच्चों के खाली दिमाग को वाहियात कुड़ों से भरने की कोशिश होती है।
औरते बाबाओं की सबसे बड़ी ऑडियंस होती हैं। इसके लिए बाबाओ को खास मेहनत भी नहीं करनी पड़ती। रामायण, पुराण और स्मृति उनकी मददगार होती हैं। धर्म की किताबों के मुताबिक औरत होना ही पूर्व जन्म के कुकर्मों का फल है। इससे मुक्ति का मार्ग बाबाओ की शरण में ही हो सकता है। व्रत उपवास पश्चायाताप ये सब इसके साथ सप्लीमेंट्स हैं।

प्रवचनों में बुजुर्गों को मरने पर नर्क का भय दिखाया जाता है। नरक का भयंकर वर्णन किया जाता है। मुक्ति के लिए गुरू की शरण ही एक मात्र विकल्प बताया जाता है। दान-पश्याताप तो है हीं।
इसके अलावे नये ट्रेंड में नये हरकते भी शामिल हो रहे हैं। जैसे पैसै के लिए काला पर्स रखना। दर्जनों टोटके जो दूसरे बाबाओं के पारंपरिक उपचार से अलग हैं। ये शार्टकट उपाय बताते हैं। ये आज के भागदौर के जमाने को ध्यान में रखकर बनायी गयी है।

इसके अलावा देश में एक और परिवार है जो धर्म को साइंस से जोड़ता है। इसके लिए उल-जलूल आंकड़े भी प्रस्तुत करता है। भूतों के किस्सों का इतिहास बताता है। भोज और कर्मकांडो को गलत बताकर आडंबरों का विरोध करने वाले लोगों को शामिल करता है। हलांकि यहां भी ब्रह्मचर्य पर खासा जोड़ दिया जाता है।
इनके शरण में जाने के बावजूद भी अगर आपकी परेशानियां नहीं खत्म होती है तो इसके दोषी भी आप ही होते हैं। इसके दो कारण बताए जाते हैं। सद्गुरू के चरणों में विश्वास की कमी और सच्चे मन से प्रर्थना का अभाव। कोई बताएगा विश्वास कैसे आता है। सच्चे मन से प्रर्थना कैसे होती है।

Friday, 9 January 2015

नाना जी आप याद आते हैं।

आम और लीची में
आते हैं जब मंजर
नानाजी आप बहुत याद आते हैं।
डब्बे वाले घी में नहीं रहती वो मिठास
आप बहुत याद आते हैं।
नानी के झुर्रिदार चेहरे को देखकर
आप बहुत याद आते हैं।
जब लिखने पर मिलती है शाबाशी
आप बहुत याद आते हैं।
जब जाता हूं स्कूलों में
बच्चों को सुनाता हूं कहानी
आप बहुत याद आते हैं।
जब होता हूं कमजोर
आप बहुत याद आते हैं।
जब मां बाबूजी की करनी होती है शिकायत
आप बहुत याद आते हैं।
जब विदा होने की तैयारी कर रहे थे आप
सुना रहा था मैं अखबार
खबर सुनाते हुए बहुत याद आते हैं आप
आप सपनों में आते हैं,
जैसे किसी के बिमार पड़ जाने पर
आप संभाल लेते थे मोर्चा
आप रहेंगे हमारे साथ
जोड़ में, घटाव में
मेरे लिखे शब्दों में
आप हर साल आयेंगे
आम के मंजर में

लीची की खुशबु में।

मैं एक गांधी फैलो हूं।

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी फैलोशिप ज्वाइंन करने का निर्णय यू-टर्न था। लेकिन मैं इस निर्णय से संतुष्ठ था। मैनें फैलोशिप को अपने अधूरे कामों को पूरा करने के मौके की तरह देखा। हलांकि मैं पत्रकार बनकर हशिये पर पड़े लोगों की आवाज बनना चाहता था। फैलोशिप ज्वाइंन करने के निर्णय से मेरे परिजन हैरान थे। मैं भी थोड़ा कन्यफ्युज्ड था। मेरे गुरू प्रोफेसर आनंद प्रधान ने कहा था, पत्रकारिता शुरू करने की कोई उम्र नहीं होती, फैलोशिप दोबारा नहीं मिलेगी।कालेज में दाखिला लेने के बाद से ही मैं छात्र राजनीति में सक्रिय हो गया था। फैलोशिप ज्वाइंन करने के बाद जगह और काम के तरीके बदल गये। लेकिन मैनें अपने अधूरे कामों को पूरा करना शुरु कर दिया है।
मेरे अनुभव
लेकिन फैलोशिप मेरे अधूरे पड़े कामों को पूरे करने का अवसर ही नहीं दिया। यहां मुझे स्कूलों में काम करने का मौका मिला। इसने मेरे बचपन को फिर एक बार लौटा दिया है। अब कालेज छूट गये हैं, हालांकि यहां अपने हमउम्र साथियों के साथ काम करते इसकी कमी नहीं खलती। यहां सहकर्मी और दोस्त का फर्क मिट गया है। कई दोस्त मिले हैं, जिनसे हर रोज कुछ न कुछ सीखता हूं। यहां जहूर नफीस उर्दू लहजे में कश्मीर के बारे में बताता है। राम के साथ स्कूटी पर स्कूल जाते हूए रोज बेधरक अंग्रेजी बोलता हूं, जिसे कभी अपने टीचर के सामने नहीं बोल पाया। हवा हमारे बातों को सुनती है। अंग्रेजी नॉवेल के हिन्दी अनुवाद को पढ़कर जो अंग्रेजी नहीं सीखी। राम के साथ रहकर लगता है अंग्रेजी सीख लूंगा। हर किसी के बारे में लिखने का मन हो रहा है... शब्द सीमा का ध्यान भी रखना है।

गुजरात के विकास के बारे में बहुत सुना था। सूरत में काम करते हुए उसे देख रहा हूं। स्कूलों में उसे हर रोज महसूस करता हूं। यह शहर कई संस्कृतियों का शहर है। इसे जीना पूरे भारत को जीने जैसा लगता है। अमितजी कुछ दिन गुजरात में बिताने के लिए टीवी पर बुलाते रहते हैं। सो उनका बात भी पूरा हो गया। एक महीने के कम्युनिटी इमरजन में कई स्लम को देखने का मौका मिला। विकसित गुजरात में स्लम! खैर छोड़िये...यह जगह यह सब लिखने कहने का नहीं है।
आप भी जुड़िये
विकास पत्रकारिता के किताबी ज्ञान को यहां प्रैक्टिकली आजमाने का मौका मिल रहा है। अखबार में काम करते हुए शायद ही यह मौका मिल पाता। सबसे बड़ी बात यहां मुझे सुना जाता है। उससे भी बड़ी बात उस पर अमल किया जाता है। फैलोशिप ज्वाइंन करने से पहले मैं कन्फुजन में था। यहां आने के बाद मैनें अपनी रुची, क्षमता और पेशे को जोड़ कर सपने देखने शुरू कर दिया हूं। यहां बहुत कुछ है। फैलोशिप से जुड़िये, आपको जिसकी तलाश है, वह आप ढूंढ ही लेंगे।


Thursday, 8 January 2015

प्राचार्य के साथ एक नई शुरूआत

विभिन्न स्कूलों से आये आचार्य महोदय और हमारे साथियों ।।।
आप सबका हार्दिक अभिनंदन करता हूं। 
आपके आने से कैवल्या एजु. फाउंडेशन के गौरवशाली इतिहास में आज एक और पन्ना जुड़ गया है।
यह दूसरा मौका है, जब हम इस तरह इकट्ठे मिल रहे हैं। पांच महीने से काम करते हुए आप हमारे बारे में बहुत कुछ जान चुके हैं। आज हमारी जानपहचान पुरानी पड़ गयी है, लेकिन कई सवाल नये हैं। आज उन्ही सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करेंगे।

गांधी फैलोशिप की 2008 में राजस्थान के झुंझनु से छोटी-सी शुरूआत हुई थी। आज यह गुजरात सहित महाराष्ट्र और राजस्थान के 1235 से अधिक सरकारी स्कूलों में काम कर रही है। गुजरात देश के सबसे विकसित राज्यों में एक है। लेकिन बिडंबना यह है कि सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक स्तर बेहतर नहीं है। हालिया मानव संसाधन विकास रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा में गुजरात की स्थिति 16वीं है;  यह चिंताजनक है। हम NPSS से MOU के तहत सूरत में 47 गांधी फैलो लीडरशिप के विकास के द्वारा 218 सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक सुधार का काम कर रहे हैं।

देश के सबसे गरीब आबादी का 80 फीसदी बच्चों के भविष्य का निर्माण इन्हीं सरकारी स्कूलों में होता है। अब भी 13 करोड़ बच्चे स्कूल जाने से महरूम हैं। इनके लिए भी यही सरकारी स्कूल विकल्प बन सकते हैं। सरकारी स्कूलों में कई चुनौतियां हैं। कहीं शिक्षक नहीं है, कहीं कमरों का आभाव है, कहीं लाइब्रेरी में किताबें नहीं हैं, किताबें हैं तो रखने की जगह नहीं है। कहीं कम्प्युटर है तो इंटरनेट नहीं है, कहीं इंटरनेट है तो शिक्षक की ट्रेनिंग नहीं हो पाई है।
हरी अनंत हरी कथा अनंता।

हर स्कूल की अपनी समस्या है। हर आचार्य अलग चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चुनौतियां हैं, लेकिन हमें उन चुनौतियां को पार पाना है। बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए, उन्नत जीवन स्तर के लिए, एक बेहतर शिक्षा ही उन्हे एक बेहतर जीवन स्तर दे सकता है। स्कूल चलाना एक बिजनेस चलाना जैसा है। स्कूल में बेहतर माहौल बनाने के लिए कई मोर्चों पर मैनेजमेंट की जरूरत होती है। और अच्छे मैनेजमेंट के लिए लीडरशिप की जरूरत होती है। इसलिए कैवल्या एजुकेशन फाउंडेशन स्कूलो में लीडरशिप प्रोग्राम चलाती है। शिक्षकों के साथ मैनेजमेंट, एसएमसी के साथ मैनेजमेंट, टीचर के साथ मैनेजमेंट, कम्युनिटी और पैरेन्टस के साथ मैनेजमेंट। हर जगह आचार्य को अपने नेतृत्व कौशल को दिखाना होता है।

इस भारत भूमि ने कई नेता दिये हैं, जिन्होंने देश को बदला है, जिन्होंने लोगों को दिशा दी है। जिन्होंने विश्व में भारत की साख ऊंची की है। इन महापुरूषों ने चुनौतियों का सामना किया। आज हर जगह चुनौतियां है। हर जगह एक लीडर की जरूरत है। आज स्कूलों में भी एक लीडर की जरूरत है। और स्कूल के लीडर आप हैं। आप ही स्कूल को बदल सकते हैं। आप सैकड़ों बच्चों के भविष्य को दिशा दे सकते हैं। आप स्कूल की साख ऊंची कर सकते हैं। आप देश के लाखों एचएम के रोल मॉडल हो सकते हैं, जो आपकी तरह ही समस्या को सुलझाने में लगे हैं।
हम काम करते हुए आपकी समस्या समझने लगे हैं। हम उन चुनौतियों को सुलझाने में साझीदार बनना चाहते हैं। हम  इसी उदेश्य से आपके स्कूल आते हैं। हम समस्या को समझने की कोशिश करते हैं। अपने स्तर पर उन्हे सुलझाने की कोशिश करते हैं। फैलोशिप विभिन्न प्रोफेशनल वाले युवा उद्यमियों का समूह है। जो समस्या का समाधान मिलकर ढूंढती है। इसे पूरी करने के लिए कैवल्या की पूरी टीम विभिन्न स्तरों पर लगातार काम में लगी रहती है। हम उन बिन्दुओं पर भी ध्यान केन्द्रित करते हैं जो स्कूल से बाहर बच्चों के सीखने की क्षमता को प्रभावित करती है। हमने बच्चों की समस्या को समझने के लिए उनके मोहल्ले में रहते हैं और उनकी समस्या को दूर करने की कोशिश करते हैं।

वर्षों स्कूलों में काम करते हुए अनुभव के आधार पर हमने कुछ कॉमन समस्या के परखे उपाय को विकसित किया है। ये वो उपाय हैं जिनसे बच्चों के सीखने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

हाल के प्रयोग से साबित हो गया है कि बच्चे भयमुक्त वातावरण में जल्दी सीखते हैं। इस माहौल में बच्चे खुद को बेहतर तरीके से संप्रेषित कर सकते हैं। बालगीत इस प्रक्रिया को आसान बनाते हैं।

लेकिन बालगीत का उदेश्य सिर्फ इतना ही भर ही नहीं है। बालगीत के माध्यम से बच्चे मजे-मजे में सीखते हैं। गणित और भाषा सीखाने में बालगीत आसान होते हैं। जरूरत है उनको पाठ्यक्रम से जोड़ कर एक पैकेज के रूप में बताना।

बच्चों को खेल प्रिय होता है। खेल को ज्ञान से जोड़ कर सीखाना। हम लगातार प्रयास करते हैं कि ऐसे खेल विकसित करें जिससे बच्चों के ज्ञान में वृध्दि हो सके।

आज टीवी के जमाने में बच्चे भले ही कहानियों से दूर हो रहे हैं। लेकिन कहानी की मिठास अब भी बाकी है। हम लाइब्रेरी तक बच्चों की पहुंच बढ़ाने की कोशिश करते हैं। ताकि उनके पढ़ने की क्षमता का विकास हो सके।

हमारी कोशिश होती है कि बच्चे जितनी देर रहें, उनके सीखने की प्रक्रिया जारी रहे। जैसे कि एसेम्बली। यहां से स्कूल की गतिविधी शुरू होती है, लेकिन यहां वर्षों से एक ही पैटर्न को फॉलो किया जाता रहा है। हम कोशिश करते हैं कि एसेम्बली रोचक हो और बच्चे इस दौरान भी सीखें।

हमारी पूरी टीम नए तरीकों की खोज करने में लगी रहती है। लेकिन इसमें हमारे साथ एक बड़ा उत्साही समूह भी हमारी मदद करती है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले विभिन्न स्वंयसेवी संगठन हमारी मदद करते हैं।

कैवल्य के साथ काम करते हुए कई आचार्यों ने स्कूल की तस्वीर बदल रख दी है। आचार्यों ने अपने दूर दृष्टी और नये तरीकों से नजीर पेश की है।
आपके पास वर्षों का अनुभव है, आपके पास ज्ञान है, हमारे पास जोश है। आइये अब वक्त आ गया है। एक सशक्त देश के निर्माण में अपने लीडरशीप के जरीये स्कूलों की नई तकदीर लिखें।

आचार्य के साथ हमारी फिनिक्स टीम
एक सवाल के साथ मैं अपनी बात खत्म करना चाहता हूं। क्या आप भगत सिंह, गांधी, सुभाष और नेहरू की कड़ी बनना चाहेंगे? अब, परिचय सत्र की शरूआत करते हैं। आप सभी के भीतर एक लीडर है। आप जिन लीडर से प्रभावित हैं उनके नाम के साथ अपना परिचय दें।