Tuesday, 29 March 2016

सफरनामा

शाम को मैंने पापा के साथ सब्जियों के कुछ पौध लगाये थे। रात को तेज बारिश हुई। सुबह जब मैं अपने खेत पर पहुंचा। वहां कुछ भी नहीं था। मुझे अपने पौध के बह जाने का बहुत दुख हुआ था। तब उम्र कितनी थी, यह याद नहीं।

हर साल जब बाढ़ आती थी हमारे खेत में लगे फसल पानी में डूब जाते थे। उस रात भी पूरे खेत में अचानक पानी भर गया। हमें पता ही नहीं था; नेपाल का बांध तो तीन दिन पहले टूट चुका था।
स्कूल के दिनों की एक और बात याद आ रही है। वसंत का महीना था। पूरा गांव पीले-पीले सरसों के फूलों से भर गया था। होली का उत्साह दुगुना हो चला था, क्योंकि इस बार बहुत अच्छी फसल होने वाली थी। लेकिन उस बरस सरसों का बाजार मूल्य कम हो गया। लागत मूल्य निकालना मुश्किल हो गया। हमें बाजार का कुछ पता ही नहीं था।
आज जब अपने गांव से बाहर हूं। मुझे ऐसे सैकड़ों गांव नजर आते हैं। जहां शाम को लगी सब्जियों के पौध सवेरे तक मर जाते हैं। और उन्ही के साथ मर जाते हैं उन पौध को लगाने वाले। साल दर साल आत्महत्या करने वाले किसानों की बढ़ती संख्या मुझे विश्वास नहीं करने देता कि सच में कोई अच्छे दिन आये हैं।

घर में रेडियो था। वह हमें दूसरी दुनिया की बातें बताती थी। हां, उसकी जुबान मेरी जैसी थी। जब मेरी बात रेडियो पर आती थी। मैं खुश हो जाता था। एक रोज मेरी किताब की कविता रेडियो पर आयी और मैं उछलने लगा। फिर अखबार से दोस्ती हुई। लेकिन पाठक की चिट्ठी में जगह बहुत देर से मिल पायी। मेरे पास नंदन होता था। लेकिन वो महीने में एक बार ही छपकर आती थी। मुश्किल से वह दो दिन चल पाता था। आस-पड़ोस में कुछ धार्मिक किताबें थी। बाकी दिन उनकी कहानियों को पढ़ा करता था। जो मेरे उम्र के हिसाब से बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती थीं। ब्रह्मचर्य एक ऐसा शब्द था जिसका जिक्र बार-बार होता था। बहुत बाद में इसका मतलब पता चला।
अखबार से मेरी शिकायत थी। उसमें मेरे गांव को शहर से जोड़ने वाले पुल के शिलान्यास की खबर तो आयी। लेकिन 15 साल तक उसके नहीं बन पाने की चर्चा बस गांव के चौपालों तक ही होती रही। तब तक मैं गांव से शहर, कॉलेज में पहुंच चुका था। जब शहर के कॉलेज में पहुंचा, मेरे स्कूल के दोस्त कहीं पीछे छूट गये। शायद वो पढ़ सकते थे। लेकिन उन्हें वो किताबें पसंद नहीं आयीं क्योंकि वो दूसरी दुनिया की बातें करती थीं। जिन्हें समझ में आयी उन्हें सही रास्ता नहीं मिला। कुछ आगे की पढ़ाई पूरी कर पाते अगर उन्हे सरकारी प्रयासों की जानकारी मिल पाती।

 आगे की पढाई के लिए घरवालों की सलाह में एक आदेश था। इंटरमीडियट में विज्ञान विषय चुन लिया। विज्ञान मुझे पसंद था लेकिन कागज पर उकेरे बिंदु और रेखा को अपने जिन्दगी से जोड़ ही नहीं पाया। न कोई ऐसी किताब मिली जो मुझे ऐसा कर पाने में मेरी मदद कर पाये। मैं दुनिया को समझना चाहता था। उन सबकी बात सुनना और सुनाना चाहता था जो अब भी हाशिये पर थे। मैं चाहता था गांव के लोगों को बाजार की बेहतर जानकारी होनी चाहिए। छात्रों को उनकी रुचि और जरूरत की किताबें मिलनी चाहिए। उन्हें सरकारी योजनाओं की सही और सरल सूचना मिल पाये। लगा पत्रकार के तौर पर यह काम बेहतर कर सकता हूं। कॉलेज की पत्रिका के साथ लिखने की शुरूआत की। उन्हीं दिनों युवाओं के लिए नवहुंकार पत्रिका भी निकालता था। एक  समूह के 75 साल पूरे होने पर उसका सॉवेनियर भी निकाला।

साहित्य में दिलचस्पी थी। मेरी हिन्दी  शायद अच्छी थी इसलिए स्नातक के लिए हिन्दी के साथ अंग्रेजी को भी चुना। जिस कॉलेज में स्नातक के लिए दाखिला मिला उसकी गिनती औसत कॉलेजों में होती थीं। जहां के लाइब्रेरी से किताबें नहीं मिलती थीं। एनसीसी एनएसएस फंक्शन में नहीं था। कॉलेज के थियेटर ग्रुप में चंद लोगों का दबदबा था। और हाल ही में स्कूल प्रशासन पर खेलकूद के सामानों के घपलों का आरोप लगा था। हमने अलग-अलग रुचि वाले लोगों की पहचान कर सभी मसलों पर काम किया। पिछले दिनों जब मैं छुट्टियों में अपने शहर गया। मैनें अपने कॉलेज के सामने नैक का दिया ए+ ग्रेड लिखा देखा। मुझे इस बात का गर्व रहेगा कि इसमें मेरा भी योगदान है।

मैं अनक्षरा और इप्टा के साथ सामाजिक-राजनैतिक मुद्दो पर दर्जनभर थियेटर किया हूं। आरटीआई के इस्तेमाल से बिहार के विश्वविद्यालय के प्रोफेसर की बहाली की अनियमितता को उजागर किया।
एक बेहतर प्लेटफार्म और नवोन्मेषण के लिए देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिला लिया। बाद में हरिभूमि में सह-संपादक की जिम्मेदारी मिली। लेकिन समाज को शिक्षित करने, सूचना देने की ख्वाहिश पूरी नहीं हो पा रही थी। समाज को शिक्षित करने और शिक्षा-व्यवस्था को समझने के लिए गांधी फेलोशिप ज्वाइन किया।

पांच अलग-अलग भाषाओं वाले स्कूलों में हेडमास्टर, शिक्षक, छात्र, कम्युनिटी और सिस्टम के साथ काम करने का मौका मिला। इस दरम्यान हमने अपने स्कील्स से स्कूल के सर्वांगीण विकास के लिए काम किया। हमने कम्युनिटी रीडिंग प्रोग्राम शुरू किया जिसमें तकनीक के इस्तेमाल से कम्युनिटी को शिक्षित करने की कोशिश की। हमने बच्चों के लिए कम्युनिटी वॉल मैगजीन शुरु किया जहां छात्र अपनी बात कह सकते थे। हमने कुछ पब्लिक सिस्टम प्रोजेक्ट किया जिनमें युवाओं को आरटीआई और सिस्टम के बारे में जानकारी देना, महिलाओं को फैमली हेल्थ के बारे में अवगत कराने जैसे कार्यक्रम शामिल रहे है। फैलोशिप से हमने जिन्दगी जीना सीखा है। हमने साथ मिलकर काम करना सीखा है। हमने समस्याओं को गहराई से जाना है। अब मैं सिर्फ सिस्टम की आलोचना ही नहीं करता हूं, उसको दूर करने के सामुदायिक हल भी ढूंढने में विश्वास करता हूं।